जाड़े की उस सुबह हवा में कुछ मीठा था। मुन्नी ने उसे सबसे पहले वटवृक्ष के नीचे सूँघा, जहाँ वह रोज़ स्कूल जाते वक़्त एक मिनट रुकती थी। पहले उसे लगा कि किसी घर से आ रहा है। पर घर पीछे थे और हवा सामने से आ रही थी, खेतों की तरफ़ से। उस दिन वह स्कूल देर से पहुँची और उसे बाहर खड़ा कर दिया गया। खड़े-खड़े भी वह वही सूँघती रही।
दूसरे दिन वह जल्दी निकली। वटवृक्ष के नीचे खुशबू और तेज़ थी। तीसरे दिन और भी। चौथे दिन उसने अपनी सहेली रुक्मिणी से पूछा कि क्या उसे कुछ आ रहा है। रुक्मिणी ने लंबी साँस खींची और कहा, "गुड़।" इससे मुन्नी को कोई मदद नहीं मिली, क्योंकि गुड़ तो डिब्बे में रखा होता है, और डिब्बे से पूरे गाँव तक खुशबू नहीं जाती।
मुन्नी ने पहले यह पता करने की कोशिश की कि खुशबू किस वक़्त सबसे तेज़ होती है। सुबह वह वटवृक्ष के नीचे रुकती और गिनती कि कितनी साँसों में वह आती है। शाम को लौटते वक़्त भी रुकती। कभी उसे लगता कि सुबह ज़्यादा तेज़ है, कभी लगता कि शाम को। आख़िर में उसने यह हिसाब छोड़ दिया। एक बात ज़रूर पक्की थी: हवा जिस तरफ़ से आ रही थी, वह तरफ़ हमेशा एक ही रहती थी।
नई शरारत की शुरुआत
उसने घर पर पूछा। माँ ने कहा कि मौसम है, हर साल आती है। दादा ने कहा कि पहले इससे भी तेज़ आती थी। किसी ने यह नहीं बताया कि आती कहाँ से है, इसलिए नहीं कि छिपा रहे थे, बल्कि इसलिए कि उनके लिए यह सवाल ही नहीं था। मुन्नी के लिए यही सबसे बड़ा सवाल था।
इतवार को वह निकल पड़ी। तरीक़ा उसने ख़ुद बनाया। जहाँ खुशबू कम हो, वहाँ से लौट आओ। जहाँ ज़्यादा हो, उधर बढ़ते जाओ। वटवृक्ष से वह खेतों की तरफ़ गई, फिर नहर की पटरी पकड़ी, फिर पटरी छोड़ दी क्योंकि उधर खुशबू हल्की पड़ रही थी। दो बार वह ग़लत मुड़ी। एक बार वह एक भैंस से डरकर काफ़ी देर एक पेड़ के पीछे खड़ी रही।
रास्ता उसने जितना सोचा था, उससे लंबा निकला। धूप चढ़ आई और उसकी चप्पल में मिट्टी भर गई। एक जगह खुशबू बिलकुल ग़ायब हो गई और मुन्नी दस मिनट खड़ी रही, यह सोचकर कि उसने पूरा इतवार बर्बाद कर दिया। फिर हवा का रुख़ बदला और खुशबू लौट आई, पहले से तेज़। उसके बाद वह दौड़ने लगी।
आख़िर में वह जहाँ पहुँची, वहाँ धुआँ था। गन्ने के खेत के किनारे एक कोल्हू लगा हुआ था। एक बैल गोल-गोल घूम रहा था, रस एक नाली से बहकर एक बड़ी कड़ाही में गिर रहा था, और कड़ाही के नीचे आग जल रही थी। रस उबल रहा था और उसी से वह भाप उठ रही थी जिसे मुन्नी चार दिन से सूँघ रही थी। इतने पास से वह खुशबू इतनी तेज़ थी कि उसकी आँखों में पानी आ गया।
कड़ाही के पास एक आदमी बैठा था जो चौड़े कलछे से झाग उतार रहा था। उसने मुन्नी को देखा और पूछा कि किसकी लड़की है। मुन्नी ने बता दिया। आदमी ने जवाब में सिर हिलाया, फिर कलछे से थोड़ा गाढ़ा रस निकालकर एक पत्ते पर डाला और उसे एक तरफ़ रख दिया। "जमने दे," उसने कहा। मुन्नी वहीं ज़मीन पर बैठ गई।
सबसे अच्छी तरकीब
वहाँ का सारा काम धीमा और बड़ा था। बैल एक ही गोल रास्ते पर चलता रहता और उसके साथ लकड़ी का पूरा ढाँचा चरमराता रहता। दो आदमी गन्ने के गट्ठर खोलकर एक-एक करके कोल्हू में डालते जाते। रस पतला और मटमैला निकलता था और मुन्नी को यक़ीन नहीं हुआ कि इसी से गुड़ बनेगा। वही रस कड़ाही में घंटों उबलता, गाढ़ा होता जाता, और उसका रंग बदलकर सुनहरा हो जाता।
वह गुड़ की पहली परत थी और उससे मीठा मुन्नी ने कुछ नहीं खाया, न उससे पहले, न उसके बाद। शाम को वह घर लौटी तो उसके कपड़ों से धुएँ की गंध आ रही थी और उसे डाँट पड़ी। डाँट उसने सुन ली। दो हफ़्ते बाद गन्ना ख़त्म हो गया, कोल्हू उखड़ गया, और हवा से मिठास चली गई। गाँव में इस पर कोई बात नहीं हुई, जैसे यह हर साल की बात हो, जो थी भी।
अगले जाड़े में मुन्नी वटवृक्ष के नीचे रोज़ रुकने लगी, स्कूल से पहले, सिर्फ़ एक साँस के लिए। जिस सुबह खुशबू आई, वह अकेली नहीं थी। उसके साथ चार बच्चे और खड़े थे, क्योंकि उसने सबको पहले से बता रखा था। उस साल कोल्हू तक पहुँचने में उन्हें एक बार भी ग़लत नहीं मुड़ना पड़ा। कोल्हू वाले आदमी ने मुन्नी को पहचान लिया और पूछा कि इस बार इतने सारे कैसे। मुन्नी ने कहा कि सबको खुशबू आई थी। आदमी ने गिनकर पाँच पत्ते निकाले और एक तरफ़ रख दिए।