उस पहाड़ी गाँव में सूरज नीला निकलता था। बाहर के लोग इस बात पर यक़ीन नहीं करते थे, इसलिए गाँव वालों ने बताना ही छोड़ दिया था। हर सुबह जब सूरज चोटी के पीछे से ऊपर आता, पूरी घाटी में नीली रोशनी भर जाती। खेत नीले दिखते। छतें नीली दिखतीं। लोगों के हाथ भी नीले दिखते। किसी को यह पता नहीं था कि ऐसा क्यों है।
गाँव के बच्चे इस नीले सूरज को देखकर बहुत खुश होते थे। उनके चेहरे पर एक अनोखी चमक आ जाती थी, जब वे नीली रोशनी में खेलते और दौड़ते थे। उनके लिए यह सूरज किसी जादू से कम नहीं था। दूसरी ओर, गाँव के बड़े लोग इस नीले सूरज को लेकर चिंतित रहते थे। वे अक्सर आपस में चर्चा करते, "यह सूरज क्यों नीला है? क्या इससे कोई नुकसान होगा?" लेकिन बच्चों की दुनिया में इस तरह की चिंताओं का कोई स्थान नहीं था। उनके लिए यह नीला सूरज एक खेल का मैदान था, जहां वे हर दिन नई-नई कल्पनाएँ करते और खुश रहते।
बड़े लोग इससे परेशान थे। वे शाम को चौपाल पर बैठकर इसी पर बात करते। किसी ने कहा कि फ़सल ख़राब हो जाएगी। किसी ने कहा कि बीमारी फैलेगी। कुछ लोग गाँव छोड़ने की बात भी करने लगे। पर फ़सल हर साल की तरह हुई, और कोई बीमार नहीं पड़ा। फिर भी चिंता बनी रही, क्योंकि सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था।
सपनों की उड़ान
गाँव के एक नन्हे बालक समीर को इस नीले सूरज के बारे में जानने की बहुत उत्सुकता थी। समीर का मन हमेशा सवालों से भरा रहता था। वह सोचता, "आखिर यह सूरज नीला क्यों है? क्या इसके पीछे कोई रहस्य छुपा है?" एक दिन उसने अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए गाँव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति, बाबू दादा के पास जाने का निश्चय किया। समीर ने उनसे पूछा, "बाबू दादा, यह सूरज हमेशा पीला क्यों नहीं होता? यह नीला क्यों है?"
बाबू दादा ने मुस्कुराते हुए कहा, "समीर, यह सूरज हमारे गाँव के लिए एक विशेष संदेश लेकर आया है। यह जादुई सूरज हमें यह सिखाने के लिए आया है कि हम अपनी सोच को बदलकर अपनी दुनिया को बेहतर बना सकते हैं। जब हम अपनी आँखों से दुनिया को प्यार और अच्छाई से देखेंगे, तो हमारी दुनिया भी सुंदर और खुशहाल बनेगी। यह नीला सूरज हमें अपनी सोच को सकारात्मक रखने का संकेत देता है।"
'पर यह नीला ही क्यों?' समीर ने पूछा। बाबू दादा हँसे। 'तुम्हें क्या लगता है?' समीर ने कुछ देर सोचा। 'क्योंकि पहाड़ नीले हैं?' 'हो सकता है।' 'या आसमान नीला है इसलिए?' 'यह भी हो सकता है।' समीर चिढ़ गया। 'तो सही जवाब क्या है?' बाबू दादा ने कहा कि उन्हें भी नहीं पता, और उन्होंने सत्तर साल इसी घाटी में काटे हैं।
समीर के मन में बाबू दादा की बातें गूंजने लगीं। वह सोच में पड़ गया, "क्या सचमुच मेरी सोच से इस दुनिया को बदला जा सकता है?" पूरे दिन वह नीले सूरज की रोशनी में खेलता रहा और इस विचार में खोया रहा। धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि नीला सूरज उसकी सोच को सकारात्मक बना रहा है। उसकी दुनिया उसे पहले से अधिक सुंदर और हर्षित लगने लगी।
अगले दिन, समीर ने गाँव के सभी बच्चों को इकट्ठा किया और उनसे कहा, "अगर हम अपनी सोच में अच्छाई लाएंगे, तो हमारी दुनिया और भी सुंदर हो सकती है।" बच्चों ने उत्साह से समीर की बात मानी। उन्होंने मिलकर गाँव की सफाई की और यह ठाना कि रोज़मर्रा की छोटी-छोटी चीजों में भी अच्छाई लानी है। उनका मानना था कि अगर हर दिन हम अच्छे काम करेंगे, तो हमारी दुनिया और भी बेहतर हो जाएगी।
जब सब उल्टा हो गया
काम आसान नहीं था। पहले हफ़्ते सिर्फ़ चार बच्चे आए। दूसरे हफ़्ते दो। तीसरे हफ़्ते समीर अकेला था। वह अकेला ही नाली साफ़ करता रहा। चौथे हफ़्ते सात बच्चे आए, क्योंकि किसी की माँ ने किसी से कह दिया था।
समय के साथ, गाँव में बदलाव स्पष्ट दिखने लगा। लोग एक-दूसरे से प्रेमपूर्वक बात करने लगे। गाँव में झगड़े-फसाद कम हो गए और सभी मिलकर काम करने लगे। नीला सूरज अब केवल एक रंग नहीं रह गया था, बल्कि एक प्रेरणा का स्रोत बन गया था, जो गाँव के लोगों को एकजुट करता था।
समीर और उसके दोस्त हर दिन नीले सूरज की रोशनी में हर्षित रहते। उन्होंने समझ लिया था कि सूरज का नीला रंग तो बस एक माध्यम था। असल में यह उनकी सोच और दिलों की अच्छाई थी, जो उन्हें प्रेरित कर रही थी। अब गाँव के हर व्यक्ति का विश्वास था कि अपनी सोच को सकारात्मक रखने से कुछ भी संभव हो सकता है।
सालों बाद समीर पढ़ने के लिए मैदान वाले शहर गया। वहाँ पहली सुबह वह छत पर चढ़ा और उसने ऊपर देखा। सूरज पीला था। उसने बहुत देर तक उसे देखा और उसे कुछ ख़ास महसूस नहीं हुआ। छुट्टियों में जब वह गाँव लौटा, तो सुबह उठते ही बाहर निकल आया। घाटी नीली थी। समीर ने उस दिन किसी को कुछ नहीं बताया, पर उसे यह समझ आ गया कि गाँव छोड़ने की बात कोई क्यों नहीं करता।