उस दोपहर सूरज ने पहली बार अपना रास्ता बदला। रोज़ वह पूरब से निकलकर सीधे पश्चिम की तरफ़ चलता था, बिना रुके, बिना इधर-उधर देखे। पर उस दिन उसने आसमान के एक कोने में कुछ देखा: एक बादल, अकेला, बहुत धीरे-धीरे तैरता हुआ, जैसे उसे कहीं पहुँचने की कोई जल्दी न हो। सूरज उसी तरफ़ मुड़ गया।

रोज़ के रास्ते में क्या-क्या आता है, यह सूरज को रटा हुआ था। पहले नदी। फिर वह पुल जिस पर सुबह भीड़ होती है। फिर स्कूल का मैदान, फिर खेत, और आख़िर में वह पहाड़ी जिसके पीछे उसे उतरना होता है। इतने बरसों में इसमें कुछ नहीं बदला था, सिवाय इसके कि खेत कभी हरे होते और कभी पीले।

सावन के दिन थे। नीचे गाँव के बच्चे छत पर चढ़े हुए थे, क्योंकि बारिश के बाद छत सबसे अच्छी जगह होती है। सूरज ने उन्हें देखा। वे ऊपर ही देख रहे थे, पर सूरज को नहीं देख रहे थे। वे उसी बादल को देख रहे थे।

पास पहुँचकर उसने पूछा कि तुम इतने धीरे क्यों चलते हो। बादल बोला कि उसे कहीं पहुँचना नहीं है। सूरज को यह जवाब अजीब लगा। उसे तो रोज़ पहुँचना होता है, और वक़्त पर पहुँचना होता है।

फिर सूरज ने वह बात कही जो वह बरसों से किसी से कहना चाहता था। उसने कहा कि वह रोज़ एक ही रास्ते पर चलता है और उसने आज तक कुछ नया नहीं देखा।

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बादल ने कहा कि आज देख लो।

रास्ते में सूरज ने पूछा कि तुम करते क्या हो। बादल बोला कि वह भरता है और ख़ाली होता है। भरने में कई दिन लगते हैं। ख़ाली होने में कुछ मिनट। बीच का सारा वक़्त वह बस तैरता रहता है और नीचे देखता रहता है।

बादल जिस तरफ़ ले गया, वहाँ आसमान अलग था। नीचे कुछ देर पहले बारिश हो चुकी थी और हवा में नमी टिकी हुई थी। बादल ने कहा कि यहीं रुको और थोड़ा नीचे झुको। सूरज ने वैसा ही किया, और तभी उसे नीचे वह चीज़ दिखी जो उसने पहले कभी नहीं देखी थी।

नीचे ज़मीन गीली थी और उस पर हवा में पानी की बहुत छोटी-छोटी बूँदें टिकी हुई थीं। सूरज की रोशनी उन बूँदों में घुसी और मुड़ गई। और मुड़कर वह सात हिस्सों में बँट गई।

आसमान में एक पट्टी बन गई। लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, और उसके बाद दो और रंग जिनके नाम सूरज को नहीं आते थे।

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सूरज ने वह पट्टी देखी और उसे यक़ीन नहीं हुआ कि वह उसकी अपनी रोशनी है।

उसने उसे दोबारा बनाना चाहा। वह थोड़ा ऊपर गया और नीचे देखा। बूँदें वहीं थीं। रोशनी भी वहीं थी। कुछ नहीं बना।

वह दूसरी तरफ़ गया और वहाँ से देखा। बूँदें इस बार चमकीं ज़रूर। पर सफ़ेद चमकीं। कुछ नहीं बना।

वह और नीचे झुका, बहुत नीचे, इतना कि उसकी रोशनी सीधे बूँदों पर पड़े। फिर भी कुछ नहीं बना।

तीनों बार बादल कुछ नहीं बोला। चौथी बार जब सूरज रुका, तब बादल ने कहा कि तुम्हें मेरे पीछे रहना पड़ेगा।

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सूरज को यह बात पसंद नहीं आई। पीछे रहना उसकी आदत में नहीं था।

पर उसने वैसा किया। वह बादल के पीछे गया और नीचा रहा, और तभी वह पट्टी फिर बन गई, पहले से भी चौड़ी।

नीचे शोर हुआ। बच्चे छत पर उछलने लगे। उनमें से एक भागकर नीचे गया और अपनी दादी को बुला लाया। एक कुत्ता भी भौंकने लगा, हालाँकि कुत्ते को रंग वैसे नहीं दिखते जैसे बच्चों को दिखते हैं। सूरज ने यह सब देखा, और उसे यह पट्टी से भी अच्छा लगा।

सूरज ने पूछा कि तुम्हें यह कैसे मालूम था। बादल ने कहा कि उसने यह पहले भी देखा है, कई बार, अलग-अलग जगहों पर। सूरज ने पूछा कि फिर तुमने किसी को बताया क्यों नहीं। बादल ने कहा कि आज तक कोई इतना नीचे आया ही नहीं।

'तुम्हें बुरा नहीं लगता?' सूरज ने पूछा। 'किस बात का?' 'कि लोग मुझे रोज़ देखते हैं, और तुम्हें सिर्फ़ तब, जब उन्हें बारिश चाहिए।' बादल ने जवाब देने में देर लगाई। फिर उसने पूछा, 'गर्मी में जब कोई पेड़ के नीचे बैठता है, तो वह छाँव किसकी होती है?' सूरज ने कभी इस तरह सोचा ही नहीं था।

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सूरज ने इसका जवाब नहीं दिया, क्योंकि उसके पास जवाब था ही नहीं। वह बस थोड़ी देर वहीं रुका रहा, और रुकना भी उसकी आदत में नहीं था।

उस दिन उसने पहली बार छाँव को देखा। एक पेड़ के नीचे बूढ़ा आदमी बैठा था और उसके पैरों के पास एक बकरी बैठी थी। छाँव पेड़ की थी। यह सूरज जानता था। पर पेड़ की छाँव तभी बनती है जब कोई उस पर पड़े।

लौटते हुए बादल उसके साथ-साथ चला, और दोनों ने नीचे वही रास्ता देखा जो सूरज बरसों से रोज़ देखता आया था। इस बार वह अलग दिख रहा था, क्योंकि बारिश के बाद गीली छतों पर रोशनी उसी तरह पड़ रही थी जैसे थोड़ी देर पहले वह बूँदों पर पड़ी थी।

उस शाम आसमान में दोनों साथ थे। सूरज ढल रहा था और बादल ठीक उसके सामने था, और जो रंग बना वह न पूरी तरह सूरज का था, न पूरी तरह बादल का।

उसके बाद सूरज हर कुछ दिनों में अपना रास्ता थोड़ा बदल लेता था। गाँव के बच्चों ने यह बात ताड़ ली। वे शाम को छत पर चढ़ जाते और इंतज़ार करते कि आज आसमान किस रंग का होगा। कभी उनका अंदाज़ा सही निकलता, कभी ग़लत, और यही उन्हें सबसे अच्छा लगता था।