विवान को पुरानी चीज़ों से एक अजीब लगाव था। टूटे सिक्के, मिट्टी के ठीकरे, और ऐसी किताबें जिनके पन्ने छूने से भुरभुरा जाते थे। दोस्त कहते थे कि वह ग़लत सदी में पैदा हुआ है। विवान हँस देता। उसे एक ही सवाल परेशान करता था। जो वक़्त बीत जाता है, वह जाता कहाँ है। इसका जवाब किसी के पास नहीं था।

जवाब उसे उस साल मिला जब गाँव की बावड़ी साफ़ करने का तय हुआ। बुंदेलखंड में बावड़ियाँ हर दूसरे गाँव में हैं और ज़्यादातर भरी पड़ी हैं। इसमें कोई रहस्य नहीं है। मिट्टी हर बरसात में थोड़ी-थोड़ी बैठती जाती है, और चालीस साल में वह इतनी हो जाती है कि पानी का नाम भी नहीं बचता।

उस साल दोनों हैंडपंप जवाब दे गए थे और आषाढ़ लगने में तीन हफ़्ते थे। इसलिए यह काम शौक़ का नहीं था। बावड़ी साफ़ न होती तो बरसात का पानी भी कहीं नहीं ठहरता।

काम सुखदेव के ज़िम्मे था, क्योंकि उसने यह पहले देखा हुआ था। उसके बाप ने आख़िरी बार यह बावड़ी साफ़ की थी और तब सुखदेव ऊपर रस्सी पर था।

विवान पहले दिन से वहाँ था और उसे कोई बुलाने नहीं गया था।

📚 यह भी पढ़ें दमन के खोज की कहानी
दमन के खोज की कहानी

बावड़ी चौकोर थी और उसमें सात मंज़िलें थीं। मंज़िल का मतलब यहाँ कमरा नहीं है। हर सात-आठ सीढ़ी बाद एक चौड़ा चबूतरा आता है, जहाँ आदमी घड़ा रखकर साँस ले सके। सात चबूतरे, यानी सात बार रुकना।

और हर चबूतरे की दीवार पर लकीरें खुदी थीं। लकीर के साथ कुछ लिखा था। सबसे ऊपर वाली दो लकीरें विवान ने पहले दिन पढ़ लीं और वे दोनों साल थे।

वे पानी के निशान थे। जिस बरस पानी जहाँ तक चढ़ा, किसी ने वहाँ लकीर खींचकर साल लिख दिया। ऊपर की लकीरें उन बरसों की थीं जब बावड़ी भर जाती थी। नीचे की लकीरें उन बरसों की जब वह मुश्किल से चौथे चबूतरे तक आई।

विवान को अपने सवाल का जवाब उसी दिन दिख गया, हालाँकि उसने उसे इस तरह सोचा नहीं। जो वक़्त बीत गया वह नीचे है। परत दर परत। और उस पर मिट्टी पड़ी हुई है।

सफ़ाई ऊपर से नीचे होती है और धीरे होती है। दो आदमी नीचे मिट्टी भरते हैं, तीन ऊपर टोकरी खींचते हैं। पहले हफ़्ते में तीन चबूतरे निकले। मिट्टी में से जो निकला वह यही था। ठीकरे, एक पीतल का लोटा जिसका पेंदा नहीं था, काँच की चूड़ियाँ, और एक सिल जो ऊपर तक नहीं लाई जा सकी।

📚 यह भी पढ़ें अद्भुत गुफा का रहस्य
अद्भुत गुफा का रहस्य

विवान ने इनमें से कुछ नहीं माँगा। ये गाँव की चीज़ें थीं और एक ढेर में डाल दी जाती थीं। उसे इससे मतलब भी नहीं था। उसे लकीरों से मतलब था, और लकीरें नीचे थीं।

नीचे जाने का एक ही नियम था और सुखदेव उसे रोज़ सुबह दोहराता था। पहले दीया उतारो। रस्सी में बाँधकर, नीचे तक। दीया जलता रहे तो आदमी उतरे। दीया बुझ जाए तो कोई नहीं उतरेगा, चाहे कुछ भी हो।

विवान ने वजह पूछी थी और सुखदेव ने वजह नहीं बताई थी। उसने सिर्फ़ इतना कहा था कि जो हवा दीये को नहीं जलने देती, वह आदमी को भी नहीं जलने देती।

बारहवें दिन विवान सबसे पहले पहुँच गया। बाक़ी लोग सात बजे आते थे। वह छह बजे वहाँ था और पाँचवाँ चबूतरा खुल चुका था।

उसने दीया नहीं उतारा। उसके पास वजह भी थी, और वजह यह थी कि कल शाम दीया उतरा था और ठीक जला था। एक रात में क्या बदल जाएगा।

📚 यह भी पढ़ें रहस्यमय द्वीप की खोज
रहस्यमय द्वीप की खोज

बावड़ी में नीचे जाते हुए दो चीज़ें बदलती हैं, और दोनों इतनी धीरे बदलती हैं कि पता नहीं चलता। ठंडक बढ़ती जाती है। तीसरे चबूतरे पर बाँहों पर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। और आवाज़ बंद होती जाती है। चौथे के बाद आदमी को अपनी ही साँस सुनाई देने लगती है।

वह उतरा। पाँचवाँ चबूतरा पार किया। छठा पार किया। छठे पर लकीर थी, और लकीर के साथ लिखा हुआ भी था। वह उसे पढ़ने के लिए झुका।

अक्षर पुराने थे और उन्हें पढ़ने में वक़्त लगा। उसी बीच उसने देखा कि हाथ में पकड़ी लालटेन की लौ छोटी हो गई है। और उसका रंग नीला है। उसने इस पर ध्यान नहीं दिया। वह पढ़ रहा था।

आगे उसे इतना याद है कि सीढ़ी बहुत लंबी हो गई थी और घुटने भारी थे। उसने ऊपर की तरफ़ चढ़ना शुरू किया और तीसरी सीढ़ी पर बैठ गया। बैठना उसने तय नहीं किया था।

सुखदेव सात से पहले आ गया, क्योंकि उसे विवान की साइकिल बाहर खड़ी दिखी। रस्सी नीचे गई। विवान ने उसे कमर में लपेटा या नहीं, यह उसे याद नहीं। ऊपर आते हुए रस्सी उसकी बाईं कलाई से कोहनी तक रगड़ती चली गई।

📚 यह भी पढ़ें दमन के खोज की कहानी
दमन के खोज की कहानी

ऊपर सुखदेव चिल्लाया नहीं। उसने पानी पिलाया और थोड़ी देर बाद इतना कहा कि दीया इसीलिए उतारा जाता है कि कल का पता आज से नहीं चलता। फिर वह काम पर लौट गया और उस दिन बावड़ी में कोई नहीं उतरा।

जो लिखा था वह उसे बाद में याद आया, और वह उतना ही मामूली था जितनी नीचे की हर चीज़ थी। एक साल, और उसके नीचे दो शब्द। पानी नहीं। यानी सबसे नीचे वाली लकीर पानी के चढ़ने की नहीं थी। वह उस बरस की थी जब बावड़ी में कुछ नहीं था।

बावड़ी उस बरस साफ़ हुई और आषाढ़ में भर गई। पानी पाँचवीं लकीर तक आया, जो अच्छा बरस माना जाता है। रस्सी का निशान विवान की बाँह पर छह महीने रहा और फिर धीरे-धीरे चला गया। घर में पुरानी चीज़ों का जो डिब्बा है, उसमें आज भी वही टूटे सिक्के और ठीकरे हैं, और उनमें से एक भी बावड़ी का नहीं है।