कछुए का नाम तूफान था। यह नाम उसके दादा ने रखा था, और जंगल में यह सबसे अच्छा मज़ाक माना जाता था। तोते उसे देखकर चिल्लाते, 'आ गया तूफान!' और हँसते रहते। तूफान चुपचाप निकल जाता। उसे नाम से कोई शिकायत नहीं थी। शिकायत इस बात से थी कि लोग हँसने से पहले उसे पूरा देखते भी नहीं थे।

दौड़ का सपना उसने कभी किसी के आगे नहीं रखा था। एक बार रखा था, बहुत छोटा था तब, और उसकी माँ ने कहा था कि कछुए दौड़ते नहीं। यह डाँट नहीं थी, बस एक बात थी। पर तूफान ने उसके बाद किसी से नहीं कहा। वह रोज़ भोर में उठकर तालाब के चक्कर लगाता था, अकेले, जब कोई देखने वाला नहीं होता था।

तालाब के चक्कर का हिसाब उसने अपने आप बनाया था। एक चक्कर में उसे उतना वक़्त लगता था जितने में सूरज ताड़ के पेड़ की चोटी से उतरकर उसकी जड़ तक आ जाए, और यह हिसाब उसे इतनी बार दोहराने से याद हो गया था। शुरू के साल वह दो चक्कर लगाता था, फिर तीन, और जिस बरस दौड़ हुई उस बरस वह सात लगा रहा था। सातवें के बाद भी वह हाँफता नहीं था। भोर में तालाब पर धुँध रहती है और उस धुँध में कोई देखने नहीं आता, जो उसके लिए ठीक ही था।

जंगल की दौड़ हर साल पहली बारिश के बाद होती थी। यह कोई छोटी दौड़ नहीं थी। तालाब से शुरू होकर पहाड़ी के पीछे वाले पुराने बरगद तक जाना था और वहाँ से एक पत्ता लेकर लौटना था। लौटकर वह पत्ता बूढ़े साही को देना होता था, जो शुरू में भी बैठता था और आख़िर में भी।

नाम लिखाने वाले दिन तूफान क़तार में सबसे पीछे खड़ा था। जब उसका नंबर आया तो साही ने दो बार पूछा। तोते ऊपर डाल पर बैठे थे और उनमें से एक ने कहा कि बरगद तो शाम तक भी नहीं आएगा। तूफान ने नाम लिखवा दिया। घर लौटकर उसे लगा कि उसे यह नहीं करना चाहिए था, और यह बात उसने रात भर सोची।

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दौड़ वाली सुबह पूरा जंगल तालाब के किनारे था। खरगोश था, चीतल था, दो सियार थे, एक नेवला था और एक लंगूर था जो पेड़ों से जाने की ज़िद कर रहा था और जिसे मना कर दिया गया। तूफान सबसे किनारे खड़ा था। साही ने पत्थर पर पत्थर मारा और सब चल दिए।

पहले कुछ मिनट में सब आँख से ओझल हो गए। धूल बैठ गई। तूफान अकेला रह गया और उसने चलना शुरू किया, उसी रफ़्तार से जिससे वह भोर में तालाब के चक्कर लगाता था।

आधी दौड़ तक तूफान अकेला था। बाकी जानवर आगे निकल चुके थे और पीछे कोई था नहीं। रास्ता चढ़ाई वाला था और धूप तेज़ थी। एक जगह उसे लगा कि अब और नहीं होगा। वह रुका। पानी पिया। फिर उसे भोर वाले वे चक्कर याद आए, जो किसी ने नहीं देखे थे। वह उठा और चल दिया।

बरगद पर वह दोपहर ढले पहुँचा। वहाँ कोई नहीं था। ज़मीन पर पैरों के निशान थे और एक जगह चीतल के सींग से टूटी हुई एक डाल पड़ी थी। तूफान ने एक पत्ता उठाया, उसे मुँह में दबाया, और लौटने लगा।

लौटने वाला रास्ता उतार का था और उतार कछुए के लिए चढ़ाई से आसान नहीं होता। शाम होने लगी। एक जगह उसने खरगोश को देखा, जो एक झाड़ी के पास बैठा था और उसने तूफान की तरफ़ देखा भी नहीं। खरगोश बरगद तक पहुँच चुका था। पत्ता वह नहीं लाया था, क्योंकि लौटते वक़्त उसे यह बात याद ही नहीं रही।

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लौटते हुए रास्ते में उसे बाक़ी दौड़ के निशान मिलते रहे। एक जगह सियार के पंजों के निशान आधे रास्ते से मुड़कर वापस जा रहे थे। चीतल शायद बरगद तक पहुँचा ही नहीं, क्योंकि पहाड़ी के उस तरफ़ बारिश के बाद नई घास निकल आई थी और चीतल नई घास के आगे किसी चीज़ का हिसाब नहीं रखता। नेवला कहीं नहीं दिखा। लंगूर पेड़ों के रास्ते चला गया था, जो मना था, इसलिए उसका नाम शुरू में ही काट दिया गया।

तालाब पर तूफान अँधेरा होने से थोड़ा पहले पहुँचा। भीड़ नहीं थी। ज़्यादातर जानवर घर जा चुके थे, क्योंकि दौड़ ख़त्म होने का कोई वक़्त तय नहीं था और सब यह मान चुके थे कि इस बार कोई पत्ता नहीं आएगा। साही अपनी जगह पर बैठा था। तूफान ने पत्ता उसके सामने रख दिया।

जीत के बाद जो सबसे अजीब बात हुई, वह यह थी कि तोते चुप हो गए। उन्होंने बधाई नहीं दी। उन्होंने मज़ाक भी नहीं उड़ाया। वे बस चुप रहे। तूफान को यह बुरा नहीं लगा। सच कहें तो उसे इसी की सबसे ज़्यादा आदत डालनी पड़ी।

अगले कुछ दिन जंगल में इसी की बात होती रही, फिर बारिश आ गई और बात ख़त्म हो गई। तूफान से यह किसी ने नहीं पूछा कि हुआ कैसे। एक ही जानवर ने पूछा, वह बूढ़ा साही, और उसका सवाल यह था कि तुम रोज़ भोर में कितने चक्कर लगाते हो। तूफान ने बता दिया। साही ने सिर हिलाया और कुछ और नहीं पूछा।

अगली भोर तूफान रोज़ की तरह तालाब के चक्कर लगाने निकला। इस बार वह अकेला नहीं था। किनारे पर दो छोटे कछुए खड़े थे, जो उसका इंतज़ार कर रहे थे। तूफान ने उनसे कुछ पूछा नहीं। वह बस चलने लगा, अपनी उसी रफ़्तार से, और दोनों पीछे-पीछे चल दिए।