आसमान में सितारे गिनने बैठो तो बड़े पहले दिखते हैं। यह उनकी ग़लती नहीं है। वे बड़े हैं, इसलिए पहले दिखते हैं। पर उनके बीच, बहुत सारे छोटे सितारे भी होते हैं, जो तब तक नहीं दिखते जब तक आँख अँधेरे की आदी न हो जाए। चमक उन्हीं में से एक था। सबसे छोटे वालों में से एक। और उसे इस बात का बहुत दुख था।

नीचे ज़मीन पर बच्चे कभी-कभी सितारे गिनने बैठते हैं। वे हमेशा वहीं से शुरू करते हैं जहाँ सबसे तेज़ रोशनी हो, और गिनते-गिनते उन्हें नींद आ जाती है। चमक ने कई बार देखा था कि गिनती उस तक कभी नहीं पहुँचती। बीस-पच्चीस तक आते-आते बच्चे रुक जाते हैं। फिर आँख लग जाती है।

चमक का कोना आसमान के उस हिस्से में था जहाँ सब छोटे थे। उसके एक तरफ़ एक सितारा था जो उससे भी छोटा था और लगभग दिखता ही नहीं था। दूसरी तरफ़ दो और थे। चारों में कोई किसी से बात नहीं करता था। कभी नहीं। आपस में कुछ था, ऐसा भी नहीं। सबका ध्यान बस नीचे की तरफ़ लगा रहता था।

चमकना कोई आसान काम नहीं है। इसमें ज़ोर लगाना पड़ता है, और जितना ज़ोर लगाओ उतनी देर टिका नहीं जाता। चमक हर रात ज़ोर लगाता था। हर एक रात। वह चाहता था कि नीचे ज़मीन पर कोई उसकी तरफ़ उँगली उठाकर कहे, वो देखो।

उसने कई बार कोशिश की थी। वह पूरी ताक़त लगाकर चमकता, जितना चमक सकता था। नीचे ज़मीन पर किसी को फ़र्क़ नहीं पड़ता था। कोई ऊपर देखता भी तो बड़े सितारों को देखकर लौट जाता। चमक कुछ देर और चमकता रहता, फिर थककर धीमा पड़ जाता।

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ज़ोर लगाने के बाद वाली रात मुश्किल होती है। उस रात रोशनी अपने आप कम आती है और उसे बढ़ाया नहीं जा सकता। चमक को यह बात मालूम थी। वह फिर भी ज़ोर लगाता था, क्योंकि उसे हर रात यही लगता था कि शायद आज कोई देख ले।

फिर उसने जगह बदलकर देखी। वह सरककर एक बड़े सितारे के पास चला गया, यह सोचकर कि उसके पास रहने से लोग उसे भी देख लेंगे। हुआ उल्टा। बड़े की रोशनी में वह और कम दिखने लगा। दो रात बाद वह चुपचाप वापस अपनी जगह पर आ गया।

बड़े सितारे के पास से लौटते हुए उसने किसी से शिकायत नहीं की। बड़ा सितारा नाराज़ नहीं हुआ था। उसने तो शायद ध्यान ही नहीं दिया कि कोई पास आया और चला गया। चमक को सबसे बुरा यही लगा।

फिर उसने एक और तरीका सोचा। वह बुझता और जलता, बुझता और जलता, जल्दी-जल्दी, ताकि कोई हलचल देखकर ऊपर देखे। इसमें उसकी सारी ताक़त लग जाती थी। तीसरी रात वह इतना थका कि सुबह से पहले ही बुझ गया।

तीनों तरीक़े काम नहीं आए। चौथी रात उसने कुछ नहीं किया। न ज़ोर लगाया। न जगह बदली। न बुझा-जला। वह बस जितना था उतना जलता रहा, इसलिए कि थका हुआ था और इसके अलावा कुछ करने का मन नहीं था।

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उस पर एक तरह की सुस्ती छा गई थी। सितारे सोते नहीं, पर थकने पर उनकी रोशनी एक जगह ठहर जाती है और हिलती नहीं। उस रात चमक की रोशनी ठहरी रही। बराबर। बिना घटे, बिना बढ़े, पूरी रात।

पहली रात कुछ नहीं हुआ। दूसरी रात भी नहीं। तीसरी रात उसके बगल वाला सितारा, जो उससे भी छोटा था, थोड़ा तेज़ चमकने लगा। चमक ने उससे कुछ कहा नहीं। बस चमकता रहा। चौथी रात तीन सितारे थे। सातवीं रात उस पूरे कोने में कोई सितारा मद्धिम नहीं था।

जो सितारा उसके सबसे पास था, वही सबसे पहले तेज़ हुआ था। चमक ने एक रात उसकी तरफ़ देख लिया और वह हड़बड़ाकर मद्धिम पड़ गया, जैसे कोई पकड़ा गया हो। चमक ने फिर उधर नहीं देखा। उसके बाद वह फिर तेज़ हो गया।

चमक को यह समझ नहीं आया कि हुआ क्या। उसने कुछ किया नहीं था। उसने किसी से कुछ कहा नहीं था। उसने सिर्फ़ ज़ोर लगाना छोड़ा था। पर अब उस पूरे कोने में रोशनी थी। पहले नहीं थी।

सातवीं रात के बाद कई हफ़्ते ऐसे ही बीत गए। फिर एक रात चमक ने बड़े सितारे से वही पुराना सवाल पूछ लिया, जो वह बहुत दिनों से नहीं पूछ रहा था।

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'तो क्या मैं सबसे चमकदार हूँ?' चमक ने पूछा। बड़े सितारे ने नीचे इशारा किया। ज़मीन पर एक बच्चा छत पर लेटा हुआ ऊपर देख रहा था, और वह उस कोने की तरफ़ देख रहा था जहाँ चमक था। 'वह तुम्हें नहीं देख रहा,' बड़े सितारे ने कहा। 'वह उस पूरे हिस्से को देख रहा है। और वह हिस्सा तुमसे शुरू हुआ था।'

चमक ने नीचे देखा। बच्चा वहीं लेटा हुआ था, हाथ सिर के नीचे रखे, और वह हिल नहीं रहा था। कुछ देर बाद उसने किसी को आवाज़ लगाई और ऊपर की तरफ़ हाथ से इशारा किया। चमक ने यह नहीं सुना कि उसने क्या कहा। इतनी दूर से आवाज़ नहीं आती।

उस रात के बाद चमक ने यह पूछना छोड़ दिया कि वह कितना बड़ा है। वह हर रात उसी तरह चमकता रहा। न कम, न ज़्यादा। कभी-कभी आसमान में कोई नया सितारा दिखता, बहुत छोटा और बहुत मद्धिम, और उदास। चमक उसके पास सरक आता और थोड़ी देर चुपचाप उसके बगल में चमकता रहता। ज़्यादातर बार इतना काफ़ी होता था।