गाँव के स्कूल के पीछे वाली बगिया को सब 'चमकते फूलों की बगिया' कहते थे। नाम की वजह साफ़ थी। दोपहर में जब धूप सीधी पड़ती, वहाँ के फूल सचमुच चमकने लगते: गुलाबी, नीले, पीले, लाल, सफ़ेद। बच्चे स्कूल से लौटते वक़्त जान-बूझकर लंबा रास्ता लेते, सिर्फ़ इसलिए कि बगिया के सामने से गुज़र सकें।

एक दिन माली एक टूटी हुई गमली में एक नया पौधा ले आया। उसे वह सड़क के किनारे से उठाकर लाया था, जहाँ किसी ने उसे फेंक दिया था। पौधे में एक ही फूल था, छोटा और पीला, जिसकी पंखुड़ियाँ किनारे से कटी हुई थीं। माली ने उसे दीवार के पास लगा दिया और चला गया। उस फूल का नाम था चमेली।

पहली शाम चमेली ने चुपचाप बगिया को देखा। हर तरफ़ चमक थी। लाल गुलाब सिर उठाए खड़े थे, नीले फूल कतार में झूम रहे थे। रात को हवा चली तो चमेली ने अपनी कटी पंखुड़ियाँ जितना हो सका समेट लीं। उसे लगा कि कहीं कोई देख न ले।

जब हिम्मत जागी

पर सुबह सबने देख ही लिया। 'यह कौन है?' एक पीले फूल ने पूछा। 'तुम तो बहुत मुरझाई हुई हो,' दूसरे ने कहा। 'तुम्हारी चमक कहीं नज़र नहीं आती।' कोई ज़ोर से नहीं हँसा, पर सब हँसे। चमेली चुप रही। उसने अपना सिर थोड़ा और नीचे कर लिया और सोचती रही कि क्या वह कभी चमक सकेगी।

अगले कुछ दिन चमेली ने कोशिश की। उसने अपनी पंखुड़ियाँ बाकी फूलों की तरह चौड़ी खोलनी चाहीं, पर वे उतनी बड़ी थीं ही नहीं। उसने सीधा खड़ा होना चाहा, पर उसका तना पतला था और झुक जाता था। जितना वह दूसरों जैसी बनने की कोशिश करती, उतनी ही थक जाती। एक शाम उसने कोशिश करना छोड़ दिया और चुपचाप बैठ गई।

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उसी शाम बगिया की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी गुलाब, जिसे सब रानी गुलाब कहते थे, उसके पास आई। वह कुछ देर चुप खड़ी रही। फिर बोली, 'तुम सुबह से क्या कर रही हो?' 'सबके जैसा बनने की कोशिश,' चमेली ने कहा। रानी गुलाब हँसी। 'और थक गईं?' 'हाँ।'

'मेरी एक बात सुनो,' रानी गुलाब ने कहा। 'मैं इस बगिया में सबसे पुरानी हूँ। मैंने सैकड़ों फूल खिलते और मुरझाते देखे हैं। जो सबसे ज़्यादा दिन टिके, वे सबसे बड़े नहीं थे। वे वही थे जिन्होंने अपनी जगह पहचान ली।' चमेली ने पूछा, 'मेरी जगह क्या है?' रानी गुलाब ने दीवार की तरफ़ इशारा किया। 'यहाँ शाम की आख़िरी धूप सबसे देर तक रुकती है। पूरी बगिया में सिर्फ़ यहाँ। तुम्हें किसी ने यूँ ही यहाँ नहीं लगाया।'

उस रात चमेली ने अपनी कटी पंखुड़ियाँ नहीं समेटीं। अगली शाम, जब बाकी बगिया की धूप ढल चुकी थी, दीवार के पास की रोशनी अब भी सुनहरी थी। उसमें चमेली की पीली पंखुड़ियाँ ऐसे चमकीं जैसे किसी ने भीतर से दिया जला दिया हो। कटे हुए किनारों पर रोशनी अटकी और बिखर गई। वह चमक बाकी फूलों जैसी नहीं थी। वह उससे अलग थी।

माँ की सीख

सबसे पहले एक छोटे बच्चे ने देखा, जो स्कूल से लौट रहा था। वह रुका, गेट से भीतर झाँका, और अपनी बहन को बुलाकर दीवार के पास वाला कोना दिखाया। अगले दिन दो और बच्चे आए। हफ़्ता बीतते-बीतते शाम को बगिया के सामने रुकना बच्चों की आदत बन गई।

'तुम सच में खूबसूरत हो, चमेली,' नीले फूलों ने एक दिन कहा। 'तुम्हारी वजह से अब शाम को भी लोग आते हैं।' चमेली मुस्कुराई। 'मैंने कुछ नया नहीं किया,' उसने कहा। 'बस वही करना छोड़ दिया जो मैं थी ही नहीं।'

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कुछ महीने बाद माली एक और टूटी गमली उठा लाया। इस बार उसमें एक पतला सा हरा पौधा था, जिस पर एक भी फूल नहीं था। उसने उसे भी दीवार के पास लगा दिया, चमेली के ठीक बगल में। पहली शाम वह पौधा चुपचाप सिकुड़ा रहा। इस बार किसी फूल ने उसे टोका नहीं, पर पौधे को फिर भी डर लगा। उसने अपनी पत्तियाँ भीतर की ओर मोड़ लीं।

चमेली उसकी तरफ़ झुकी। 'तुम्हें पता है, यहाँ की सबसे अच्छी बात क्या है?' उसने पूछा। पौधे ने ना में सिर हिलाया। 'शाम की आख़िरी धूप,' चमेली ने कहा। 'वह पूरी बगिया में सिर्फ़ यहाँ तक रुकती है। कुछ दिन इंतज़ार करो।' पौधा कुछ नहीं बोला। पर उस रात उसने सिकुड़ना छोड़ दिया, और अगली सुबह उसकी एक पत्ती थोड़ी और खुली हुई थी।

उसके बाद बगिया में सब कुछ पहले जैसा ही रहा। सुबह गुलाब चमकते, दोपहर में गेंदे, और शाम को दीवार के पास वाला वह छोटा पीला फूल। रानी गुलाब कभी-कभी उधर देखती और चुपचाप सिर हिला देती। किसी ने किसी को बदलने के लिए नहीं कहा, और बगिया पहले से ज़्यादा भरी हुई लगने लगी।