रेवती के गाँव में एक ही अलमारी थी जिसमें किताबें रखी रहती थीं, और वह स्कूल के मास्टरजी के कमरे में थी। रेवती आठ साल की थी और उसके लंबे बाल हमेशा आँखों पर गिरते रहते थे। वह रोज़ छुट्टी के बाद उस अलमारी के सामने जाकर खड़ी हो जाती। पढ़ना उसे अभी ठीक से आता नहीं था। पर वह किताबें देखती रहती, जैसे उनमें से कोई अपने आप खुल जाएगी। मास्टरजी ने एक दिन पूछा कि वह रोज़ यहाँ क्यों खड़ी होती है। रेवती के पास जवाब नहीं था, इसलिए वह भाग गई। अगले दिन वह फिर वहीं खड़ी थी।
अलमारी में शीशा लगा था। इसीलिए वह खड़ी हो पाती थी।
शीशे के पीछे किताबें कतार में खड़ी थीं और उनमें से चौदह की जिल्दों पर तस्वीरें थीं। रेवती ने वे चौदह तस्वीरें इतनी बार देखी थीं कि उसे आँख बंद करके भी याद थीं।
एक पर हरे कपड़े वाला आदमी था जो एक पुल पर खड़ा था और नीचे देख रहा था। एक पर दो बकरियाँ थीं, आमने-सामने। एक पर सिर्फ़ एक जूता था, एक ही, बीच में रखा हुआ।
बाक़ी ग्यारह भी उसे याद थीं। एक पर एक बड़ा पीला पक्षी था जिसकी चोंच लाल थी। एक पर बारिश थी। उसमें कोई छाता नहीं था। एक पर सिर्फ़ एक खिड़की बनी थी, खुली हुई, और खिड़की के पार कुछ नहीं था, बस सफ़ेद। वह सफ़ेद वाली उसे सबसे ज़्यादा परेशान करती थी।
अलमारी में ताला लगा रहता था और चाबी मास्टरजी के पास रहती थी।
रेवती ने तीन बार कोशिश की।
पहली बार उसने माँग लिया। मास्टरजी ने समझाया कि ये किताबें चौथी और पाँचवीं वालों के लिए हैं और वह दूसरी में है। यह ग़लत बात नहीं थी। किताबें सचमुच बड़ी थीं और उनमें तस्वीरें कम थीं।
दूसरी बार वह दोपहर में गई, जब मास्टरजी खाना खाने घर जाते हैं। ताला लगा था। हमेशा लगा रहता था। यह उसे पहले से मालूम था। वह फिर भी गई।
तीसरी बार वह कुछ लेकर गई। उसके पास देने को क्या था, यह उसने बहुत सोचा था। आख़िर में वह अपनी बड़ी बहन की एक पुरानी कॉपी ले गई, जिसके पिछले पन्ने ख़ाली थे। मास्टरजी ने कॉपी ले ली और शुक्रिया कहा और अलमारी नहीं खोली।
इसके बाद उसने माँगना छोड़ दिया।
जो उसने शुरू किया, वह अलग चीज़ थी और उसने उसे शुरू भी नहीं किया। वह अपने आप हो गया।
छुट्टी के बाद पीपल के नीचे छोटे बच्चे बैठे रहते हैं, वे जो अभी पहली में भी नहीं गए। रेवती वहीं बैठकर उन्हें बताने लगी कि हरे कपड़े वाला आदमी पुल पर क्यों खड़ा है।
उसकी कहानी में वह आदमी अपनी भैंस ढूँढ़ रहा था। भैंस पानी में थी और उसे दिख नहीं रही थी, क्योंकि भैंस काली है और पानी भी काला दिखता है। इसलिए वह वहाँ रोज़ खड़ा होता है और रोज़ शाम तक खड़ा रहता है।
दो बकरियों वाली तस्वीर पर उसकी कहानी यह थी कि दोनों बहनें हैं और लड़ नहीं रही हैं, बस एक-दूसरे को देख रही हैं, क्योंकि सुबह से किसी ने उन्हें कुछ नहीं खिलाया।
जूते वाली सबसे अच्छी थी। जूता एक ही क्यों है, इस पर रेवती के पास चार कहानियाँ थीं और वह हर बार अलग सुनाती थी।
बच्चों को चारों पसंद थीं। सबसे ज़्यादा एक। उसमें जूता किसी का खोया हुआ नहीं है। उसमें एक लड़की ने अपना एक जूता जान-बूझकर बीच रास्ते में रख दिया है, ताकि जो भी उधर से गुज़रे वह रुके और नीचे देखे। रेवती ने यह नहीं बताया कि उसने ऐसा क्यों किया था। उससे पूछा गया तो उसने कहा कि अगली बार बताएगी, और अगली बार उसने दूसरी कहानी सुना दी।
बच्चे रोज़ आने लगे। फिर कुछ बड़े बच्चे भी पीछे खड़े होकर सुनने लगे, यह कहते हुए कि वे बस ऐसे ही खड़े हैं।
मास्टरजी ने यह चार दिन देखा।
पाँचवें दिन उन्होंने अलमारी खोली। जूते वाली किताब निकाली। और उसे दे दी।
उन्होंने कोई शर्त नहीं रखी और बस किताब देकर चले गए।
रेवती उस किताब को घर ले गई और उसे खोलकर बैठ गई।
उसे पढ़ना नहीं आता था। इतना आता था कि अक्षर पहचान ले, पर अक्षर पहचानना और पढ़ना दो अलग चीज़ें हैं। उसने पंद्रह दिन लगाए और वह भी अपनी बहन से पूछ-पूछकर।
किताब वाली कहानी में जूता एक बच्चे का था। वह नदी में गिरा था और बच गया था। जूता बह गया।
रेवती को वह कहानी बिलकुल अच्छी नहीं लगी।
उसने मास्टरजी से यही कहा। उसने कहा कि यह वाली उसकी वाली से कमज़ोर है, क्योंकि इसमें जूता ख़ास नहीं है, वह बस गिर गया है।
मास्टरजी ने सिर हिलाया और माना कि कमज़ोर है।
यह उन्होंने बहलाने के लिए नहीं कहा था। उन्होंने किताब उठाकर वह पन्ना फिर से पढ़ा और कुछ देर बाद कहा कि इसमें जूते की ज़रूरत ही नहीं थी, बच्चा जूते के बिना भी गिर सकता था और बच सकता था।
रेवती को इसकी उम्मीद नहीं थी और वह चुप हो गई। फिर मास्टरजी ने कहा कि किताब में जो लिखा है वह एक आदमी ने लिखा है, और आदमी से कमज़ोर कहानी भी बन जाती है, और यह पता करने का एक ही तरीक़ा है।
उस बरस रेवती ने पढ़ना सीख लिया।
वह इसलिए नहीं सीखा कि किसी ने उसे बिठाया। वह इसलिए सीखा कि अब उसे हर बार जाँचना पड़ता था।
तीसरे महीने से मास्टरजी दोपहर में अलमारी खुली छोड़ने लगे। चाबी ताले में ही लगी रहती थी।
जाड़ों तक वह चाबी कहीं गिर गई। किसी ने उसे ढूँढ़ा नहीं, क्योंकि उसकी ज़रूरत महीनों से किसी को पड़ी ही नहीं थी।