कियारा को खुशबू से चीज़ें याद रहती थीं। बारिश के बाद की मिट्टी, माँ के हाथ की रोटी, नीम के फूल, और सबसे बढ़कर बरसात के बाद वाली हरियाली की खुशबू। वह सुबह उठते ही बगीचे में चली जाती और आँखें बंद करके खड़ी हो जाती, यह पहचानने के लिए कि आज हवा में क्या है। माँ कहती थीं कि यह अच्छी आदत है। 'जो नाक से देखता है, वह दो बार देखता है।'
गाँव के पीछे एक जंगल था, जहाँ अकेले जाने की उसे इजाज़त नहीं थी। बड़े कहते थे कि वहाँ रास्ता भटक जाता है। पर बच्चों में उस जंगल की बहुत बातें होती थीं: घास इतनी हरी कि आँख चौंधिया जाए, फूल जिनके नाम किसी को नहीं आते, और बीच में एक छोटी झील।
एक छुट्टी वाली सुबह कियारा ने तय कर लिया। उसने अपने छोटे बैग में पानी की बोतल और दो रोटियाँ रखीं, माँ से कहा कि वह सहेली के घर जा रही है, और जंगल की तरफ़ चल पड़ी।
जब डर भाग गया
जंगल में घुसते ही हवा बदल गई। बाहर की धूप और धूल पीछे रह गई, और भीतर एक ठंडी, गीली सी गंध थी। कियारा कुछ देर वहीं खड़ी रही, आँखें बंद करके। यह खुशबू उसने पहले कभी नहीं ली थी। फिर वह और भीतर चली गई।
हर पेड़ की अपनी गंध थी। एक से मीठी, जैसे कोई फल पक रहा हो। दूसरे से तेज़ और ठंडी, जैसे पुदीना। एक जगह ज़मीन से ही एक अजीब सी महक आ रही थी और कियारा घुटनों के बल बैठकर देर तक सूँघती रही। उसे पता ही नहीं चला कि वह कितनी दूर आ गई है।
एक जगह उसे कुछ छोटे सफ़ेद फूल मिले जो ज़मीन से एकदम सटे हुए थे। उन्हें सूँघने के लिए उसे लेटना पड़ा। उनकी खुशबू सबसे तेज़ थी, और सबसे कम देर तक रही। कियारा ने दो फूल तोड़कर बैग में रख लिए, यह सोचकर कि माँ को दिखाएगी।
झील उसे अचानक मिली। पानी शांत था और उसमें बत्तखें तैर रही थीं। कियारा किनारे पर बैठ गई, बैग नीचे रखा, और गहरी साँस ली। कुछ देर के लिए उसे लगा कि वह इस जगह को हमेशा से जानती है।
तभी झाड़ी में हलचल हुई। कियारा चौंकी। एक छोटा खरगोश वहाँ दुबका बैठा था और उसे देख रहा था। कियारा हिली नहीं। खरगोश भी नहीं हिला। कुछ देर बाद वह धीरे-धीरे बाहर आया, दो क़दम पास आया, और रुक गया। 'तुम बहुत प्यारे हो,' कियारा ने बहुत धीरे कहा।
मस्ती भरा अगला पल
फिर उसने ऊपर देखा और उसका दिल बैठ गया। पेड़ों के बीच से जो रोशनी आ रही थी, वह नारंगी हो चुकी थी। शाम हो गई थी। कियारा उठ खड़ी हुई और उस तरफ़ चलने लगी जिधर से वह आई थी। थोड़ी देर बाद वह रुक गई। सब पेड़ एक जैसे लग रहे थे।
उसने चारों तरफ़ देखा। कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। उसे बड़ों की बात याद आई और गला सूखने लगा। तभी उसने देखा कि खरगोश उसके आगे-आगे चल रहा है। वह कुछ क़दम जाता, रुकता, पीछे मुड़कर देखता, और फिर चल पड़ता।
कियारा उसके पीछे चल दी। रास्ता टेढ़ा था और कई बार उसे लगा कि वे ग़लत तरफ़ जा रहे हैं। पर हर मोड़ पर खरगोश रुककर इंतज़ार करता रहा। कुछ देर बाद पेड़ छँटने लगे और दूर से गाँव के मंदिर की घंटी सुनाई दी।
रास्ते में एक जगह खरगोश रुककर बहुत देर तक खड़ा रहा। कियारा ने इधर-उधर देखा और समझ नहीं पाई कि क्यों। फिर उसे दिखा कि आगे ज़मीन नीची है और वहाँ बरसात का पानी भरा हुआ है। खरगोश दूसरी तरफ़ मुड़ गया और कियारा उसके पीछे चल दी।
जंगल के किनारे पर पहुँचकर खरगोश रुक गया। कियारा ने पीछे मुड़कर देखा। वह वहीं खड़ा था, बाहर नहीं आया। कियारा ने हाथ हिलाया और बाहर निकल आई।
घर पहुँचकर उसने माँ को सब बता दिया, सहेली वाली बात भी। माँ ने पहले डाँटा, फिर चुप हो गईं। 'अकेले मत जाना,' उन्होंने कहा। 'पर जाना मत छोड़ना।'
अगले हफ़्ते माँ उसके साथ गईं। कियारा उन्हें एक-एक पेड़ के पास ले गई और बताती रही कि किससे कैसी खुशबू आती है। माँ ज़्यादातर चुप रहीं। लौटते वक़्त उन्होंने कहा कि इतने साल इस गाँव में रहकर भी उन्होंने यह कभी नहीं देखा।
तब से कियारा हर हफ़्ते जंगल जाने लगी, कभी माँ के साथ, कभी सहेलियों के साथ। हर बार वह झील के किनारे कुछ देर बैठती और झाड़ियों की तरफ़ देखती रहती। खरगोश कभी दिखता, कभी नहीं। कियारा दोनों बार उतनी ही देर बैठती थी। बैग में रखे वे दो सफ़ेद फूल उसी शाम मुरझा गए थे। उसने उन्हें फेंका नहीं, किताब के बीच रख दिया। महीनों बाद जब किताब खुली, तो पन्ने से हल्की सी वही खुशबू आई।