गाँव के बच्चों ने उस नदी को नाम ख़ुद दिया था: चमचमाती नदी। नाम की वजह हर सुबह दिखती थी। जैसे ही सूरज की पहली किरण पानी पर पड़ती, पूरी सतह पर चाँदी के सिक्के जैसे बिखर जाते। बड़े लोग भी रुक जाते थे। वे कहते कुछ नहीं थे, बस एक पल ठिठकते और फिर अपने काम पर चले जाते। बच्चे नहीं जाते थे। वे किनारे पर बैठे रहते और सोचते रहते कि यह चमक आती कहाँ से है।
महात्मा कृष्णप्रसाद तीन दिन के लिए गाँव आए थे और सात दिन रुक गए। सफ़ेद बाल, लंबी दाढ़ी, और चलने में एक लाठी। बच्चों ने पहले दिन उन्हें दूर से देखा। दूसरे दिन पास से। तीसरे दिन सबसे छोटे लड़के ने जाकर पूछ ही लिया कि नदी चमकती क्यों है। बाकी बच्चे पीछे खड़े रहे और साँस रोके सुनते रहे।
बूढ़े आदमी ने कहा कि इसकी एक कहानी है और वह लंबी है, और बच्चे वहीं बैठ गए।
राधिका उस गाँव में बहुत पहले रहती थी। इतना पहले कि उसकी बात किसी को याद नहीं, बस नदी को याद है, यह कहकर बूढ़े आदमी ने शुरू किया, और बच्चे हँस दिए।
राधिका के घर में चूड़ियाँ बनती थीं।
काँच की चूड़ियाँ बनाने में भट्ठी लगती है और भट्ठी की राख और टूटे काँच का चूरा हर दिन निकलता है। यह सब एक गड्ढे में डाला जाता था और गड्ढा नदी से दूर था, ऊपर की तरफ़, जहाँ ढलान नहीं थी।
जिस बरस राधिका आठ की हुई, उस बरस घर का काम बढ़ा और गड्ढा छोटा पड़ गया।
नया गड्ढा नदी के पास खोदा गया। पास होने से ढोने में आसानी होती है और यही एक वजह थी।
राधिका ने उसी बरस के जाड़ों में देखा कि चमक कम है।
किसी और ने नहीं देखा और यह उन पर कोई इल्ज़ाम नहीं है। चमक थोड़ी-थोड़ी करके गई थी और जो चीज़ थोड़ी-थोड़ी करके जाती है, उसे कोई नहीं पकड़ता। राधिका ने इसलिए पकड़ा कि वह रोज़ सुबह वहीं बैठती थी और उसके पास कोई और काम नहीं था।
उसने पहले पानी देखा। पानी साफ़ ही था।
फिर उसने नीचे देखा।
नदी की तली पर, किनारे के पास, एक सफ़ेद-सी परत बैठ गई थी। चूने और राख की। उस पर हाथ फेरो तो वह उठती नहीं थी, फिसलती थी।
चमक तली से आती है। यह राधिका ने उसी दिन समझा और किसी ने उसे बताया नहीं। साफ़ पानी के नीचे अगर रेत हो, तो सुबह की रोशनी रेत से लौटती है और पानी की सतह पर टूटकर बिखर जाती है। अगर नीचे चिकनी परत हो, तो रोशनी लौटती तो है, पर एक जगह से लौटती है, और वह चमक नहीं होती, वह बस उजाला होता है।
उसने घर में कहा। घर में उससे कहा गया कि गड्ढा वहीं रहेगा, क्योंकि दूसरी जगह ढोने में दो आदमी और लगेंगे।
यह भी कोई ग़लत जवाब नहीं था।
राधिका ने तीन काम किए।
इन तीनों में से दो नहीं चले, और यह बताना ज़रूरी है, क्योंकि कहानियों में अक्सर सिर्फ़ वह बताया जाता है जो चल गया।
पहला यह कि उसने ख़ुद ढोना शुरू कर दिया। वह रोज़ शाम को दो टोकरी ऊपर वाले पुराने गड्ढे तक ले जाती। दो टोकरी में दिन भर का चौथाई हिस्सा भी नहीं आता था और पंद्रह दिन में उसके कंधे बैठ गए।
दूसरा यह कि उसने गड्ढे के चारों तरफ़ मिट्टी की मेड़ बनाई, ताकि बरसात में पानी उसे बहाकर नदी में न ले जाए। पहली ही बारिश में मेड़ बह गई।
तीसरा वह था जो चला।
उसने गिना। उसने पंद्रह दिन तक रोज़ गिना कि गड्ढे तक कितनी बार जाना पड़ता है, और कितने क़दम पड़ते हैं, और फिर उसने पुराने गड्ढे तक के क़दम गिने।
फ़र्क़ इक्यावन क़दम का था।
इक्यावन क़दम, दिन में नौ बार। यह उसने अपने बाप को गिनकर बताया।
गिनती की एक ख़ूबी है। जिस बात पर बहस हो सकती है, गिनती उस पर बहस ख़त्म कर देती है। राधिका के घर में कोई यह नहीं मानता था कि गड्ढा हटाना आसान है, और सब यह मानते थे कि इक्यावन क़दम कम हैं।
उसका बाप हिसाब वाला आदमी था। उसने वह गिनती दोबारा जाँची और फिर उसने कहा कि इतने के लिए दो आदमी नहीं लगते।
गड्ढा उसी हफ़्ते ऊपर चला गया।
बदलाव एक दिन में नहीं आया। पहले साल किसी ने ध्यान नहीं दिया। दूसरे साल कुछ को लगा कि पानी साफ़ है। तीसरे साल की एक सुबह, जब सूरज ठीक सामने से निकला, पूरी नदी चमक उठी। उस दिन खेत जाने वाले आधे लोग देर से पहुँचे।
राधिका उस दिन सोलह की थी और वह किनारे पर नहीं थी। वह उस वक़्त भट्ठी पर थी, क्योंकि अब वह भी काम करती थी।
कहानी ख़त्म करके महात्मा कृष्णप्रसाद चुप हो गए। सबसे छोटे लड़के ने पूछा कि राधिका अब कहाँ है। बूढ़े आदमी ने कहा कि उन्हें नहीं पता। 'तो यह कहानी आपको किसने सुनाई?' उन्होंने नदी की तरफ़ इशारा किया और मुस्कुरा दिए। बच्चे समझे नहीं। पर उन्होंने दोबारा नहीं पूछा।
अगले बरस गाँव के बच्चों ने एक काम शुरू किया, जिसके लिए किसी ने नहीं कहा था। हर शनिवार वे नदी के किनारे-किनारे चलते और जो कचरा मिलता, उठा लेते। बड़े लोग हँसे। फिर एक साथ हो लिया। फिर दूसरा। कुछ साल बाद वह नदी सचमुच पहले से ज़्यादा चमकने लगी थी, और अब गाँव में किसी को यह पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी कि क्यों।