शीशम के तख़्तों के सिरे पर नज़ीर चाक से तारीख़ लिख देता था। लिखने के बाद वह उन्हें छत के नीचे, हवा वाली तरफ़, एक के ऊपर एक चुनवा देता, बीच में पतली फट्टियाँ डालकर, ताकि हवा हर तख़्ते के दोनों तरफ़ से गुज़रे। फिर वह उन्हें छूता नहीं था। डेढ़ साल तक नहीं।
वजह उसके वालिद ने उसे एक ही बार बताई थी। गीली लकड़ी काम में लग जाने के बाद भी सूखती रहती है, और सूखते हुए सिकुड़ती है, और सिकुड़ते हुए जोड़ खोल देती है। दरवाज़ा उसी दिन ख़राब नहीं होता जिस दिन बनता है। वह दूसरी बरसात में ख़राब होता है।
सहारनपुर में लकड़ी का काम करने वाले सैकड़ों हैं, और घंटाघर के पीछे वाली गली में ही ग्यारह हैं। इनमें से ज़्यादातर नक़्क़ाशी करते हैं, क्योंकि नक़्क़ाशी में नाम है और नाम में दाम है। नज़ीर सादा काम करता था। दरवाज़े, चौखट, खिड़कियाँ।
उसका बेटा इसरार बारहवीं में था और उसकी फ़ीस साल में दो बार जमा होती थी, जुलाई में और जनवरी में। जुलाई वाली हमेशा भारी पड़ती थी। बरसात में काम कम आता है, क्योंकि लोग नया दरवाज़ा गर्मी में लगवाते हैं।
उस साल मार्च में सड़क वाली दुकान खुली। धरमपाल की। भीतर एक मशीन थी जो लकड़ी को गर्म हवा में सुखाती थी, और बाहर लिखा था कि चार दिन में सुखाई पूरी। नज़ीर ने वह मशीन देखी नहीं, सिर्फ़ सुनी। सुनकर उसे बुरा नहीं लगा। भट्ठी की सुखाई भी सुखाई ही होती है, अगर पूरी की जाए।
दिक़्क़त यह थी कि धरमपाल चार दिन नहीं लगाता था। वह डेढ़ दिन लगाता था, और बाक़ी वक़्त में दरवाज़ा बनाकर लगा भी देता था। एक हफ़्ते में पूरा काम। और दाम नज़ीर से एक तिहाई कम।
उस बरस अप्रैल में नज़ीर के पास नौ काम आए। मई में चार। जून में एक, वह भी सिर्फ़ एक चौखट। जुलाई में कोई नहीं आया।
लकड़ी उसके पास थी। छत के नीचे तीन ढेर लगे थे। सबसे पुराने पर पिछले साल फ़रवरी की तारीख़ थी, यानी वह लगने के लायक़ था। बाक़ी दो पर इस साल की तारीख़ें थीं और उन्हें अभी बहुत वक़्त चाहिए था। नज़ीर का सारा पैसा उन्हीं दो ढेरों में खड़ा था।
जुलाई की फ़ीस बारह सौ की थी। नज़ीर के पास सात सौ थे।
अगस्त के पहले हफ़्ते में एक काम आया, और बड़ा आया। नकुड़ की तरफ़ के एक आदमी ने नया मकान बनवाया था और उसे छह दरवाज़े और चार खिड़कियाँ चाहिए थीं। उसने पूछा कि कितने दिन लगेंगे। नज़ीर ने कहा कि इतनी लकड़ी उसके पास तैयार नहीं है। आदमी ने कहा कि सामने वाला दस दिन कह रहा है।
उस रात नज़ीर छत के नीचे गया और नए ढेर के सामने खड़ा रहा। तख़्तों के सिरे पर मई की तारीख़ थी। तीन महीने। ऊपर से वे बिल्कुल सूखे लग रहे थे और हाथ लगाने पर ठंडे भी नहीं थे। कोई देखकर नहीं बता सकता था।
और परेशानी ठीक यही थी। कोई दो बरसात तक नहीं जान सकता था। दो बरसात बाद वह आदमी यही समझता कि दरवाज़ा फूल गया है, जैसे सबका फूलता है, और किसी से रंदा मरवा लेता, और बात वहीं ख़त्म हो जाती।
नज़ीर ने वह काम ले लिया। उसने नए ढेर में से तख़्ते निकाले और छह में से एक दरवाज़ा उसी लकड़ी का बनाया। बाक़ी पाँच पुराने ढेर से बने, जो पूरा सूखा था। एक दरवाज़ा। उसने ख़ुद से यही कहा कि एक ही तो है।
फ़ीस वक़्त पर जमा हो गई। इसरार ने यह नहीं पूछा कि इस बार देर क्यों नहीं हुई।
वह दरवाज़ा बीच वाले कमरे का था। नज़ीर को यह याद रहा। उसने याद न रखने की कोशिश भी नहीं की।
अगले साल की बरसात में गली में एक नई बात शुरू हुई। लोग दरवाज़े उठाकर लाने लगे। सड़क वाली दुकान के दरवाज़े। वे फूलकर चौखट में अटक रहे थे, और कुछ के जोड़ इतने खुल गए थे कि बीच में उँगली चली जाती थी।
नज़ीर उन्हें रंदा मारता, जोड़ भरता, और बीस या पचास रुपये लेता। यह बनाने का काम नहीं था और इसमें बनाने जितना पैसा भी नहीं था। पर बरसात के दो महीनों में यह रोज़ का काम बन गया, और रोज़ का छोटा काम साल में दो बड़े कामों से ज़्यादा भरोसे का होता है।
दुकान के पिछले कोने में उसने इन दरवाज़ों के लिए जगह बना दी। बरसात में वह कोना भर जाता था। हर दरवाज़े पर चाक से मालिक का नाम लिखा रहता, ताकि लौटाने में ग़लती न हो।
नाम लिखने का काम इसरार करने लगा, क्योंकि उसकी लिखाई साफ़ थी। एक दिन उसने पूछा कि हम भी मशीन क्यों नहीं ले लेते। नज़ीर ने कहा कि ले लेंगे। जिस दिन इतने पैसे हो जाएँगे कि उसे पूरे चार दिन चलाया जा सके, उसी दिन ले लेंगे।
धरमपाल की दुकान तीसरे साल बंद हो गई, पर इस वजह से नहीं। उसने मशीन बेच दी और ट्रैक्टर की एजेंसी ले ली, जिसमें पैसा ज़्यादा था। जाते हुए वह नज़ीर से मिलने आया और दोनों ने साथ चाय पी।
चौथी बरसात में जो दरवाज़े आए, उनमें एक नकुड़ की तरफ़ से आया। बीच वाले कमरे का। फूला हुआ, जोड़ खुला हुआ। लाने वाले ने कहा कि पुराना है, फूल गया होगा। नज़ीर ने उसे कोने में रखवाया, उस पर चाक से नाम लिखा, और दो दिन बाद ठीक करके लौटा दिया। उसने उसके पैसे नहीं लिए। लाने वाले ने वजह पूछी तो उसने कहा कि पुराना ग्राहक है।