हलवाई को घर के भीतर वह सब दिखता है जो मेहमानों को कभी नहीं दिखता। रवि साल में सत्तर के आसपास शादियाँ पकाता था और उसे चेहरे याद नहीं रहते थे। रसोई याद रहती थी। भट्ठी कहाँ लगेगी, पानी कितनी दूर है, आँगन में देग घुमाने की जगह है या नहीं। बीस साल में उसके दिमाग़ में सैकड़ों आँगन का नक़्शा बन चुका था और उनमें से किसी का भी नाम उसे याद नहीं था।

अगहन की उस शादी का बुलावा एक आदमी ने आकर दिया, जिसने अपना नाम चतुर्भुज बताया और कहा कि वह लड़की का चाचा है। तीन दिन का काम, चार सौ पत्तल, पूरी और बूँदी और उड़द की दाल। रवि ने रेट बताया। चतुर्भुज ने मोल-भाव नहीं किया और पूरा पैसा वहीं गिनकर रख दिया, तीनों दिन का, पहले ही। रवि ने पैसा जेब में रखा और उस वक़्त उसे यह अच्छा लगा।

घर पहुँचकर उसने भट्ठी की जगह देखी और तब उसे लगा कि वह वहाँ पहले आ चुका है। छत की सीढ़ियाँ कमरे के भीतर से जाती थीं। बाहर से नहीं। यह इस इलाक़े में कम होता है और हलवाई के लिए मुसीबत है, क्योंकि देग ऊपर ले जाने का रास्ता ही नहीं बचता। दो साल पहले उसने इसी बात पर किसी से बहस की थी। उसे याद आ गया कि किस घर में।

यह वही घर था। दो साल पहले भी वहाँ शादी थी, उसी आँगन में, चार सौ पत्तल, पूरी और बूँदी और उड़द की दाल। तब लड़की का नाम कुछ और था और घरवाले कोई और थे। रवि ने कुल्देप को, जो उसका सबसे पुराना कारीगर था, चुपचाप यह बात बताई। कुल्देप ने कहा कि घर बिक भी जाते हैं। यह सही था, और रवि को इससे तसल्ली नहीं हुई।

उस रात उसने भट्ठी के पास बैठे-बैठे चतुर्भुज को देखा। खाना बनाने वाले की आँख आदमी पर नहीं जाती, हाथ पर जाती है, और चतुर्भुज के हाथ उस घर में बहुत आराम से चल रहे थे। पानी का नल कहाँ है, बत्ती का बटन किस तरफ़ है, कौन-सी कुंडी अटकती है। और ग्यारह बजे जब वह छत पर गया, तो वह सीधे कमरे के भीतर वाली सीढ़ियों की तरफ़ मुड़ा, उन्हें ढूँढ़े बिना।

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रवि दो साल पहले वाली शादी को याद करने लगा। उस शादी में भी एक आदमी था जो सब कुछ सँभाल रहा था और लड़की का चाचा बताया गया था। रवि को उसका चेहरा याद नहीं आया। एक बात याद आ गई। उसने भी पूरा पैसा पहले दे दिया था। बीस साल में यह दो ही बार हुआ था और दोनों बार इसी आँगन में।

शादी के बाद क्या हुआ था, यह रवि को नहीं मालूम था। हलवाई से यह कोई बताता भी नहीं। हलवाई तीसरे दिन बर्तन समेटकर चला जाता है और उसके बाद का उसे कुछ नहीं मालूम होता। पर अगली सुबह उसने कुल्देप को दो गाँव आगे भेजा, आटा लाने के बहाने, और शाम को कुल्देप ने बताया कि दो साल पहले वाली दुल्हन ब्याह के छब्बीस दिन बाद घर से चली गई थी और उसके साथ सोना और नक़द दोनों गए थे, और लड़के वाले ढाई महीने इस गाँव के चक्कर काटते रहे, और यह घर तब तक ख़ाली पड़ा था।

बारात परसों आनी थी। दो दिन बचे थे। लड़के वाले साठ किलोमीटर दूर के एक गाँव से आ रहे थे और उन्होंने अपनी बहन का हिस्सा बेचकर शादी की थी। यह बात रवि को टेंट वाले से मिली, जो हर शादी में सब कुछ जानता है और किसी से कहता नहीं। रवि ने उस पूरे दिन तीन बार सोचा कि वह यहाँ पकाने आया है, और तीनों बार यह बात उसे कमज़ोर लगी।

रात को दो बजे चतुर्भुज भट्ठी के पास आकर बैठ गया। उसने पूछा कि आटा किस गाँव से आया। फिर उसने कहा कि हलवाई का काम अच्छा है, क्योंकि उसमें आदमी को सिर्फ़ अपने देग से मतलब रखना होता है। वह ज़्यादा देर नहीं बैठा। पाँच मिनट, शायद कम। उठते हुए उसने रवि के कंधे पर हाथ रखा और कहा कि तीसरे दिन का पैसा वह पहले ही ले चुका है।

अगली सुबह रवि ने कुल्देप को भट्ठी पर बिठाया और साइकिल उठाकर निकल गया। साठ किलोमीटर, और बीच में दो नदियाँ। वह दोपहर तक उस गाँव पहुँचा। लड़के के बाप का नाम तेजराम था और वह अपने दरवाज़े पर टेंट लगवा रहा था। रवि के पास कोई काग़ज़ नहीं था। कोई गवाह भी नहीं। उसके पास सिर्फ़ एक रसोई की याद थी और उसने वही रख दी। कि उस आँगन में दो साल पहले भी वह पका चुका है, वैसी ही शादी, वैसी ही दाल, और दोनों बार पैसा पहले मिला था।

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तेजराम ने उसे तीन घंटे बिठाए रखा। इस बीच उसने अपने दो आदमी उस गाँव भेजे, सिर्फ़ यह देखने कि घर किसका है। शाम को ख़बर आई कि घर एक अध्यापक का है जो शहर में रहता है और उसने वह घर छह महीने के लिए किराए पर उठाया हुआ है। बारात अगले दिन नहीं गई। तेजराम ने कोई शोर नहीं मचाया, कोई रिपोर्ट नहीं लिखवाई, बस नहीं गया, और तीन दिन बाद उस आँगन में न टेंट था, न देग, न चतुर्भुज।

उस इलाक़े में इसके बाद जो हुआ, उसमें रवि का पक्ष किसी ने नहीं सुना। बात यह चली कि हलवाई ने किसी की शादी तुड़वा दी। असली बात कभी सामने नहीं आई। सामने लाने वाला कोई नहीं था। लड़की वाले ग़ायब थे और लड़के वाले शर्मिंदा। रवि की बुकिंग उस साल सत्तर से गिरकर तेईस पर आ गई। कुल्देप दूसरे हलवाई के साथ चला गया और भट्ठी का एक जोड़ा बेचना पड़ा।

डेढ़ साल बाद अगहन में उसे एक बुलावा आया। तेजराम के गाँव से। उसी लड़के की शादी थी, इस बार सच में, और तेजराम ने कहला भेजा था कि हलवाई वही आएगा। चार सौ पत्तल। तीन दिन। हिसाब तय हुआ और तेजराम ने आधा पैसा उस दिन दिया और बाक़ी शादी निपटने के बाद, जैसे हर घर देता है।

उससे अगले साल रवि एक दूसरे ब्लॉक में काम पकड़ने जा रहा था और रास्ता उसी गाँव से पड़ा। उस घर के बाहर टेंट लगा था और आँगन में भट्ठी चढ़ी हुई थी। भीतर एक दूसरा हलवाई देग चला रहा था, उम्र में रवि से छोटा। रवि ने साइकिल रोकी और उससे एक ही बात पूछी, कि पैसा कैसे तय हुआ है। हलवाई ने हँसकर बताया कि पूरा पैसा पहले ही मिल गया, तीनों दिन का, और ऐसा उसके साथ आज तक नहीं हुआ था।