उस दोपहर सूरज ने पहली बार अपना रास्ता बदला। रोज़ वह पूरब से निकलकर सीधे पश्चिम की तरफ़ चलता था, बिना रुके, बिना इधर-उधर देखे। पर उस दिन उसने आसमान के एक कोने में कुछ देखा: एक बादल, अकेला, बहुत धीरे-धीरे तैरता हुआ, जैसे उसे कहीं पहुँचने की कोई जल्दी न हो। सूरज उसी तरफ़ मुड़ गया।
सूरज ने अपनी चमकदार मुस्कान के साथ बादल का अभिवादन किया, "नमस्ते बादल भैया!" सूरज के चेहरे पर एक मासूमियत भरी मुस्कान थी। "तुमसे कुछ बात करनी थी," उसने थोड़ी शरारत भरे लहजे में कहा।
बादल, जो हमेशा अपनी मंथर गति और शांत स्वभाव के लिए जाना जाता था, सूरज की ओर मुड़ा। उसकी आँखों में एक जिज्ञासा थी, "क्या बात है सूरज भाई? तुम्हारी चमक तो कभी कम नहीं होती, क्या तुम कभी थकते नहीं हो?" बादल की आवाज में एक सौम्यता थी, जो उसके व्यक्तित्व को दर्शाती थी।
एक प्यारा सा सबक
सूरज थोड़ी देर सोचकर बोला, "मैं हमेशा चमकता हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि कभी-कभी मुझे भी कुछ नया देखना चाहिए। क्या तुम मुझे आकाश में कुछ और दिखा सकते हो?" सूरज की आवाज में एक उत्सुकता थी, जैसे वह कुछ नया सीखने को आतुर हो।
बादल ने अपनी मृदु हंसी के साथ जवाब दिया, "तो ठीक है, सूरज भाई! मैं तुम्हें आकाश के एक नए हिस्से की सैर कराता हूँ।" बादल ने अपनी सफेद, मुलायम परतों को फैलाना शुरू किया और सूरज को अपने साथ चलने का संकेत दिया।
बादल जिस तरफ़ ले गया, वहाँ आसमान अलग था। नीचे कुछ देर पहले बारिश हो चुकी थी और हवा में नमी टिकी हुई थी। बादल ने कहा कि यहीं रुको और थोड़ा नीचे झुको। सूरज ने वैसा ही किया, और तभी उसे नीचे वह चीज़ दिखी जो उसने पहले कभी नहीं देखी थी।
सूरज ने बादल के साथ चलते हुए देखा कि आकाश में रंग-बिरंगे इंद्रधनुषों का दृश्य कितना अद्भुत था। सूरज ने अपनी सुनहरी किरणों से इंद्रधनुष को और भी चमकदार बना दिया, जैसे वह एक जादूई ब्रश से चित्रकारी कर रहा हो।
"वाह! यह तो बहुत ही सुंदर है!" सूरज ने खुशी से कहा। "अब मुझे समझ में आया कि तुम भी आकाश को सुंदर बना सकते हो।" सूरज की आवाज में एक नई जागरूकता थी, जैसे उसने कोई अनमोल खजाना पा लिया हो।
साझा करने का मज़ा
बादल हंसते हुए बोला, "यह तो बस शुरुआत है, सूरज भाई! तुम अपनी चमक से आकाश को रोशन करते हो, लेकिन मैं आकाश में रंग भरता हूँ। दोनों की अपनी अहमियत है।" बादल की आवाज में एक गर्व था, जैसे वह अपनी भूमिका को समझता हो।
'तुम्हें बुरा नहीं लगता?' सूरज ने पूछा। 'किस बात का?' 'कि लोग मुझे रोज़ देखते हैं, और तुम्हें सिर्फ़ तब, जब उन्हें बारिश चाहिए।' बादल ने जवाब देने में देर लगाई। फिर उसने पूछा, 'गर्मी में जब कोई पेड़ के नीचे बैठता है, तो वह छाँव किसकी होती है?' सूरज ने कभी इस तरह सोचा ही नहीं था।
सूरज ने बादल की बातों को गहरे से समझा और कहा, "तुम सही कह रहे हो। मैं अपनी चमक से दुनिया को रोशन करता हूँ, लेकिन तुम बिना बोले आकाश में रंग भरते हो। हम दोनों का काम बहुत खास है।" सूरज की आवाज में एक संतोष था, जैसे उसने अपनी भूमिका को एक नई दृष्टि से देखा हो।
उस दिन गाँव के बच्चे खेल रहे थे। उन्होंने देखा कि सूरज और बादल साथ में आकर आकाश में एक सुंदर नजारा बना रहे थे। बच्चों की आँखों में आश्चर्य और खुशी का मिश्रण था। उन्होंने खुशी से कहा, "देखो, नन्हा सूरज और बादल मिलकर कितनी खूबसूरत तस्वीर बना रहे हैं!" उनकी आवाज में एक अद्भुत उमंग थी।
सूरज और बादल ने एक-दूसरे को देखा और मुस्कुराए। दोनों ने समझ लिया कि दोस्ती में ही सच्ची ताकत होती है। सूरज अपनी धूप से आकाश को रोशन करता था और बादल अपनी नर्म धुंध से आकाश में रंग भरता था। दोनों ने मिलकर आकाश को और भी सुंदर बना दिया था।
उस शाम आसमान में दोनों साथ थे। सूरज ढल रहा था और बादल ठीक उसके सामने था, और जो रंग बना वह न पूरी तरह सूरज का था, न पूरी तरह बादल का।
बच्चे इस दृश्य को देखकर बहुत खुश हुए। उनके चेहरों पर मुस्कान थी और आँखों में चमक। उन्हें यह कहानी बहुत पसंद आई और उन्होंने सीखा कि एक साथ मिलकर किसी भी काम को और भी खूबसूरत बनाया जा सकता है।
उसके बाद सूरज हर कुछ दिनों में अपना रास्ता थोड़ा बदल लेता था। गाँव के बच्चों ने यह बात ताड़ ली। वे शाम को छत पर चढ़ जाते और इंतज़ार करते कि आज आसमान किस रंग का होगा। कभी उनका अंदाज़ा सही निकलता, कभी ग़लत, और यही उन्हें सबसे अच्छा लगता था।