विक्रम के दादा के पास एक नक्शा था, जो असल में नक्शा था ही नहीं। वह बस एक कागज़ था जिस पर कुछ लकीरें खिंची थीं और एक जगह गोला बना था। दादा कहते थे कि वहाँ कभी एक पूरा शहर था, और फिर नहीं रहा। बचपन में विक्रम यह सुनकर हँसता था। बड़े होकर उसने वही कागज़ अपनी अलमारी में रख लिया, और उसे देखना बंद नहीं कर पाया।

विक्रम ने आख़िर तय कर ही लिया कि वह जाएगा। तैयारी में उसे दो हफ़्ते लगे। रस्सी, मशाल, सूखा खाना, और पानी की दो बोतलें। घर पर उसने कहा कि वह कुछ दिन के लिए बाहर जा रहा है, और इससे ज़्यादा कुछ नहीं कहा, क्योंकि पूरी बात बताने पर सवाल आते और सवालों के जवाब उसके पास नहीं थे। नक़्शे की लकीरें उत्तर की तरफ़ जाती थीं, जंगल के भीतर। पहले दिन रास्ता चौड़ा था। दूसरे दिन वह पगडंडी बन गया। तीसरे दिन कुछ भी नहीं बचा और विक्रम अंदाज़े से चलने लगा। रात में वह पेड़ पर चढ़कर सोता था, क्योंकि नीचे से आवाज़ें आती थीं। वह हर सुबह थका हुआ उठता था।

चौथे दिन उसे झील मिली। पानी हरा था और इतना ठहरा हुआ कि उसमें पेड़ों की परछाईं साफ़ बनी थी। विक्रम किनारे किनारे चला। दोपहर तक कुछ नहीं मिला। फिर उसे पानी के पास एक सीधी रेखा दिखी, और जंगल में सीधी रेखा अपने आप नहीं बनती। वह पत्थर की एक दीवार का ऊपरी किनारा था, बाक़ी मिट्टी में दबा हुआ। विक्रम घुटनों के बल बैठकर मिट्टी हटाने लगा। दीवार चुनी हुई थी। किसी ने उसे बनाया था। उसके हाथ काँपने लगे और उसने काम रोक दिया।

ऊपर चढ़ने का फैसला

विक्रम ने उन अवशेषों की ओर क़दम बढ़ाए। वहाँ एक पुराना मंदिर था, जिसकी आधी छत गिर चुकी थी। भीतर एक पत्थर रखा था जिस पर कुछ निशान उकेरे हुए थे। विक्रम ने उन्हें उँगली से टटोला। तभी उसे दादी की एक बात याद आई, जो उसने बचपन में सुनी थी और भुला दी थी। दादी कहती थीं कि उस शहर का एक ही निशान बचा है, और वह पत्थर पर है। विक्रम ने कागज़ निकालकर उन निशानों की नक़ल उतारी, फिर उसे दादा के नक़्शे के बग़ल में रखकर देखा। गोला वहीं था।

पत्थर लेकर विक्रम एक पुरानी गुफा में गया। भीतर एक सुरंग थी, गहरी और अँधेरी। उसने मशाल जलाई और उसमें घुस गया। सुरंग लंबी थी। कहीं-कहीं छत इतनी नीची हो जाती कि उसे झुककर चलना पड़ता। फिर अचानक जगह खुल गई। सामने एक पूरा शहर पड़ा था, वही जो किंवदंतियों में सुनाया जाता था। ऊँची दीवारें, चौड़ी गलियाँ, और पत्थर के मकान जिनकी छतें बैठ चुकी थीं। विक्रम मशाल हाथ में लिए वहीं खड़ा रह गया।

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विक्रम गलियों में घूमता रहा। मकान छोटे थे और एक दूसरे से सटे हुए। कहीं दरवाज़े की चौखट बची थी, कहीं सिर्फ़ दहलीज़। एक घर में उसे चक्की का निचला पाट मिला, ठीक वैसा ही जैसा उसके अपने घर में रखा है। एक जगह गली अचानक चौड़ी हो जाती थी और बीच में एक गोल चबूतरा था। विक्रम वहाँ बैठ गया। उसने ऊपर देखा और पत्थर की छत देखी। यह शहर ज़मीन के नीचे नहीं बना था। ज़मीन बाद में इसके ऊपर आ गई थी। यह समझने में उसे कुछ देर लगी, और उसके बाद उसे ठंड लगने लगी।

विक्रम तीन दिन उस शहर में रहा। उसने गलियाँ नापीं, दीवारों के कोण देखे, और जो कुछ बचा था उसका खाका कागज़ पर उतारा। पानी उसके पास चार दिन का था। तीसरी रात उसने हिसाब लगाया और लौटने का फ़ैसला किया। जाते हुए उसने कुछ नहीं उठाया। न पत्थर, न मिट्टी के टुकड़े, कुछ भी नहीं। उसे डर था कि अगर वह कुछ लेकर निकला तो लोग पूछेंगे कि कहाँ से मिला, और फिर यहाँ आदमी आएँगे, और फिर यह शहर वैसा नहीं रहेगा जैसा उसने देखा है। सुरंग से बाहर निकलते वक़्त उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा। मशाल की रोशनी में सिर्फ़ दीवार दिख रही थी।

गाँव लौटकर उसने किसी को नहीं बताया। एक बार कोशिश की थी, चाय की दुकान पर, और तीसरे वाक्य पर ही रुक गया, क्योंकि सुनने वाले की आँखों में वही हँसी थी जो कभी उसकी अपनी आँखों में हुआ करती थी। उस रात उसने दादा वाला कागज़ अलमारी से निकाला। उसमें बस कुछ लकीरें थीं और एक गोला। विक्रम ने नया कागज़ लिया और उस पर ठीक से नक़्शा बनाया। दूरियाँ लिखीं, झील का किनारा बनाया, गुफा का मुँह बनाया, और सुरंग की लंबाई क़दमों में लिखी। फिर उसने दोनों कागज़ एक साथ मोड़कर उसी अलमारी में रख दिए। किसी दिन कोई उन्हें निकालेगा और हँसेगा। विक्रम को इससे कोई शिकायत नहीं थी।