गाँव के बच्चों ने उस नदी को नाम ख़ुद दिया था: चमचमाती नदी। नाम की वजह हर सुबह दिखती थी। जैसे ही सूरज की पहली किरण पानी पर पड़ती, पूरी सतह पर चाँदी के सिक्के जैसे बिखर जाते। बड़े लोग भी रुक जाते थे। वे कहते कुछ नहीं थे, बस एक पल ठिठकते और फिर अपने काम पर चले जाते। बच्चे नहीं जाते थे। वे किनारे पर बैठे रहते और सोचते रहते कि यह चमक आती कहाँ से है।
लेकिन आखिर यह नदी इतनी सुंदर और चमचमाती क्यों थी? गाँव के बच्चों के मन में यह सवाल हमेशा बना रहता था। एक दिन, गाँव में एक बुद्धिमान वृद्ध व्यक्ति आए, जिनका नाम था महात्मा कृष्णप्रसाद। उनके सफेद बाल और लंबी दाढ़ी उनके अनुभवों की गवाही देते थे। उन्होंने गाँव के बच्चों को नदी के किनारे खेलते देखा और उनकी जिज्ञासा को भांप लिया। बच्चों के सवालों को सुनकर महात्मा कृष्णप्रसाद ने उन्हें एक कहानी सुनाने का निर्णय लिया।
महात्मा कृष्णप्रसाद तीन दिन के लिए गाँव आए थे और सात दिन रुक गए। सफ़ेद बाल, लंबी दाढ़ी, और चलने में एक लाठी। बच्चों ने पहले दिन उन्हें दूर से देखा। दूसरे दिन पास से। तीसरे दिन सबसे छोटे लड़के ने जाकर पूछ ही लिया कि नदी चमकती क्यों है। बाकी बच्चे पीछे खड़े रहे और साँस रोके सुनते रहे।
सब मिलकर जुट गए
"बहुत समय पहले," महात्मा कृष्णप्रसाद ने अपने धीमे और शांत स्वर में कहना शुरू किया, "यह नदी भी अन्य नदियों की तरह एक साधारण और शांत नदी थी। इसके पानी में कोई विशेष चमक नहीं थी। लेकिन एक दिन, इस नदी के किनारे एक छोटी सी लड़की आई जिसका नाम था राधिका। राधिका की आँखों में एक सपनों की चमक थी और उसका मन हमेशा नई खोजों में लगा रहता था। वह नदी के किनारे बैठकर सोचती रहती, 'यह पानी कितना शांत है, लेकिन क्या यह किसी काम का है?'"
राधिका ने अपने मन की बात नदी के सामने प्रकट की। उसने कहा, "अगर तुम मुझे कुछ खास दे सकती हो, तो मैं तुमसे एक वादा करती हूँ। मैं तुम्हें चमचमाती बना दूँगी।" नदी ने आश्चर्य से पूछा, "क्या तुम सच में यह कर सकती हो?" राधिका ने आत्मविश्वास से भरे स्वर में कहा, "हां, मैं तुम्हें चमकाऊँगी, लेकिन इसके लिए तुम्हें अपनी दिशा सही ढंग से बदलनी होगी।"
नदी ने राधिका से पूछा, "कैसे?" राधिका ने जवाब दिया, "तुम्हें अपनी यात्रा में कभी भी रुकना नहीं चाहिए। तुम्हें केवल अच्छाई की दिशा में बहना होगा और जो कुछ भी रास्ते में आए, उस पर ध्यान देना होगा। यह ध्यान रखना कि तुम्हारी यात्रा में कोई बाधा न आए और तुम अपनी राह पर अडिग रहो। यदि तुम सही दिशा में बहती रहोगी, तो तुम्हारा पानी भी चमकने लगेगा।"
नदी ने राधिका की बात को ध्यान से सुना और उसकी सलाह के अनुसार अपना रास्ता बदल लिया। समय के साथ, नदी सचमुच चमकने लगी। उसके पानी पर सूरज की किरणें पड़तीं तो वह चाँदी की तरह चमकने लगती। गाँव के लोग इस अद्भुत परिवर्तन को देखकर आश्चर्यचकित रह गए। अब, हर कोई नदी की सुंदरता को देखकर हैरान रह जाता और उसकी तारीफ करता।
बदलाव एक दिन में नहीं आया। पहले साल किसी ने ध्यान नहीं दिया। दूसरे साल कुछ को लगा कि पानी साफ़ है। तीसरे साल की एक सुबह, जब सूरज ठीक सामने से निकला, पूरी नदी चमक उठी। उस दिन खेत जाने वाले आधे लोग देर से पहुँचे।
नन्हे कदम, बड़ा हौसला
इस बदलाव के बाद, गाँव के लोग आकर राधिका से पूछते, "तुमने नदी को चमकने के लिए क्या किया?" राधिका मुस्कुराते हुए कहती, "कुछ नहीं, बस उसे सही दिशा में बहने के लिए प्रेरित किया।" उसकी सादगी और बुद्धिमत्ता ने गाँव के लोगों को प्रभावित किया। उसी दिन से गाँव वाले समझ गए कि हर किसी को अपनी दिशा सही ढंग से तय करनी चाहिए।
गाँव के बच्चों ने भी राधिका की बात को समझा और उसे अपने जीवन में अपनाया। वे जान गए कि अगर हम अपनी ज़िन्दगी में अच्छाई की दिशा में चलते रहें, तो हम भी चमचमाती नदियों की तरह अपनी जिंदगी को सुंदर बना सकते हैं। उनकी आँखों में अब एक नया सपना था, एक नई दिशा की ओर बढ़ने का।
कहानी ख़त्म करके महात्मा कृष्णप्रसाद चुप हो गए। सबसे छोटे लड़के ने पूछा कि राधिका अब कहाँ है। बूढ़े आदमी ने कहा कि उन्हें नहीं पता। 'तो यह कहानी आपको किसने सुनाई?' उन्होंने नदी की तरफ़ इशारा किया और मुस्कुरा दिए। बच्चे समझे नहीं। पर उन्होंने दोबारा नहीं पूछा।
अगले बरस गाँव के बच्चों ने एक काम शुरू किया, जिसके लिए किसी ने नहीं कहा था। हर शनिवार वे नदी के किनारे-किनारे चलते और जो कचरा मिलता, उठा लेते। बड़े लोग हँसे। फिर एक साथ हो लिया। फिर दूसरा। कुछ साल बाद वह नदी सचमुच पहले से ज़्यादा चमकने लगी थी, और अब गाँव में किसी को यह पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी कि क्यों।