सुक्खन के नाख़ूनों में हमेशा मिट्टी भरी रहती थी। माँ रोज़ रगड़कर साफ़ करतीं और अगले दिन फिर वैसी ही मिल जाती। नदी के मोड़ पर एक जगह थी जहाँ की मिट्टी बाकी जगहों से अलग थी: चिकनी, ठंडी, और हाथ में लेने पर आटे जैसी। सुक्खन वहीं से लाता था। गाँव के बाकी बच्चे उसे देखकर हँसते। 'मिट्टी से क्या बनेगा?' वे कहते। 'यह तो गंदगी है।'
पहली कोशिशें बेकार गईं। उसने एक चिड़िया बनाई, जो सूखने पर बीच से चटक गई। फिर एक घोड़ा, जिसकी टाँगें अपना ही वज़न नहीं सँभाल पाईं। फिर एक कटोरा, जो सूखते वक़्त टेढ़ा हो गया। हर बार वह टूटी हुई चीज़ को वापस पानी में घोल देता और मिट्टी दोबारा इस्तेमाल कर लेता। यह बात उसे सबसे अच्छी लगती थी। मिट्टी में कुछ बेकार नहीं जाता।
उसे बाद में पता चला कि गड़बड़ी कहाँ थी। मिट्टी को धूप में सीधे नहीं सुखाना चाहिए। उसे छाँव में, धीरे-धीरे सूखने देना चाहिए। यह बात उसे किसी ने नहीं बताई। उसने ख़ुद पकड़ी, नौवीं बार टूटने के बाद।
नौवीं बार टूटने के बाद उसने एक और चीज़ पकड़ी। मिट्टी में जितना पानी हो, चीज़ उतनी ही देर में सूखनी चाहिए। ज़्यादा पानी वाली चीज़ अगर जल्दी सुखाओ तो बाहर से सूख जाती है और भीतर गीली रहती है, और वही चटकती है।
अब उसकी चीज़ें टूटनी बंद हो गईं। ज़्यादातर।
पहली जो पूरी बची, वह एक बैल था। छोटा, हथेली भर का, और उसकी एक सींग दूसरी से बड़ी थी। सुक्खन को यह पता था और उसने उसे ठीक नहीं किया, क्योंकि गीली मिट्टी को छूने से वह और बिगड़ती है।
वह बैल उसने किसी को नहीं दिखाया। किसी को भी नहीं। उसने उसे चारपाई के नीचे एक कटोरे में रख दिया।
कटोरे में रखने की एक वजह थी। कच्ची मिट्टी की चीज़ पक्की नहीं होती, इसलिए वह टिकती तो है पर हमेशा नहीं टिकती। हवा में नमी हो तो वह नरम पड़ जाती है और नरम पड़ने पर अपने ही वज़न से बैठने लगती है। सुक्खन ने यह देखा था। उसकी पहली बची हुई चिड़िया चौथे दिन एक तरफ़ को झुक गई थी और पाँचवें दिन बैठ गई थी।
इसीलिए वह हर चीज़ को कटोरे में रखता था और कटोरे के नीचे राख डाल देता था, जो नमी खींच लेती है। यह उसे किसी ने नहीं बताया। उसने यह अपनी दादी को अचार की मर्तबान में राख डालते हुए देखा था।
गाँव में कुम्हार भी था और उसका नाम धनपत था।
धनपत ने उसे नदी वाले मोड़ पर दो बार देखा। तीसरी बार उसने उसे बुला लिया।
बुलाने पर सुक्खन को लगा कि डाँट पड़ेगी, क्योंकि वह मिट्टी उसी जगह से निकलती है जहाँ से धनपत निकालता है।
डाँट नहीं पड़ी। एक शब्द भी नहीं। धनपत ने एक ही बात कही, और वह पूछी हुई भी नहीं थी। उसने कहा कि चीज़ बनाने से पहले मिट्टी को दो दिन पानी में पड़ा रहने दो और फिर उसे कपड़े से छान लो, क्योंकि जो चटकाता है वह मिट्टी नहीं होती, वह उसमें मिला हुआ कंकड़ होता है।
इतना कहकर वह अपने चाक पर लौट गया। और कुछ नहीं बोला।
सुक्खन ने वह करके देखा। वह सही निकला।
उस बरस गाँव में मेला लगा और मेले में बच्चों के पास करने को कुछ नहीं होता, सिवाय घूमने के।
मेला चैत में लगता है और तीन दिन चलता है। नदी के किनारे वाले मैदान में दुकानें लगती हैं, झूला आता है, और शाम को नौटंकी होती है। बच्चों के पास पैसा नहीं होता, इसलिए वे झूले के पास खड़े रहते हैं और झूलने वालों को देखते हैं, और यह भी एक तरह का काम है।
सुक्खन ने कहा कि किला बनाते हैं। बड़ा वाला।
मिट्टी नदी वाले मोड़ से लानी थी और वह मैदान से आधा कोस दूर है। ग्यारह बच्चे थे और सबके पास कुछ न कुछ था, किसी के पास बाल्टी, किसी के पास टोकरी, और दो के पास कुछ नहीं था तो उन्होंने कमीज़ उतारकर उसमें बाँधकर ढोई।
किला बनाने में चार दिन लगे। पहले दिन सिर्फ़ मिट्टी ढोई गई। दूसरे दिन नींव बनी। तीसरे दिन दीवारें, जो शाम को एक बार गिर भी गईं। चौथे दिन बच्चों ने वही किया जो सुक्खन ने सिखाया था। उन्होंने उसे छाँव में सूखने दिया, और उसके ऊपर गीले कपड़े डाल दिए।
किला दो हाथ ऊँचा था और उसकी चार बुर्जियाँ थीं। भीतर एक ढलान थी जिस पर पानी डालो तो वह नीचे तक बहता था। यह सुक्खन ने बनाई थी और पूरे किले में सबसे मुश्किल यही रही।
मेले में लोग रुककर देखते रहे। धनपत भी आया। तीसरे दिन। उसने कुछ देर देखा और फिर उसने बुर्जी के जोड़ पर उँगली रखी और कहा कि यहाँ पर पहले से गीला रखना चाहिए था।
बच्चों ने वह बात याद रखी। ज़रूरी होने की वजह से नहीं। कुम्हार ने कही थी, इस वजह से।
मेला ख़त्म होने के बाद भी वह किला कई महीनों तक खड़ा रहा। बरसात में वह घुलने लगा और धीरे-धीरे वापस ज़मीन में मिल गया। बच्चों को बुरा लगा। सुक्खन ने कहा कि बुरा मानने की बात नहीं है, क्योंकि मिट्टी कहीं गई नहीं। अगली गर्मियों में वे उसी जगह से मिट्टी उठाकर दोबारा शुरू कर सकते हैं। और अगले साल उन्होंने यही किया।