विनोद का दिन कब शुरू होता था, यह कहना मुश्किल था। वह देर से उठता, देर से खाता, और देर रात तक जागता रहता। पढ़ाई में वह तेज़ था, इसलिए किसी ने ज़्यादा टोका नहीं। उसका एक तकिया-कलाम था, जो घर में सब जानते थे। 'अभी बहुत समय है। कल कर लूँगा।' यह बात वह इतनी बार कह चुका था कि अब कोई उस पर जवाब भी नहीं देता था।
गाँव में जनसेवा केंद्र एक ही था और उसका कंप्यूटर आधे दिन बंद रहता था। इसलिए ज़्यादातर काम विनोद के हाथ से होता था। उसकी लिखाई साफ़ थी और उसे पता था कि किस ख़ाने में क्या भरना है। लोग काग़ज़ लेकर उसके दरवाज़े पर आते, चप्पल बाहर उतारते, और बैठ जाते। वह चाय पीता रहता और फ़ॉर्म भरता जाता।
सुखदेई उसी गली के आख़िर में रहती थी। उसका आदमी तीन साल पहले गुज़र गया था और उसके बाद से घर में कमाने वाला कोई नहीं था। पेंशन का फ़ॉर्म वह पिछले साल भी लाई थी, पर तब काग़ज़ पूरे नहीं थे। इस बार सब पूरे थे। बैंक की कॉपी, आधार, और वह पीला काग़ज़ जो तहसील से मिलता है।
उसका बेटा दूर नहीं गया था, वह पास ही ईंट-भट्ठे पर काम करता था, पर उसकी अपनी गृहस्थी थी और उसमें दो बच्चे थे। महीने में जो बचता, वह उसी में ख़त्म हो जाता। पेंशन के पंद्रह सौ रुपये किसी को अमीर नहीं बनाते। पर वे हर महीने आते हैं, और यह अलग बात होती है।
फ़ॉर्म के ऊपर एक तारीख़ छपी थी। आख़िरी तारीख़। विनोद ने उसे देखा और मन में हिसाब लगाया कि अभी बाईस दिन बाकी हैं। बाईस दिन बहुत होते हैं। उसने फ़ॉर्म तह करके आले में रख दिया और सुखदेई से कहा कि निश्चिंत रहो, काकी, हो जाएगा।
फिर छठ आ गया। घाट की सफ़ाई थी, ठेकुआ बन रहा था, और बहन ससुराल से आई हुई थी। चार दिन तक कुछ और सोचने की जगह नहीं बची। छठ के बाद दो दिन वह सोता रहा। जब उठा तो आले में रखा फ़ॉर्म वैसे का वैसा था।
तब भी नौ दिन बचे थे। नौ दिन में क्या नहीं होता। वह ब्लॉक जाने वाला था, फिर उसी दिन दोस्त की बाइक ख़राब हो गई। फिर पानी बरस गया। फिर एक दिन वह गया, पर वहाँ ताला था, क्योंकि किसी अफ़सर की बदली हो रही थी। वह लौट आया और सोचा कि कल चला जाएगा।
सुखदेई बीच में दो बार पूछने आई। पहली बार उसने कहा कि हो जाएगा। दूसरी बार उसने कहा कि हो गया समझो। दोनों बार उसने यह इस तरह कहा जैसे बात सचमुच हो चुकी हो, और दोनों बार सुखदेई मान गई। उसे लिखा-पढ़ी की समझ नहीं थी। उसे बस इतना पता था कि गली में एक लड़का है जो पढ़ा-लिखा है।
आख़िरी दिन वह पहुँचा। खिड़की पर बैठे आदमी ने फ़ॉर्म लिया, छपी हुई तारीख़ पर उँगली रखी। फिर उसे वापस सरका दिया। पोर्टल पिछली रात बारह बजे बंद हो चुका था। विनोद ने कहा कि आज ही तो आख़िरी दिन है। आदमी ने कहा कि था।
वह उसी दिन तहसील गया। वहाँ से उसे ब्लॉक भेजा गया और ब्लॉक से वापस तहसील। दिन भर यही चला। एक क्लर्क ने कहा कि अगली बार का इंतज़ार करो, और अगली बार साल भर बाद आएगी। किसी ने उसे डाँटा नहीं। किसी ने यह भी नहीं कहा कि तुमने देर कर दी। वहाँ बैठे लोगों के लिए यह रोज़ की बात थी।
शाम को वह सुखदेई के दरवाज़े पर गया। वह चौके में थी और उसने विनोद को देखकर पहले चाय का पूछा। विनोद ने कहा कि फ़ॉर्म जमा नहीं हुआ। सुखदेई ने पूछा कि कब जमा होगा। उसने कहा, अगले साल।
सुखदेई कुछ देर बैठी रही। फिर उसने पूछा कि अगला साल कब आएगा। यह सवाल उसने ताना मारने के लिए नहीं पूछा था। वह सचमुच जानना चाहती थी। विनोद ने महीने गिनकर बताने शुरू किए और गिनते-गिनते उसकी आवाज़ धीमी होती चली गई।
उस साल सुखदेई ने फिर से खेत पकड़ लिया। रोपाई में औरतें दिन भर पानी में खड़ी रहती हैं और शाम को कमर सीधी नहीं होती। उसकी उम्र उस काम की नहीं थी। गली में लोग कहते थे कि बुढ़िया को अब आराम करना चाहिए। यह कोई नहीं कहता था कि आराम के पैसे कहाँ से आएँगे।
विनोद ने उसके घर राशन भिजवाया। सुखदेई ने पहली बार ले लिया। दूसरी बार उसने मना कर दिया और कहा कि पेंशन और ख़ैरात में फ़र्क़ होता है। इसके बाद विनोद ने भेजना बंद कर दिया। इसके बाद वह उस गली से होकर भी कम ही निकलता था।
अगले साल का फ़ॉर्म आठ महीने पहले भर दिया गया। विनोद ने उसे आले में नहीं रखा। उसी हफ़्ते जमा किया, रसीद ली, और रसीद लाकर सुखदेई के हाथ में दे दी। सुखदेई पढ़ नहीं सकती थी। उसने उसे संदूक में रख लिया, उसी कपड़े के नीचे जिसमें आदमी के काग़ज़ रखे थे।
अब जो भी फ़ॉर्म उसके पास आता है, उस पर सबसे पहले वह नाम नहीं लिखता। सबसे ऊपर, हाशिये में, लाल स्याही से आख़िरी तारीख़ लिखता है। लोग पूछते हैं कि यह क्या लिख रहे हो। वह इतना ही कहता है कि आदत है।
पेंशन अगले बरस से आने लगी। पहली बार जब पैसा आया, सुखदेई ने उसमें से अपने लिए कुछ नहीं रखा, पूरा का पूरा बहू के हाथ में दे दिया और कहा कि जो लेना हो ले लेना। विनोद उस दिन वहाँ नहीं था। उसके आले में उस वक़्त चौदह फ़ॉर्म रखे थे, और हर एक के सिरे पर, नाम से भी ऊपर, लाल स्याही में एक तारीख़ लिखी हुई थी।