नयना बारिश की आवाज़ से पहचान लेती थी कि वह कितनी देर चलेगी। हल्की टपटप का मतलब था दस मिनट। छत के टिन पर लगातार ढोल जैसी आवाज़ का मतलब था कि आज स्कूल नहीं जाना पड़ेगा। जैसे ही पहली बूँद गिरती, वह आँगन में निकल आती, हाथ फैलाकर ऊपर देखती, और माँ की आवाज़ आने तक भीगती रहती।
सावन की उस सुबह जब बादल घिरे, नयना रोज़ की तरह बाहर निकल आई। पर इस बार पहली बूँद उसके हाथ पर गिरी तो वह चौंक गई। बूँद सुनहरी थी। सचमुच सुनहरी, जैसे किसी ने सोने का एक बहुत छोटा कण पानी में घोल दिया हो। उसने हाथ आँखों के पास लाकर देखा। बूँद हल्के से चमकी और फिर सूख गई।
फिर पूरी बारिश शुरू हो गई। हर बूँद वैसी ही सुनहरी और चमचमाती थी। गिरते-गिरते उन्होंने पूरा गाँव बदल दिया। नीम के पत्ते चमकने लगे, आँगन की दीवार चमकने लगी, और कीचड़ तक चमकने लगा। हवा में एक मीठी सी गंध थी, जैसे कहीं दूर गुड़ पक रहा हो। नयना बीच आँगन में खड़ी होकर घूमती रही।
सबसे अच्छी तरकीब
'माँ! माँ! बाहर आओ!' माँ रसोई से निकलीं, हाथ आँचल से पोंछते हुए। उन्होंने आसमान देखा, फिर बेटी को, और मुस्कुरा दीं। 'यह सुनहरी बारिश है,' उन्होंने कहा। 'मेरी दादी बताती थीं। यह तब आती है जब गाँव में कोई ऐसा काम हुआ हो जिसका किसी ने ढिंढोरा न पीटा हो।'
'कौन सा काम?' नयना ने पूछा। माँ ने कंधे उचकाए। 'यह तो कोई नहीं जानता। जो करता है वह बताता नहीं, और जो बता देता है उसकी बारिश नहीं आती।' नयना दिन भर इसी बात के बारे में सोचती रही।
शाम को उसे पता चला। गाँव के पश्चिम वाले कुएँ का रास्ता बरसात में बहुत फिसलन भरा हो जाता था, और पिछले साल वहाँ से गिरकर एक बूढ़ी काकी को चोट लगी थी। किसी ने रात में उस पूरे रास्ते पर ईंटें बिछा दी थीं। किसी ने नहीं देखा कि कौन था। सुबह लोग गए तो रास्ता तैयार मिला।
नयना उस रास्ते पर गई और देर तक ईंटें देखती रही। वे सीधी नहीं थीं। कुछ टेढ़ी थीं, कुछ नीची, जैसे किसी ने अँधेरे में जल्दी-जल्दी बिछाई हों। उसने एक ईंट उठाकर देखी। उसके नीचे की मिट्टी अब भी गीली थी।
अगले दिन नयना ने अपने दोस्तों को इकट्ठा किया। 'हम भी कुछ करेंगे,' उसने कहा। 'पर किसी को बताएँगे नहीं।' बच्चों को यह खेल जैसा लगा। उन्होंने तय किया कि जो भी करेंगे, चुपचाप करेंगे।
एक प्यारा सा सबक
उस हफ़्ते बहुत कुछ हुआ, और किसी को पता नहीं चला कि किसने किया। स्कूल के पीछे का टूटा झूला ठीक हो गया। मंदिर की सीढ़ियों पर जमी काई किसी ने रगड़कर साफ़ कर दी। नेत्रहीन रामदीन चाचा के दरवाज़े पर हर सुबह पानी का घड़ा भरा मिलने लगा। बड़े लोग आपस में पूछते रहे, और जवाब किसी के पास नहीं था।
अगली बारिश और तेज़ चमकी। इस बार पूरा गाँव बाहर निकल आया। लोग आँगन में, छतों पर, गलियों में खड़े होकर ऊपर देखते रहे। नयना और उसके दोस्त भीड़ के बीच खड़े थे और एक-दूसरे को देखकर हँस रहे थे। किसी ने किसी से कुछ नहीं कहा।
उस शाम बूढ़ी काकी अपनी चौखट पर बैठी थीं। नयना उधर से गुज़री तो उन्होंने उसे रोका और पूछा कि आजकल गाँव में हो क्या रहा है। नयना ने कहा कि उसे नहीं पता। काकी ने उसे कुछ देर देखा, फिर मुस्कुराकर कहा कि ठीक है, और उसे एक गुड़ की डली दे दी।
एक दिन नयना का सबसे छोटा दोस्त फिसल पड़ा। वह बता देना चाहता था कि झूला उसने ठीक किया था। नयना ने उसका हाथ पकड़कर रोक दिया। 'बता दोगे तो?' उसने पूछा। लड़का कुछ देर सोचता रहा। फिर उसने सिर हिला दिया और चुप हो गया।
एक रात नयना की नींद खुल गई। खिड़की से उसने देखा कि आँगन के पार, गली में कोई लालटेन लेकर जा रहा है। वह चुपचाप उठकर दरवाज़े तक गई। लालटेन रामदीन चाचा के घर की तरफ़ मुड़ी, वहाँ कुछ देर रुकी, और फिर वापस लौट गई। रोशनी में चेहरा नहीं दिखा। सुबह घड़ा भरा हुआ था। नयना ने किसी से कुछ नहीं कहा, पर उस दिन वह दिन भर मुस्कुराती रही।
बरसात ख़त्म हुई और सुनहरी बारिश रुक गई, जैसे हर साल रुकती थी। पर उस साल कुछ बदल गया। रामदीन चाचा के दरवाज़े पर घड़ा अब भी भरा मिलता था। झूला अब भी चलता था। और सीढ़ियाँ अब भी साफ़ थीं। गाँव के बड़े लोग अब भी नहीं जानते थे कि यह सब कौन करता है। अगले सावन में जब पहली बूँद गिरी, नयना आँगन में हाथ फैलाकर खड़ी थी। बूँद उसके हाथ पर गिरी और सुनहरी चमक उठी।