आदित्य के नाख़ूनों में हमेशा मिट्टी भरी रहती थी। माँ रोज़ रगड़कर साफ़ करतीं और अगले दिन फिर वैसी ही मिल जाती। नदी के मोड़ पर एक जगह थी जहाँ की मिट्टी बाकी जगहों से अलग थी: चिकनी, ठंडी, और हाथ में लेने पर आटे जैसी। आदित्य वहीं से लाता था। गाँव के बाकी बच्चे उसे देखकर हँसते। 'मिट्टी से क्या बनेगा?' वे कहते। 'यह तो गंदगी है।'
आदित्य को उनके मजाक से कोई फर्क नहीं पड़ता था। वह जानता था कि कच्ची मिट्टी में एक अनोखी ताकत है, जिसे वह महसूस कर सकता था। एक दिन, जब सूरज की सुनहरी किरणें धरती पर बिखरी हुई थीं, आदित्य ने सोचा, "अगर मैं इस मिट्टी से कुछ ऐसा बना सकूं, जो सबको हैरान कर दे, तो कितना अच्छा होगा।" इस सोच के साथ, वह अपने घर के पास एक छोटी सी जगह पर बैठकर मिट्टी को गूंथने लगा, जैसे कोई कलाकार अपनी कला को आकार देने के लिए एकाग्रचित्त हो।
पहली कोशिशें बेकार गईं। उसने एक चिड़िया बनाई, जो सूखने पर बीच से चटक गई। फिर एक घोड़ा, जिसकी टाँगें अपना ही वज़न नहीं सँभाल पाईं। फिर एक कटोरा, जो सूखते वक़्त टेढ़ा हो गया। हर बार वह टूटी हुई चीज़ को वापस पानी में घोल देता और मिट्टी दोबारा इस्तेमाल कर लेता। यह बात उसे सबसे अच्छी लगती थी। मिट्टी में कुछ बेकार नहीं जाता।
खुशी का पल
आदित्य ने घंटों की मेहनत के बाद मिट्टी से एक सुंदर सी मूर्ति बनाई। पहले तो वह मूर्ति साधारण सी लग रही थी, पर जैसे ही आदित्य ने उसे अपने हाथों से सजाया और उसे सूरज की रोशनी में रखा, वह मूर्ति चमत्कारी रूप से चमकने लगी। उसकी आँखों में एक अनोखी चमक थी, जैसे वह जीवंत हो उठी हो। गाँव के लोग, जो आदित्य की मेहनत और लगन को देखकर अचंभित थे, मूर्ति को देखकर मंत्रमुग्ध हो गए।
उसे बाद में पता चला कि गड़बड़ी कहाँ थी। मिट्टी को धूप में सीधे नहीं सुखाना चाहिए। उसे छाँव में, धीरे-धीरे सूखने देना चाहिए। यह बात उसे किसी ने नहीं बताई। उसने ख़ुद पकड़ी, नौवीं बार टूटने के बाद।
गाँव के लोग आदित्य से पूछने लगे, "तुमने यह क्या किया? यह कैसे संभव हुआ?" आदित्य ने मुस्कुराते हुए कहा, "यह सब कच्ची मिट्टी का जादू है। मिट्टी में एक अद्भुत शक्ति है, और अगर हम उसे सही तरीके से इस्तेमाल करें, तो वह किसी भी रूप में ढल सकती है।" उसकी बातें सुनकर गाँव के लोग भी सोच में पड़ गए।
धीरे-धीरे, आदित्य की मूर्ति गाँव के हर घर में एक प्रेरणा बन गई। लोग अब मिट्टी से कुछ नया बनाने की कोशिश करने लगे। गाँव में एक सुंदर परिवर्तन आया। बच्चे अब एक-दूसरे से पूछते थे, "क्या तुम भी मिट्टी से कुछ बना सकते हो?" और वे अपनी कला में माहिर बनने लगे। घरों में मिट्टी के बर्तन, खिलौने और न जाने कितने प्रकार की चीजें बनने लगीं।
एक दिन गाँव में एक बड़ा मेला लगा, जिसमें दूर-दूर के लोग आए थे। आदित्य ने सोचा, "क्यों न इस मेले में हम सब मिलकर कच्ची मिट्टी से एक बड़ा किला बनाएं?" यह विचार उसे बहुत अच्छा लगा। उसने गाँव के बच्चों को एक साथ इकट्ठा किया और सबने मिलकर कच्ची मिट्टी से एक विशाल किला बनाना शुरू किया।
खेल-खेल में
यह किला न केवल देखने में सुंदर था, बल्कि उसमें गाँव के बच्चों की मेहनत, उनकी एकता और सहयोग की भी झलक थी। सभी लोग उसे देखकर आश्चर्यचकित हो गए। कच्ची मिट्टी से बनी यह कला गाँव के लोगों के लिए गर्व का विषय बन गई।
किला बनाने में चार दिन लगे। पहले दिन सिर्फ़ मिट्टी ढोई गई। दूसरे दिन नींव बनी। तीसरे दिन दीवारें, जो शाम को एक बार गिर भी गईं। चौथे दिन बच्चों ने वही किया जो आदित्य ने सिखाया था। उन्होंने उसे छाँव में सूखने दिया, और उसके ऊपर गीले कपड़े डाल दिए।
आदित्य ने किले के ऊपर एक छोटा सा संदेश भी लिखा, "कच्ची मिट्टी से बने इस किले में हमारी मेहनत और एकता की शक्ति छुपी है।" यह किला अब गाँव का एक खास आकर्षण बन गया था। लोग दूर-दूर से इसे देखने आते और बच्चों की इस कला की सराहना करते।
इस अनुभव से आदित्य ने यह सीखा कि कच्ची मिट्टी सिर्फ एक साधारण वस्तु नहीं है, बल्कि यह एक शक्तिशाली सामग्री है, जिससे बहुत कुछ बनाया जा सकता है, यदि हमारी सोच और मेहनत सही दिशा में हो। आदित्य का सपना सच हो चुका था, और वह अब कच्ची मिट्टी के संसार में नए-नए प्रयोग करता रहता था।
मेला ख़त्म होने के बाद भी वह किला कई महीनों तक खड़ा रहा। बरसात में वह घुलने लगा और धीरे-धीरे वापस ज़मीन में मिल गया। बच्चों को बुरा लगा। आदित्य ने कहा कि बुरा मानने की बात नहीं है, क्योंकि मिट्टी कहीं गई नहीं। अगली गर्मियों में वे उसी जगह से मिट्टी उठाकर दोबारा शुरू कर सकते हैं। और अगले साल उन्होंने यही किया।