बगिया के कोने में, दीवार के पास, नन्हे-मुन्ने फूल खिलते थे। इतने छोटे कि माली कभी-कभी उन्हें गिनना ही भूल जाता, और पानी देते वक़्त झारी उनके ऊपर से यूँ ही निकाल ले जाता। पर सुबह जब पहली धूप दीवार पर उतरती, सबसे पहले वही चमकते थे। उनकी पंखुड़ियों पर रात की ओस अब भी टिकी रहती, और हवा चलती तो पूरी बगिया में सबसे पहले उन्हीं की खुशबू पहुँचती। तितलियाँ भी सबसे पहले उसी कोने में उतरतीं। बड़े फूलों के पास वे बाद में जाती थीं।

बगिया के बीचोंबीच बड़े फूल खिलते थे। लंबा सूरजमुखी, गहरे लाल गुलाब, और मोटे-मोटे गेंदे। माली उनके लिए अलग क्यारी बनाता, अलग खाद डालता, और कोई मेहमान आता तो सबसे पहले उन्हीं की तरफ़ ले जाता। मेहमान रुककर तस्वीरें खींचते, तारीफ़ करते, और लौट जाते। बड़े फूलों को यह सब बहुत अच्छा लगता था। धीरे-धीरे उन्हें लगने लगा कि बगिया उन्हीं की वजह से बगिया है।

एक दोपहर सूरजमुखी ने अपनी लंबी गर्दन नीचे झुकाई। 'ज़रा उधर देखो,' उसने कहा। 'दीवार के पास वाले। इतने छोटे कि हवा चले तो पता भी न चले कि हैं भी या नहीं।' गेंदा हँस पड़ा। 'इनकी खुशबू भी इतनी ही छोटी होगी। दो क़दम दूर से सुनाई ही नहीं देती।' नन्हे फूल चुप रहे। उन्हें बुरा लगा, पर उन्होंने जवाब नहीं दिया। अगली सुबह फिर आई, ओस फिर उतरी, और वे फिर खिल गए।

मस्ती भरा अगला पल

एक तितली रोज़ उसी कोने में आती थी। नन्हे फूलों ने उसका नाम रखा था: चंचल। वह सुबह-सुबह आती, थोड़ी देर उनके ऊपर मँडराती, फिर बगिया का चक्कर लगाने चली जाती। एक दिन उसने पूछा, 'तुम्हें बुरा नहीं लगता, जब वे ऐसा कहते हैं?' 'लगता है,' सबसे छोटे फूल ने कहा। 'पर हम खिलना तो नहीं छोड़ सकते।' चंचल कुछ देर सोचती रही। फिर बोली, 'यही सबसे बड़ी बात है।'

एक शाम माली की पोती बगिया में आई। वह घुटनों के बल बैठी और देर तक दीवार के पास वाले कोने को देखती रही। फिर उसने दो नन्हे फूल तोड़े और भागकर घर के भीतर चली गई। अगली सुबह वे दोनों फूल रसोई की खिड़की पर एक छोटे काँच के गिलास में रखे थे। वहाँ से पूरी बगिया दिखती थी। सूरजमुखी ने यह देखा, पर कुछ कहा नहीं।

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फिर सावन आया। एक दोपहर आसमान अचानक भूरा हो गया। चिड़ियाँ पेड़ छोड़कर उड़ गईं। हवा में मिट्टी की गंध भर गई, और दूर कहीं कुछ गिरने की आवाज़ आई। माली भागा-भागा आया। उसने सूरजमुखी के तने को बाँस से बाँधा, गुलाब की क्यारी पर बोरी डाली, गेंदों के चारों तरफ़ ईंटें रखीं, और गेट बंद करके भीतर चला गया। दीवार के पास वाले कोने में वह गया ही नहीं। उसे याद ही नहीं आया।

तूफ़ान रात भर चला। हवा इतनी तेज़ थी कि दीवार पर टिकी बाल्टी लुढ़कती हुई बगिया के दूसरे छोर तक चली गई। बड़े फूल पहले झूमे, फिर झुके, फिर टूटने लगे। बाँस भी उखड़ गया। बोरी उड़ गई। सूरजमुखी ने पूरी रात ऊपर रहने की कोशिश की, पर भोर से थोड़ा पहले उसका तना बीच से चटक गया। सुबह जब हवा थमी, बगिया के बीच का हिस्सा खाली था। गेंदे की पंखुड़ियाँ पूरी क्यारी में बिखरी पड़ी थीं।

दीवार के पास वाला कोना वैसा का वैसा था। नन्हे फूल रात भर दीवार से सटे रहे थे। वे इतने छोटे थे कि हवा उनके ऊपर से निकल गई। उनकी पंखुड़ियों पर मिट्टी जमी थी और एक-दो पत्तियाँ मुड़ गई थीं, पर एक भी फूल टूटा नहीं था। सुबह की पहली धूप उतरी तो वे रोज़ की तरह चमक उठे।

एक छोटी सी जीत

दोपहर तक माली ने बगिया साफ़ की। उसने टूटे तने उठाए, क्यारी दोबारा बनाई, और नए बीज बोए। काम ख़त्म करके जाते-जाते वह दीवार के पास रुका। उसने पहली बार नन्हे फूलों को ध्यान से देखा, जैसे वे आज ही उगे हों। फिर उसने झारी उठाई और सीधे उन्हीं पर पानी डाला।

गुलाब, जो किसी तरह बचा रह गया था, ने धीरे से कहा, 'हमने तुम्हारा मज़ाक उड़ाया था।' 'हाँ,' नन्हे फूलों ने कहा। 'और तुमने कुछ कहा भी नहीं।' 'कहते तो खिलने का वक़्त निकल जाता।' गुलाब को जवाब नहीं सूझा। फिर उसने अपनी बची हुई पंखुड़ियाँ थोड़ी और खोल दीं, जितनी खुल सकती थीं।

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उस साल बगिया दोबारा भरी। नए सूरजमुखी उगे, नए गेंदे खिले, और मेहमान फिर उन्हीं की तरफ़ जाने लगे। किसी ने दीवार के पास वाले कोने की तरफ़ ध्यान नहीं दिया। पर हर सुबह, सबसे पहले, माली अब वहीं से पानी देना शुरू करता था। रसोई की खिड़की पर काँच का गिलास अब भी रखा रहता था। और चंचल तितली, रोज़ की तरह, सबसे पहले उसी कोने में उतरती थी।