तीन बीघा ज़मीन इकतीस बरस पहले गई थी। काग़ज़ पर। बैकुंठ तब नौ बरस का था और उसे उस दिन की सिर्फ़ एक बात याद है, कि उसका बाप शाम को घर आया और खाना नहीं खाया।
जो हुआ था वह यह था। उसके बाप ने जगधारी से बीस हज़ार उधार लिए थे और उसके बदले तीन बीघा गिरवी रखी थी। गिरवी का मतलब यह होता है कि पैसा लौटाने पर ज़मीन वापस मिल जाती है। काग़ज़ जो बना, उसमें गिरवी नहीं, बैनामा लिखा गया था।
बैकुंठ का बाप पढ़ा हुआ नहीं था और उसने अँगूठा लगा दिया था। गवाह दोनों जगधारी के थे। पैसा उसने ढाई बरस में लौटा दिया। जगधारी ने पैसा ले लिया और ज़मीन नहीं दी, क्योंकि काग़ज़ में ज़मीन बिक चुकी थी।
मुक़दमा नौ बरस चला और हार गया।
उन नौ बरसों में जो ख़र्च हुआ वह अलग नुक़सान था। हर तारीख़ पर क़स्बे जाना पड़ता था, वकील की फ़ीस देनी पड़ती थी, और खेत का एक दिन जाता था। बैकुंठ के बाप ने इसके लिए दो बार अनाज बेचा और एक बार बैल बेचा, और बैल बेचने के बाद उसने अगली फ़सल दूसरे के बैल माँगकर बोई।
इसकी वजह यह नहीं थी कि जज ग़लत था। वजह यह थी कि काग़ज़ साफ़ था और उसके ख़िलाफ़ कहने को सिर्फ़ ज़बानी बात थी। बैकुंठ का बाप उसके चार बरस बाद गुज़र गया। बैकुंठ ने वह ज़मीन अपनी उम्र में रोज़ देखी, क्योंकि वह उसके अपने खेत से लगी हुई थी।
यह देखना उस तरह का नहीं था जिस तरह लोग सोचते हैं। उसने उस पर बरसों तक ग़ुस्सा नहीं किया। वह खेत पर जाता था, अपना काम करता था, और उस मेंड़ के उस पार की फ़सल उसे उसी तरह दिखती थी जिस तरह किसी को पड़ोसी की फ़सल दिखती है। बात सिर्फ़ इतनी थी कि उसे मालूम था, और यह जानना कभी बंद नहीं हुआ।
जगधारी सोलह बरस पहले गुज़रा। उसका मुक़दमा उससे पहले ही ख़त्म हो चुका था। उसका लड़का सुकालू ज़मीन सँभालता रहा और उसने उसे बढ़ाया भी। फिर उसका लड़का बीमार पड़ा। यह पिछले बरस की बात है। लड़के को लखनऊ ले जाना पड़ा और वहाँ जो ख़र्च बैठा वह उस परिवार की हैसियत से बाहर था।
सुकालू ने पहले गहने बेचे। फिर उसने ट्रैक्टर बेचा। फिर वह ज़मीन बेचने निकला। गाँव में ज़मीन का भाव उस वक़्त एक लाख दस हज़ार बीघा चल रहा था। सुकालू को पैसा तुरंत चाहिए था और जिसे तुरंत चाहिए होता है उसे भाव नहीं मिलता।
फिरंगी दलाल उसे लेकर बैकुंठ के पास आया। यह उसी ने तय किया था। ज़मीन बैकुंठ के खेत से लगी थी, इसलिए उसके लिए उसकी क़ीमत बाक़ी सबसे ज़्यादा थी, और यह बात दलाल जानता था। बात साठ हज़ार बीघा पर शुरू हुई।
बैकुंठ के सामने वे तीनों बीघा थे और साठ हज़ार का मतलब था कि वे उसे भाव से आधे से कुछ ऊपर में मिल रहे थे। फिरंगी ने उसी बैठक में एक और बात कही।
उसने कहा कि सुकालू के पास काग़ज़ पूरे नहीं हैं। बँटवारे के बाद जो नक़्शा बना उसमें एक जगह गड़बड़ है और अगर उस पर उँगली रखी जाए तो सौदा और नीचे आ सकता है, या हो सकता है कि ज़मीन कुछ दिन अटक जाए और तब सुकालू किसी भी दाम पर देने को तैयार हो जाए।
यह वही तरीक़ा था। काग़ज़ की गड़बड़, और सामने वाले की जल्दी। बैकुंठ ने उस दिन कोई जवाब नहीं दिया।
फिरंगी ने उसे दो बार टोका और दोनों बार उसने कहा कि सोचकर बताऊँगा। दलाल को यह अच्छा नहीं लगा, क्योंकि ऐसे सौदे में देर करने से दूसरा ख़रीदार आ जाता है, और उसने यह कह भी दिया। उसने रात में अपनी पत्नी से बात की और उसने उसे यह पूरी बात बताई, इकतीस बरस वाली भी और आज वाली भी।
उसकी पत्नी ने कहा कि जो सही लगे वह करो, और यह उसने टालने के लिए नहीं कहा। उसने यह भी कहा कि दोनों बातें अलग हैं, और जिसने किया था वह मर चुका है।
अगली सुबह बैकुंठ ने सुकालू को अकेले बुलाया। उसने कहा कि ज़मीन वह लेगा और दाम एक लाख दस हज़ार बीघा देगा, जो भाव है। सुकालू ने दो बार पूछा कि क्यों। बैकुंठ ने इसका जवाब नहीं दिया। दाम पूरा गया और उसमें बैकुंठ को अपनी जमा-पूँजी लगानी पड़ी और उसके ऊपर पैंतीस हज़ार का क़र्ज़ भी लेना पड़ा, जो उसने चार बरस में चुकाया।
काग़ज़ बनवाते वक़्त उसने एक बात कही, कि उसमें बैनामा ही लिखा जाए और गिरवी नहीं, ताकि आगे कोई झगड़ा न रहे। यह बात उसने बिना किसी लहजे के कही और वहाँ बैठे तीन में से दो लोगों को उसका मतलब समझ नहीं आया।
सुकालू का लड़का बच गया।
उन तीन बीघों में बैकुंठ ने पहले बरस गन्ना बोया, जो उसके बाप ने आख़िरी बार उसी खेत में बोया था। यह उसने किसी को बताकर नहीं किया और गन्ना उस मिट्टी में अच्छा नहीं होता, और अगले बरस से उसने वहाँ गेहूँ बोना शुरू कर दिया।