आसमान में सारे बादल सफ़ेद थे। सिर्फ़ एक नहीं। रूपा गुलाबी थी; हल्की, चमकती हुई गुलाबी, जैसे किसी ने भोर की पहली रोशनी समेटकर एक छोटे-से बादल में भर दी हो। यही बात उसे सबसे अलग बनाती थी, और यही बात उसे सबसे अकेला भी। सुबह जब बादलों की कतार पूरब से पश्चिम की ओर चलती, रूपा सबसे पीछे रह जाती। बड़े बादल आगे-आगे उड़ते, आपस में बातें करते, कभी-कभी मिलकर बरसते। रूपा उनके पीछे-पीछे जाती और कतार में अपनी जगह ढूँढ़ती रहती। कोई उसे चिढ़ाता नहीं था। कोई उसे भगाता भी नहीं था। बस कोई उसके साथ खेलता भी नहीं था।
रूपा अक्सर आकाश में उड़ते हुए सोचती थी, 'क्या मैं कभी अपने सपने को पूरा कर सकूँगी?' वह दिन-प्रतिदिन अपने आस-पास के बादलों को देखती और उनके रंगों को देखकर थोड़ी उदास हो जाती। सभी बादल सफेद, काले या हल्के नीले रंग के थे, जो उन्हें सामान्य बनाता था। लेकिन रूपा का रंग गुलाबी था, जो उसे खास बनाता था और यही उसकी पहचान थी। वह सोचती, 'क्यों न मैं इसी खासियत का उपयोग करूँ?' लेकिन कैसे, यह सवाल हमेशा उसके मन में रहता।
उसने कई बार सफ़ेद दिखने की कोशिश की। वह ऊँचाई बदलती, जहाँ हवा ठंडी थी। वह पतली फैल जाती, जितनी फैल सकती थी। कुछ देर के लिए फ़र्क़ पड़ता भी था। फिर धूप पड़ती और वह फिर गुलाबी हो जाती। एक दिन उसने कोशिश करना छोड़ दिया।
रंग-बिरंगा दिन
एक दिन, जब सूरज की किरणें आकाश में सुनहरी आभा बिखेर रही थीं, रूपा ने सोचा, 'अगर मैं खुद को दूसरों से अलग करके कुछ अच्छा कर सकूं तो क्या होगा?' उसने अपनी आँखें बंद की और गहरी सांस लेते हुए मन ही मन विचार किया, 'मेरे पास गुलाबी रंग है, तो क्यों न मैं इसी रंग में कुछ खास करूँ?' यह सोचकर रूपा के मन में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ।
अगले दिन, रूपा ने आकाश में ऊँची उड़ान भरी। वह सूरज की ओर बढ़ी, उसकी गर्मी को महसूस करते हुए अपने भीतर की शक्ति को पहचानने लगी। अचानक, उसे अपने सपने को पूरा करने का तरीका सूझा। रूपा ने अपनी गुलाबी रंगत को धीरे-धीरे आकाश में फैलाना शुरू किया। जब उसने अपनी रंगत से आकाश को रंगा, तो आकाश का दृश्य अद्भुत हो गया। सूरज की किरणें उसकी गुलाबी रंगत से मिलकर और भी जादुई लगने लगीं।
उस दोपहर आसमान बिलकुल ख़ाली था। बाकी सारे बादल पूरब की तरफ़ चले गए थे, जहाँ बारिश होनी थी। रूपा अकेली रह गई, बीच आसमान में। नीचे ज़मीन पर एक बच्ची छत पर खड़ी थी और ऊपर देख रही थी। रूपा ने पहली बार यह देखा कि कोई उसे देख रहा है।
रूपा ने देखा कि उसकी रंगत से आकाश में एक नई रोशनी फैल रही थी। धीरे-धीरे अन्य बादल भी उसकी रंगत को देखकर प्रभावित हुए और उन्होंने भी अपने रंग में बदलाव लाने का सोचा। रूपा के गुलाबी रंग ने सभी बादलों को अपनी ओर आकर्षित किया। अब पूरा आकाश गुलाबी रंग में रंग चुका था। आकाश की यह खूबसूरती सभी को बहुत पसंद आई। लोग आसमान को देखकर अचंभित रह गए और प्रकृति की इस अनोखी छटा की प्रशंसा करने लगे।
उस बच्ची ने अगले दिन भी ऊपर देखा। फिर उसके अगले दिन भी। रूपा को यह अजीब लगा। बाकी बादल आते-जाते रहते थे। कोई रुककर उन्हें नहीं देखता था। पर वह बच्ची रोज़ उसी वक़्त छत पर आती और ऊपर देखती। रूपा ने बिना सोचे उसी रास्ते पर उड़ना शुरू कर दिया।
जब दोस्ती काम आई
रूपा को यह देखकर बहुत खुशी हुई कि उसने अपने सपने को सच कर दिखाया। अब वह समझ चुकी थी कि अपनी विशेषता को अपनाकर और खुद पर विश्वास करके किसी भी मुश्किल को पार किया जा सकता है। उसने यह भी जाना कि जब हम अपनी अद्वितीयता को स्वीकार करते हैं, तब हम सच में अपनी पूरी क्षमता का प्रयोग कर पाते हैं।
शाम होते-होते हवा बदली और सूरज नीचे उतरने लगा। रोशनी तिरछी पड़ी। रूपा को कुछ करना नहीं पड़ा। वह बस वहीं थी, जहाँ थी। उसका रंग फैला। पहले थोड़ा। फिर और। फिर पूरे आसमान में।
रूपा ने आकाश में एक ओर उड़ान भरी और उसे एहसास हुआ कि सपने सच तभी होते हैं जब हम अपनी खुद की पहचान को स्वीकार करते हैं और उसी के साथ आगे बढ़ते हैं। अब वह अपने सपने को पूरा करने के बाद हर रोज़ आकाश में उड़ान भरती थी, उसकी हर उड़ान में गर्व और संतोष का अनुभव होता था।
उस शाम नीचे ज़मीन पर कई बच्चे रुककर ऊपर देखने लगे। रूपा ने महसूस किया कि वह अकेली नहीं थी। बस सबसे पहले थी। अगले दिन बाकी बादल लौट आए और कतार फिर बन गई। रूपा फिर सबसे पीछे थी। पर अब उसे इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था, क्योंकि उसे पता था कि शाम किसकी होती है।