सुखराम को अँधेरे से डर नहीं लगता था, क्योंकि उसका काम ही अँधेरे में शुरू होता था। बिजली रात में जाती है और उसे रात में ही जोड़ना पड़ता है। बीस बरस में उसने यह सीख लिया था कि डर किस चीज़ से लगना चाहिए, और वह चीज़ अँधेरा नहीं है।
वह क़स्बे के ग्यारह हज़ार वोल्ट वाले फ़ीडर पर लाइनमैन था। उस फ़ीडर से चार गाँव, एक आटा चक्की, और अस्पताल जुड़ा हुआ था।
आषाढ़ में लाइन सबसे ज़्यादा जाती है। हवा से डाल गिरती है, इंसुलेटर पर पानी बैठता है, कहीं तार ढीला होकर पेड़ को छू जाता है। हर बार किसी को खंभे पर चढ़ना पड़ता है। रात में ही।
चढ़ने से पहले का तरीक़ा तय है। खंभे पर पहुँचने से पहले लाइनमैन उपकेंद्र पर ख़बर करता है, वहाँ बैठा आदमी उस हिस्से का स्विच खोलता है, और रजिस्टर में लिखता है कि फ़लाँ नंबर से फ़लाँ नंबर तक लाइन बंद कर दी गई है। उसके बाद ही आदमी ऊपर जाता है।
पूरा भरोसा उस रजिस्टर के नंबरों पर टिका होता है।
उस रात नौ बजकर चालीस मिनट पर लाइन गई। पानी तेज़ था। उपकेंद्र से परसराम ने बताया कि गड़बड़ चौंतीस और अड़तीस के बीच है।
परसराम उस उपकेंद्र पर तीस बरस से बैठा था और उस रजिस्टर के आधे पन्ने उसी के हाथ के लिखे हुए थे। क़स्बे में उससे बड़ा जानकार कोई नहीं था। सुखराम को भी उसी ने सिखाया था।
सुखराम और नन्हकू साइकिलों पर निकले। नन्हकू पिछले बरस भर्ती हुआ था और अभी उसकी अपनी चढ़ाई शुरू नहीं हुई थी। तय यह हुआ कि सुखराम अड़तीस देखेगा और नन्हकू चौंतीस पर रुककर नीचे से देखेगा।
बारिश में खंभे के नंबर पढ़ना आसान नहीं होता। नंबर सफ़ेद रंग से लिखे जाते हैं और हर बरस दोबारा लिखे जाते हैं। सुखराम ने टॉर्च की रोशनी में अड़तीस पढ़ा और बेल्ट कसकर चढ़ना शुरू किया।
आठ फुट पर वह रुक गया।
ऊपर वाला इंसुलेटर पिन वाला था। सफ़ेद, छोटा, एक ही चक्र वाला।
अड़तीस नंबर के खंभे पर पिन वाला इंसुलेटर नहीं हो सकता था। वह मोड़ वाला खंभा है और मोड़ पर तार को खींचकर बाँधा जाता है, इसलिए वहाँ डिस्क वाला इंसुलेटर लगता है, जो लंबा होता है और झूलता है। सुखराम ने वह खंभा ख़ुद बाँधा था, चार बरस पहले।
वह नीचे उतरा और अगले खंभे तक गया। उस पर उनतालीस लिखा था। अगले पर चालीस।
तब उसे याद आया कि क्या हुआ था।
तीन बरस पहले बाज़ार वाली गली में लाइन बढ़ाई गई थी और उसमें बीच में चार नए खंभे जोड़े गए थे। नए खंभों को नंबर देने के लिए उसके आगे के सारे खंभों के नंबर आगे खिसकाकर दोबारा लिखे गए थे। यह काम ठेके वाली टोली ने किया था और उन्होंने रंग से लिख दिया था।
रजिस्टर पुराने नंबरों पर चल रहा था।
तीन बरस से इससे कुछ नहीं बिगड़ा था, क्योंकि तीन बरस से एक ही आदमी लाइन पर चढ़ रहा था और वह आदमी दोनों गिनतियाँ जानता था। सुखराम रजिस्टर सुनता था और अपने हिसाब से खंभा चुनता था। उसे यह अजीब भी नहीं लगता था। यह उसके काम का एक हिस्सा बन गया था, जैसे बरसात में सीढ़ी का पहला डंडा फिसलता है और सब जानते हैं।
आज उसके साथ दूसरा आदमी था।
परसराम ने चौंतीस से अड़तीस तक की लाइन बंद की थी, रजिस्टर वाला चौंतीस से रजिस्टर वाला अड़तीस। ज़मीन पर उसका मतलब था खंभा अड़तीस से बयालीस।
नन्हकू खंभा चौंतीस पर खड़ा था। लिखा हुआ चौंतीस। वह हिस्सा चालू था।
सुखराम ने घड़ी देखी। नौ बजकर उनसठ मिनट। परसराम बीस मिनट बाद लाइन दोबारा चालू करता है, चाहे ख़बर आए या न आए, क्योंकि अस्पताल है।
चार सौ क़दम। बारिश। और नन्हकू को नीचे से देखने को कहा गया था, ऊपर चढ़ने को नहीं।
पर नन्हकू की उम्र वह थी जिसमें आदमी यह दिखाना चाहता है कि वह भी चढ़ सकता है। नीचे से देखने में तार का टूटा हुआ सिरा दिखता भी नहीं।
सुखराम ने बेल्ट खोलकर फेंका और दौड़ा।
वह टॉर्च गिराकर दौड़ा, क्योंकि टॉर्च हाथ में हो तो आदमी उतनी ही तेज़ दौड़ता है जितना वह देख पाता है। उसने रास्ता याद से लिया। नाली, फिर पीपल, फिर वह जगह जहाँ सड़क नीची है और बरसात में घुटनों तक पानी रहता है।
वह चिल्लाया भी। बारिश में आवाज़ दूर नहीं जाती। बीस क़दम, बस।
तीन सौ क़दम पर उसे खंभा दिखा और उस पर आधी ऊँचाई तक नन्हकू।
बाक़ी उसे बाद में ठीक से याद नहीं रहा। उसे याद है कि उसने नन्हकू का नाम नहीं लिया। उसने सिर्फ़ एक शब्द चिल्लाया, उतरो, और नन्हकू उतर आया, बिना पूछे, क्योंकि इस काम में ऊपर चढ़े आदमी को नीचे से एक ही आवाज़ आती है और वह बहस के लिए नहीं आती।
नन्हकू के पैर ज़मीन पर लगे और उसके तीन मिनट बाद लाइन में करंट आ गया।
तीन मिनट। सुखराम ने उन्हें बहुत बार गिना है।
अगले दिन सुबह उसने परसराम के सामने रजिस्टर खोला और नंबर मिलाए। परसराम कुछ देर देखता रहा। फिर उसने चश्मा उतारकर मेज़ पर रख दिया।
परसराम ने यह भी बताया कि दो बरस पहले नौकरी वाली टोली ने उससे नया रजिस्टर बनाने को कहा था और उसने मना कर दिया था। पुराने रजिस्टर में तीस बरस का हिसाब था और नए में कुछ नहीं होता।
नंबर उसी हफ़्ते ठीक कर लिए गए। नया रजिस्टर बना और पुराना अलमारी में रख दिया गया, क्योंकि रजिस्टर फेंका नहीं जाता।
एक हिसाब उसने बाद में अकेले बैठकर लगाया। उन तीन बरसों में वह ख़ुद तेईस बार ऊपर चढ़ा था और हर बार यह मानकर चढ़ा था कि उसे दोनों गिनतियाँ याद हैं। ग़लती एक बार भी नहीं हुई। तेईस बार। यह उसे अब डराता है। तब नहीं डराया था।
अब वह ऊपर पहुँचकर एक काम और करता है। उपकेंद्र कह चुका होता है कि लाइन बंद है, और वह फिर भी अपनी नियोन वाली पेचकस तार से छुआता है और उसके भीतर देखता है कि कुछ जला तो नहीं। इसमें चार सेकंड लगते हैं। ग्यारह बरस से वह यह कर रहा है और इन ग्यारह बरसों में एक बार भी उसमें कुछ नहीं जला।