आरव और प्रीति के गाँव से समुद्र आधे घंटे की दूरी पर था। छुट्टी वाले दिन दोनों सुबह-सुबह निकल जाते और शाम तक किनारे पर रहते। दोनों को तैरना नहीं आता था, इसलिए वे पानी से दूर, सूखी रेत पर बैठकर किले बनाते थे। अब तक जितने किले बनाए थे, उनमें से कोई घुटने से ऊँचा नहीं हुआ था।

उस साल गर्मी की छुट्टियों में प्रीति ने कहा, 'इस बार एक बड़ा बनाते हैं।' 'कितना बड़ा?' 'इतना कि दूर से दिखे।' आरव ने रेत पर उँगली से एक घेरा बनाया, फिर उसे बड़ा किया, फिर और बड़ा। 'इतना?' प्रीति ने सिर हिला दिया।

'हम इसमें रंगीन पत्थर, मोती और सीपियाँ लगाएँगे,' प्रीति ने कहा। 'और चारों तरफ़ एक बगीचा भी बनाएँगे,' आरव ने जोड़ा। दोनों उस पूरे दिन सिर्फ़ योजना बनाते रहे और एक भी मुट्ठी रेत नहीं उठाई।

सपनों की उड़ान

काम अगले दिन शुरू हुआ। सबसे पहले उन्होंने नींव बनाई। गीली रेत नीचे से खोदकर लानी पड़ती थी, और वह भारी होती थी। दोपहर तक दोनों के हाथ दुखने लगे। शाम तक सिर्फ़ नींव तैयार हुई थी, पर वह चौड़ी थी, पिछले सारे किलों से चौड़ी।

तीसरे दिन दीवारें उठीं। चौथे दिन कोने बने। प्रीति सीपियाँ इकट्ठा करने का काम सँभालती थी और आरव पत्थर छाँटता था। जो सीपी टूटी होती, उसे प्रीति अलग रख देती। 'ये किस काम की?' आरव ने पूछा। 'रास्तों के लिए,' प्रीति ने कहा।

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पाँचवें दिन किला तैयार था। दीवारों के बीच छोटे-छोटे रास्ते थे, जिनमें से होकर भीतर जाया जा सकता था। कोनों पर रंगीन पत्थर लगे थे। भीतर वाले हिस्से में उन्होंने दो छोटे पौधे गाड़ दिए थे। जब सूरज ढलने लगा और रोशनी तिरछी पड़ी, तो पूरा किला सोने जैसा चमक उठा। सचमुच चमचमाते रेत का किला। उसकी चमक पानी में भी दिखने लगी।

'देखो!' प्रीति चिल्लाई। दोनों काफ़ी देर तक बस उसे देखते रहे।

अगली सुबह वे जल्दी पहुँचे। किनारे पर पहुँचते ही दोनों रुक गए। रात में ज्वार आया था। किले का समुद्र वाला पूरा हिस्सा बह चुका था। जो दीवार सबसे ऊँची थी, वह अब आधी थी। सीपियाँ रेत पर बिखरी पड़ी थीं।

जब सब उल्टा हो गया

प्रीति वहीं बैठ गई। आरव कुछ देर खड़ा रहा, फिर उसके पास बैठ गया। दोनों चुप रहे। बहुत देर बाद प्रीति ने एक सीपी उठाई, उसे रेत पर पोंछा, और अपनी जेब में रख ली।

'फिर से बनाएँ?' आरव ने पूछा। 'इस बार पीछे,' प्रीति ने कहा, और उस जगह की तरफ़ इशारा किया जो पानी से दूर थी, जहाँ रेत सूखी थी और ज्वार नहीं पहुँचता था।

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उस दिन काम धीमा था, क्योंकि दोनों थके हुए थे। दोपहर में गाँव के तीन और बच्चे उधर आ निकले। उन्होंने पूछा कि क्या हो रहा है। प्रीति ने बताया। एक बच्चा बोला, 'हम भी करें?' आरव ने कंधे उचकाए, जिसका मतलब हाँ था।

पाँच जोड़ी हाथों से काम तेज़ हुआ। इस बार नींव और चौड़ी थी। दो बच्चे सीपियाँ लाते रहे, दो रेत ढोते रहे, और प्रीति ऊपर बैठकर बताती रही कि क्या कहाँ जाएगा। शाम होते-होते नया किला पिछले वाले से बड़ा हो गया था, और अभी अधूरा था।

शाम को घर लौटते वक़्त आरव ने पूछा कि उसे बुरा नहीं लगा। प्रीति ने कहा कि पहले लगा था, बहुत। 'फिर?' 'फिर मैंने सोचा कि हमने पाँच दिन में जो सीखा, वह तो नहीं बहा।' आरव ने यह बात सोची और मान गया। उन्हें अब पता था कि नींव कितनी गहरी चाहिए, गीली रेत कहाँ से मिलती है, और दीवार कितनी ऊँची होने पर गिर जाती है।

अगले दिन और बच्चे आए। फिर उससे अगले दिन और। हफ़्ता ख़त्म होते-होते किनारे पर एक ऐसा किला खड़ा था जिसे आठ बच्चों ने बनाया था, और जिसमें कई ऐसी चीज़ें थीं जो आरव और प्रीति ने सोची भी नहीं थीं: एक पुल, एक कुआँ, और दीवार पर सीपियों से बना एक नाम।

'हमने इसे बनाने में बहुत मेहनत की,' आरव ने कहा। 'पर अब यह सबकी खुशी का कारण बन गया है।' प्रीति ने पीछे मुड़कर उस पुरानी जगह की तरफ़ देखा, जहाँ पहला किला था और जहाँ अब सिर्फ़ गीली रेत थी। 'अगर वह न बहता,' उसने कहा, 'तो ये कभी न बनता।'

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उस शाम आठों बच्चे किले के चारों तरफ़ बैठे थे। एक ने पूछा कि इसका नाम क्या रखें। कई नाम आए और सब पर बहस हुई। आख़िर में सबसे छोटे बच्चे ने कहा कि इसका नाम वही रखा जाए जो पहले वाले का था, जिसे उसने देखा भी नहीं था। किसी ने विरोध नहीं किया।

सूरज की रोशनी में किला और चमकने लगा। बच्चों ने तय किया कि अगले दिन वे इसे और बेहतर बनाएँगे। प्रीति ने जेब से वह पुरानी सीपी निकाली और उसे नए किले की सबसे ऊपर वाली दीवार पर लगा दिया।