पूस की धुंध में हेडलाइट दस क़दम से आगे कुछ नहीं दिखाती, बस दूध जैसा एक गोला बना देती है। धरमबीर ने तीसरी बार में ट्रैक्टर स्टार्ट किया और उसे चलता छोड़ दिया, ताकि गरम हो जाए। रेनू ट्रॉली में चढ़ चुकी थी। उसके पास टीन का एक बक्सा था और उसने उसे गोद में रखा हुआ था, जैसे बस में बैठी हो।

समझौता ग्यारह दिन में तय हुआ था। रेनू उन्नीस की थी और कपिल के साथ चली गई थी, और उसके घर वालों ने अगले दिन थाने में लिखा दिया था। फिर वह मजिस्ट्रेट के सामने खड़ी हो गई और बयान दे दिया कि वह अपनी मर्ज़ी से गई है और बालिग़ है। इससे मुक़दमा वहीं ख़त्म हो गया, और असल बात उसके बाद शुरू हुई।

पंचायत ने जो लिखवाया वह यह था कि सुबह चार बजे नहर के हेड पर, चार पंचों के सामने, लड़की कपिल के घर वालों को सौंप दी जाएगी। बदले में उसके पिता ओमबीर की तरफ़ से न कोई मुक़दमा होगा, न कपिल के बाप की ट्यूबवेल की लाइन कटेगी, न उनके खेत में कुछ होगा। दोनों तरफ़ के लोग इसे अच्छा समझौता मानते थे। कपिल के घर वालों ने उसी दिन हामी भर दी थी।

ओमबीर ने रात को अपने आदमियों को समझा दिया था। पंच पाँच बजे आएँगे। हम चार बजे निकलेंगे, ताकि पहले पहुँच जाएँ और अँधेरे में जगह देख लें। यह बात किसी को अजीब नहीं लगी। जो आदमी ग्यारह दिन से सो नहीं रहा, वह वक़्त से पहले पहुँचना चाहेगा ही।

रेनू की माँ नहीं जा रही थी। ओमबीर ने कहा कि वह रो देगी और वहाँ रोना ठीक नहीं लगेगा। बक्से के बारे में भी उसने यही कहा कि इसे रहने दो, बाक़ी सामान बाद में भिजवा देंगे। रेनू ने बक्सा फिर भी उठा लिया। इस पर किसी ने बहस नहीं की।

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तीन बजकर चालीस मिनट पर धरमबीर ने ट्रॉली के पिछले हिस्से में चारे के नीचे एक फावड़ा रखा देखा। फावड़ा घर का ही था। उस पर मिट्टी लगी थी। मिट्टी गीली थी।

ट्रैक्टर अठारह की रफ़्तार से चलता है और नहर के हेड तक सवा घंटे का रास्ता था। पीछे ट्रॉली की पटरी पर ओमबीर और दो आदमी बैठे थे। रेनू सामने की तरफ़, बक्से के साथ। रास्ता चुपचाप कटा। धुंध में सिर्फ़ इंजन की आवाज़ थी और कभी-कभी नहर के पानी की।

धरमबीर हिसाब लगाता रहा। पूस की रात में मिट्टी गीली नहीं मिलती, जब तक कोई ताज़ा न खोदे। ताज़ा कोई तभी खोदता है जब खोदना दिन में नहीं दिखना चाहिए। पंच पाँच बजे आएँगे और वे चार बजे पहुँचेंगे। बीच में एक घंटा है। माँ नहीं आई। सामान बाद में भिजवाया जाएगा।

उसने यह भी सोचा कि वह ग़लत हो सकता है, और उसे यह सोचकर कोई राहत नहीं मिली, क्योंकि ग़लत होने की सूरत में भी वही करना पड़ता जो सही होने की सूरत में करना था।

करने को ज़्यादा कुछ नहीं था। ट्रैक्टर अठारह चलता है। मोटरसाइकिल साठ। रास्ता एक ही है। ट्रैक्टर मोड़ता तो पीछे बैठे तीनों आदमी उसी वक़्त समझ जाते, और वे तीन थे और वह एक था और लड़की ट्रॉली में थी।

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हेड से दो किलोमीटर पहले मिल का क्रय केंद्र पड़ता है। पेराई दिवाली से चल रही थी और केंद्र रात-दिन खुला था। धुंध के भीतर उसकी बत्तियाँ बहुत दूर से पीली दिखती हैं। वहाँ चार गाँवों की चालीस-पचास ट्रॉलियाँ लाइन में लगी रहती हैं, काँटा चलता रहता है, और आदमी जागते रहते हैं क्योंकि नंबर आने पर सोने वाले का नंबर निकल जाता है।

धरमबीर ने वहीं गाड़ी मोड़ दी और लाइन में लगा दी। उसने कहा कि अगला टायर बैठ रहा है और यहीं हवा मिल जाएगी। ओमबीर ने उसे देखा। फिर उसने उतरकर टायर देखा, जो ठीक था, और फिर उसने धरमबीर को दोबारा देखा।

'चाबी दे,' ओमबीर ने कहा। धरमबीर ने कहा कि टायर ठीक करा लें, फिर चलते हैं। ओमबीर ने आवाज़ ऊँची नहीं की, क्योंकि दस क़दम पर काँटे वाला बैठा था और उसके पीछे बीस आदमी आग ताप रहे थे। उसने कहा, ‘तू जानता है तू क्या कर रहा है।’ धरमबीर ने कहा कि हाँ, और चाबी जेब में डाल ली।

पाँच बजे पंच हेड पर पहुँचे। वहाँ कोई नहीं मिला। सवा पाँच पर उनमें से एक मोटरसाइकिल लेकर ढूँढ़ने निकला और उसे ट्रैक्टर लाइन में खड़ा मिल गया। छह बजकर दस मिनट पर उजाला हो गया। धुंध रहती है, पर उजाले वाली धुंध और चीज़ होती है।

सौंपने का काम पौने सात बजे केंद्र के गेट पर हुआ, जैसा लिखा था वैसा ही: चार पंच, दोनों तरफ़ के लोग, और काग़ज़ पर दस्तख़त। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि यह चालीस ट्रॉलियों के सामने हुआ और लाइन में लगे हर आदमी ने देखा। जो चीज़ इतने लोगों के सामने हो जाए, उसे बाद में बदला नहीं जा सकता। रेनू का ब्याह मकर संक्रांति के बाद मेरठ की अदालत में हुआ और गाँव से कोई नहीं गया।

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ओमबीर की ट्यूबवेल से धरमबीर के चार बीघे को पानी जाता था। मार्च में लाइन कट गई। अब वह बग़ल वाले खेत से डेढ़ सौ रुपये घंटे के हिसाब से पानी लेता है और गेहूँ में छह पानी लगते हैं। यह हर साल लगता है और आगे भी लगता रहेगा। फावड़ा उसी रात ट्रॉली से उतारकर गोशाला की दीवार से टिका दिया गया था। उस पर लगी मिट्टी सूखकर पपड़ी बन गई और झड़ती रही, पर पूरी नहीं झड़ी। गोशाला के बाक़ी औज़ार रोज़ चलते हैं। उसे किसी ने दोबारा नहीं उठाया।