मिठू के पास एक टीन का डिब्बा था, और उसमें उसका पूरा ख़ज़ाना था: काँच के तीन टुकड़े, एक चमकीला रैपर, और एक बटन। हर शाम वह डिब्बा खोलती, सब चीज़ें बाहर निकालती, ढलती धूप में घुमाकर देखती, और फिर वापस रख देती। जंगल की सबसे खुशमिज़ाज बिल्ली यही थी। पर उसके मन में एक बात अटकी रहती थी। उसने सुन रखा था कि कहीं रंगीन मोती होते हैं, असली वाले, जो रोशनी में सात रंग छोड़ते हैं। 'वे मिल जाएँ,' वह सोचती, 'तो मैं जंगल की सबसे सुंदर बिल्ली बन जाऊँगी।'
एक दिन झील के किनारे उसे वही दिखा जिसका इंतज़ार था। पानी के नीचे कुछ चमक रहा था, गोल-गोल, रंग बदलता हुआ। मिठू की आँखें चौड़ी हो गईं। 'ये मेरे लिए हैं!' उसने कहा और किनारे की गीली मिट्टी पर दौड़ पड़ी। उसने पंजा बढ़ाया, थोड़ा और झुकी, फिर थोड़ा और। पंजा पानी को छूता, चमक हिलती, और गायब हो जाती।
तीसरी कोशिश में उसका पिछला पैर फिसला और मिठू सीधे पानी में जा गिरी। ठंडा पानी उसके कानों तक भर गया। वह किसी तरह किनारे तक आई, भीगी हुई और काँपती हुई, और देर तक बैठकर अपने पंजे चाटती रही। पर उसने हार नहीं मानी। 'और मेहनत करूँगी,' उसने कहा। 'कल फिर आऊँगी।'
एक प्यारा सा सबक
यह सब चूहा टिंकू एक पत्थर के पीछे से देख रहा था। वह मिठू का सबसे पुराना दोस्त था और हमेशा उसकी मदद के लिए तैयार रहता था। वह बाहर आया और बोला, 'मिठू, तुम इतनी परेशान क्यों हो?' 'मुझे वे मोती चाहिए।' 'किसलिए?' 'ताकि मैं सबसे सुंदर दिखूँ।'
टिंकू ने तुरंत जवाब नहीं दिया। फिर बोला, 'तुम्हें पता है, कल शाम तुम्हारे डिब्बे वाला वह चमकीला रैपर मुझे बहुत अच्छा लगा था?' मिठू ने सिर हिलाया। 'पर उससे भी अच्छा यह लगा कि तुमने उसे मुझे दिखाया।' मिठू चौंकी। 'लेकिन...' 'अगर खुशी सिर्फ़ चीज़ों में ढूँढ़ोगी,' टिंकू ने कहा, 'तो वह डिब्बे जितनी ही रहेगी।'
मिठू ने उस रात बहुत सोचा। अगली सुबह वह झील की तरफ़ नहीं गई। वह सूरजमुखी की क्यारी की ओर चली गई, जहाँ एक छोटी तितली रोज़ बैठती थी। मिठू ने पहली बार उससे बात की। तितली ने उसे बताया कि किस फूल में सबसे मीठा रस होता है, और मिठू ने उसे बताया कि जंगल में सबसे नरम घास कहाँ उगती है। दोपहर कैसे बीत गई, दोनों को पता ही नहीं चला।
शाम को वह बरगद वाले उल्लू के पास गई। उल्लू कम बोलता था, पर उसने मिठू को रात के तारे दिखाए और बताया कि कौन सा तारा कब निकलता है। अगले दिन खरगोश ने उसे दौड़ने का एक नया रास्ता दिखाया, जो झाड़ियों के नीचे से होकर जाता था। हफ़्ता बीतते-बीतते मिठू के पास हर दिन जाने के लिए कोई न कोई जगह थी, और मिलने के लिए कोई न कोई।
बरसात के दिनों में एक शाम मिठू भीगकर लौट रही थी कि उसका पंजा दो पत्थरों के बीच फँस गया। उसने बहुत ज़ोर लगाया, पर पंजा निकला ही नहीं। अँधेरा बढ़ता गया और पानी तेज़ होता गया। फिर उसे झाड़ियों में सरसराहट सुनाई दी। टिंकू सबसे पहले पहुँचा। उसके पीछे खरगोश आया, और सबसे ऊपर से रास्ता दिखाता हुआ उल्लू। तीनों ने मिलकर एक पत्थर सरकाया और मिठू का पंजा आज़ाद हो गया। उस रात वह टिंकू के बिल में सोई। किसी ने उससे यह नहीं पूछा कि उसके डिब्बे में क्या रखा है।
साझा करने का मज़ा
एक शाम मिठू को ध्यान आया कि उसका टीन का डिब्बा कई दिनों से बंद पड़ा है। उसने उसे खोला। काँच के तीन टुकड़े, चमकीला रैपर, बटन। सब वैसे के वैसे। पर अब वे उतने चमकीले नहीं लग रहे थे।
कुछ दिन बाद झील के किनारे टहलते हुए मिठू को एक बक्सा दिखा। किसी के हाथ से गिरा होगा। ढक्कन आधा खुला था और भीतर रंगीन मोती भरे थे, ठीक वैसे ही जैसे उसने सोचे थे। मिठू कुछ देर वहीं खड़ी रही। उसने एक मोती उठाया, रोशनी में घुमाकर देखा, और मुस्कुरा दी।
'ये मुझे खुश नहीं कर सकते,' उसने ज़ोर से कहा, हालाँकि वहाँ सुनने वाला कोई नहीं था। फिर उसने बक्सा वापस झील में डाल दिया। पानी पर एक गोल लहर बनी और फैलती चली गई। मिठू मुड़ी और सीधे टिंकू के बिल की तरफ़ चल दी।
उस शाम सब इकट्ठा हुए: टिंकू, तितली, उल्लू और खरगोश। मिठू ने अपना टीन का डिब्बा बीच में रखा और खोल दिया। काँच के तीन टुकड़े, एक रैपर, एक बटन। सबने बारी-बारी से उन्हें उठाया, रोशनी में घुमाकर देखा, और देर तक हँसते रहे। खरगोश ने कहा कि काँच का बीच वाला टुकड़ा सबसे अच्छा है। उल्लू ने कहा कि बटन। टिंकू चुप रहा, बस रैपर उठाकर अपने पास रख लिया। मिठू ने उस रात डिब्बा बंद नहीं किया।