बनवारी खेत से लौटने में अक्सर देर कर देता था। रास्ता आधे घंटे का था और वह उसे रोज़ पार करता था, अँधेरे में भी, बिना लालटेन के। गाँव में कहानियाँ बहुत थीं। उस मोड़ की, उस पेड़ की, उस सूखे कुएँ की। बनवारी ने कभी उन पर ध्यान नहीं दिया। वह किसान था। उसके पास डरने का वक़्त नहीं था।
मोड़ और पेड़ की कहानियाँ उसने बचपन से सुनी थीं और उन पर कभी यक़ीन नहीं किया था। मोड़ पर कोई तीस बरस पहले एक बैलगाड़ी पलटी थी और उसके बाद से लोग कहते हैं कि वहाँ रात में घंटी सुनाई देती है। पेड़ के बारे में कहा जाता है कि उस पर कोई लटका था, हालाँकि किसी को न उसका नाम याद है और न बरस। ऐसी बातें हर गाँव में उतनी ही होती हैं जितने वहाँ पुराने पेड़ हों।
सूखे कुएँ पर वह रोज़ रुकता था। वहाँ कुछ था इसलिए नहीं; रास्ते में वही एक जगह थी जहाँ मेड़ चौड़ी है और आदमी बैठ सकता है। बैठकर वह बीड़ी पीता और एक पत्थर उठाकर कुएँ में डाल देता। यह उसकी आदत थी और आदतों की वजह नहीं होती।
पत्थर गिरने में जो वक़्त लगता, वह बनवारी को रटा हुआ था। एक, दो, और फिर सूखी आवाज़, जैसे पत्थर पत्थर पर गिरा हो। कुआँ उसके बाप के ज़माने से सूखा था और उससे पहले से भी। गाँव में उससे पानी किसी ने नहीं खींचा, किसी को याद नहीं।
जेठ की उस शाम उसने पत्थर डाला और गिनना शुरू किया।
एक। दो। छपाक।
बनवारी वहीं बैठा रहा। फिर उसने दूसरा पत्थर डाला, बड़ा वाला, और इस बार आवाज़ और साफ़ आई। पानी की आवाज़ को कोई ग़लत नहीं समझ सकता, ख़ासकर वह आदमी जो चालीस साल से खेत में पानी चला रहा हो।
उसने झुककर अंदर देखा, हालाँकि इससे कुछ होना नहीं था। कुएँ का मुँह चौड़ा है और अंदर अँधेरा रहता है, दिन में भी। उसे कुछ नहीं दिखा। उसने माचिस जलाकर नीचे की तरफ़ की और तीली उसके हाथ में ही बुझ गई, जबकि उस शाम हवा नहीं चल रही थी।
घर पहुँचकर उसने अपनी औरत से पूछा कि कुएँ में पानी आ सकता है क्या। उसने कहा कि बरसात में तो नीचे नमी आ ही जाती होगी। बनवारी ने कहा कि जेठ चल रहा है। इस पर वह चुप हो गई और थोड़ी देर बाद रोटी की बात करने लगी।
अगली शाम उसने फिर पत्थर डाला। एक, दो, और सूखी आवाज़। वही पुरानी वाली।
उसे इससे चैन मिलना चाहिए था, और मिला भी, पूरे तीन दिन तक।
चौथे दिन छपाक फिर हुआ, और इस बार गिनती में एक ही आया। एक, और छपाक।
इसका मतलब बनवारी को तुरंत समझ आ गया, क्योंकि यह हिसाब उसका रोज़ का था। कम गिनती का मतलब कम गहराई। कम गहराई का मतलब यह कि पानी ऊपर आ रहा है।
रात भर वह छत पर पड़ा रहा और यह सोचता रहा कि जो चीज़ ऊपर आ रही है, उसे वह किसी को किस तरह बताएगा। सूखे कुएँ में पानी आ जाना अपने आप में बुरी ख़बर नहीं है, बल्कि गाँव के लिए अच्छी ख़बर है, और अगर वह सुबह जाकर यही कहता तो लोग देखने आते और ख़ुश होते। दिक़्क़त यह थी कि पानी दिखता नहीं था, सिर्फ़ सुनाई देता था, और इतनी-सी बात कहने लायक़ नहीं होती।
उस रात वह सोया नहीं। सुबह उसने अपनी लड़की को स्कूल भेजते हुए पहली बार यह देखा कि वह किस रास्ते से जाती है। वही रास्ता था। मेड़ वाला, कुएँ के बग़ल से निकलता हुआ। गाँव के सारे बच्चे उसी से जाते हैं, और उनमें से आधे कुएँ में पत्थर डालते हैं, क्योंकि बच्चे यही करते हैं।
उसने लड़की से कहा कि कुएँ के पास मत रुकना। उसने पूछा कि क्यों, और बनवारी के पास इसका कोई जवाब नहीं था जो एक बच्ची के सामने कहा जा सके। उसने कहा कि गिर जाओगी, और लड़की ने कहा कि वह तो कभी नहीं गिरी। यह बात सही थी।
पंचायत में कुआँ बंद कराने की बात उसने उठाई और उसने डूबने का ख़तरा बताया, क्योंकि वही एक बात थी जिस पर लोग सिर हिलाते हैं। किसी ने विरोध नहीं किया, पर पैसे का सवाल आया। पत्थर की सिल और मज़दूरी में जो लगता, उसका आधा बनवारी ने अपने पास से देने को कहा। इसके बाद बात बन गई।
सिल पड़ोस के गाँव से आनी थी और वहाँ के पत्थर वाले ने कहा कि दस दिन लगेंगे, क्योंकि उतनी बड़ी सिल तैयार रखी नहीं रहती और उसे काटना पड़ता है। बनवारी ने पूछा कि इससे जल्दी नहीं हो सकता क्या, और उस आदमी ने वही जवाब दिया जो ऐसे मौक़ों पर हमेशा मिलता है, कि जल्दी में काम ख़राब होता है। बनवारी ने इस पर कोई बहस नहीं की और लौट आया।
सिल दस दिन बाद आनी थी। उन दस दिनों में उसने रोज़ शाम को एक पत्थर डाला और रोज़ गिना। गिनती घटती गई। आठवें दिन वह एक से भी कम थी, यानी पत्थर हाथ से छूटते ही आवाज़ आ जाती थी।
नौवें दिन उसने फिर झुककर देखा। अब भी कुछ नहीं दिखा और यह उसे और बुरा लगा, क्योंकि इतनी ऊँचाई पर पानी होता तो दिन की रोशनी में चमकता।
सिल दसवें दिन दोपहर को आई। उसे रखने में चार आदमी लगे और उसके चारों तरफ़ चूना-गारा भरा गया। काम शाम तक ख़त्म हो गया और लोग चले गए।
सबसे आख़िर में बनवारी गया। जाने से पहले उसने अपनी जेब से एक पत्थर निकाला, जो वह सुबह से रखे हुए था, और उसे सिल के किनारे बची हुई उस उँगली भर जगह से नीचे डाल दिया, जहाँ अभी गारा नहीं भरा था।
कोई आवाज़ नहीं आई। न सूखी, न पानी की। उसने कान लगाकर देर तक सुना और उसे अपनी ही साँस के अलावा कुछ सुनाई नहीं दिया। फिर उसने वह जगह भी गारे से भर दी, अपने हाथ से, और घर लौट आया।