सावित्री को वह दीवार पहले जाड़े में मिली, हाथ से।
वह अकेली रहती है और फ़्लैट उसने अपने नाम पर लिया था, जो उस मोहल्ले में अब भी नोट की जाने वाली बात है। बैंक की किस्त सत्रह साल की है। यह हिसाब उसे रोज़ याद रहता है और इसी वजह से आगे जो हुआ उसमें उसके पास चुनने को ज़्यादा कुछ था नहीं।
फ़्लैट उसने अगस्त में लिया था और नवंबर तक उसमें कुछ भी अजीब नहीं लगा था। पूस लगते ही बेडरूम की एक दीवार का एक हिस्सा बाक़ी दीवार से ठंडा रहने लगा। पूरी दीवार नहीं। बीच का एक चौकोर हिस्सा, ज़मीन से ऊपर तक।
उसने उस पर हाथ फेरा और फ़र्क़ साफ़ था। फिर उसने उँगली से ठोंका।
पहले उसने सोचा कि सीलन होगी। सीलन में दीवार ठंडी भी होती है और गीली भी। यह हिस्सा गीला नहीं था और उस पर से रंग भी नहीं उखड़ रहा था। दो हफ़्ते वह इसी पर अटकी रही।
पक्की दीवार पर ठोंकने से जो आवाज़ आती है वह भरी हुई होती है। उस हिस्से से खोखली आई।
उसने पूरी दीवार पर ठोंककर देखा, एक-एक बित्ता, और खोखले हिस्से की हद निकाल ली। फिर उसने पेंसिल से उस हद पर निशान लगा दिए, ताकि सुबह की रोशनी में उसे दोबारा ढूँढ़ना न पड़े।
तीन फुट चौड़ा, और ऊपर की तरफ़ जाकर गोलाई में मुड़ता हुआ। मेहराब वाली चौखट। पुराने मकानों में दरवाज़े ऐसे ही बनते थे।
वह इमारत सत्ताईस साल पुरानी है और उसमें बारह फ़्लैट हैं, तीन-तीन के चार तल्ले। सावित्री का फ़्लैट दूसरे तल्ले पर है।
इमारत उस तरह की है जो अस्सी और नब्बे के बीच बहुत बनी। बाहर से सादी, भीतर से ठीक-ठाक, और उसमें लिफ़्ट बाद में लगी। दीवारें मोटी हैं और यही वजह है कि किसी को कभी शक नहीं हुआ।
अगली सुबह वह नीचे उतरकर सड़क के उस पार गई और ऊपर देखा।
बारहों फ़्लैट एक ही नक़्शे के हैं, इसलिए खिड़कियाँ एक सीध में होनी चाहिए। पहले, तीसरे और चौथे तल्ले पर वे एक सीध में थीं। दूसरे तल्ले पर उसकी खिड़की बाक़ी से हटकर थी। ज़्यादा नहीं। दो-ढाई फुट।
वह सड़क पर खड़ी होकर काफ़ी देर यह देखती रही, और उसे यह अजीब लगा कि यह उसे पहले क्यों नहीं दिखा। जवाब भी साफ़ था। कोई अपनी इमारत को सड़क के उस पार खड़े होकर नहीं देखता।
इसके बाद उसने फ़ीता लिया और भीतर से नापा।
नाप एक बार में नहीं होता। दीवार के सहारे रखी अलमारी हटानी पड़ती है, पलंग खिसकाना पड़ता है, और फ़ीता अकेले आदमी से सीधा नहीं रहता। उसने तीन बार नापा और तीनों बार वही निकला।
बिक्री के काग़ज़ पर बेडरूम बारह गुणा ग्यारह लिखा है। वह बारह गुणा साढ़े आठ निकला।
बग़ल वाला फ़्लैट उसी हिसाब से बड़ा है। उसमें एक बुज़ुर्ग दंपती रहते हैं जो पंद्रह साल से वहाँ हैं और जिन्हें इस बारे में कुछ नहीं मालूम, क्योंकि उन्होंने वह फ़्लैट भी उसी हालत में ख़रीदा था।
दीवार बिल्डर ने खिसकाई थी, इमारत बनते वक़्त।
सावित्री ने इसे पता करने में चार महीने लगाए और इसमें कोई जासूसी नहीं थी। नगर निगम में इमारत का मंज़ूर नक़्शा रखा रहता है और वह कोई भी देख सकता है। उसमें दूसरे तल्ले की वह दीवार वहीं है जहाँ उसे होना चाहिए, और उसमें वह मेहराब वाला दरवाज़ा भी है।
नक़्शा मंज़ूर हुआ, इमारत उससे अलग बनी, और बीच वाली दीवार तीन फ़्लैटों पर खिसकाई गई। दूसरे, और उसके ऊपर-नीचे नहीं, बल्कि हर तीसरे नंबर पर। जिन फ़्लैटों में जगह जुड़ी, वे कोने वाले हैं और वे उस वक़्त कुछ ज़्यादा दाम पर बिके थे।
यह कोई बड़ी चोरी नहीं है। तीन फ़्लैटों में ढाई-ढाई फुट। पूरी इमारत में मिलाकर उतनी जगह बनती है जितनी एक छोटा कमरा होता है। पर वह जगह किसी ने बेची थी और किसी ने ख़रीदी थी, और सावित्री ने भी उसका दाम दिया था।
बिल्डर अब नहीं है। कंपनी का नाम बदल चुका है और वह नाम अब किसी और काम में है।
वकील ने सावित्री को दो बातें बताईं। पहली यह कि मामला बनता है। दूसरी यह कि उसमें इमारत के बाक़ी ग्यारह मालिकों को साथ आना पड़ेगा, क्योंकि नक़्शा पूरी इमारत का है।
वह सबके पास गई।
किसी ने बदतमीज़ी नहीं की। सबने सुना, कई ने चाय पिलाई, और सबने एक ही बात कही, अलग-अलग शब्दों में। कोने वालों को अपनी जुड़ी हुई जगह छोड़नी पड़ेगी। बाक़ी वालों का सौदा दोबारा खुलेगा और उनके काग़ज़ पंद्रह-बीस साल से जमे हुए हैं।
बुज़ुर्ग दंपती ने कहा कि वे बात तो सही मानते हैं, पर इस उम्र में अदालत नहीं जा सकते। यह सबसे साफ़ जवाब था और सबसे ईमानदार भी।
वकील ने आख़िरी मुलाक़ात में एक बात और कही। उसने कहा कि अकेले भी मामला डाला जा सकता है, पर उसमें दस-बारह साल लगेंगे और उतने में इमारत ख़ुद पचास की हो जाएगी। सावित्री ने पूछा कि जीत जाऊँ तो। वकील ने कहा कि तब भी दीवार वहीं रहेगी, क्योंकि उसे हटाने का मतलब बग़ल वाला कमरा तोड़ना है।
सावित्री ने मामला नहीं किया।
उसने एक काम किया। बेडरूम के फ़र्श पर, दीवार से ढाई फुट हटकर, उसने पेंसिल से एक लकीर खींची, कोने से कोने तक।
वह लकीर अब भी है। साल में एक बार, सफ़ेदी के वक़्त, उसे दोबारा खींचना पड़ता है, और वह खींच देती है।
जो लोग घर आते हैं वे उस पर से गुज़र जाते हैं। हर बार वह लकीर दीवार से नापकर खींची जाती है। ढाई फुट। नापने के लिए उसे दीवार से ही शुरू करना पड़ता है, क्योंकि नापने के लिए कहीं न कहीं से शुरू करना पड़ता है।