मिनू का घर जंगल के कोने में, एक पुराने पेड़ की जड़ के नीचे था। भीतर एक ही कमरा था। एक तरफ़ सूखी घास का बिस्तर, दूसरी तरफ़ दाने रखने की जगह, और बीच में इतनी जगह कि दो चूहे आराम से बैठ सकें। बरसात में वहाँ पानी नहीं आता था और जाड़े में हवा नहीं लगती थी। मिनू को यह सब पता था। फिर भी उसे लगता था कि उसका घर बहुत तंग है।
एक दिन वह जंगल के दूसरे हिस्से में चला गया। वहाँ उसने बड़े घर देखे। तालाब के किनारे बगुले का चौड़ा घोंसला, पहाड़ी के पास हाथी का बड़ा सा ठिकाना, और सबसे ऊँची डाल पर उल्लू का विशाल घोंसला। मिनू देर तक उन्हें देखता रहा। लौटते वक़्त उसका मन भारी था। उसे लगा कि जितना छोटा उसका घर है, उतना ही छोटा शायद वह ख़ुद भी है।
अगली सुबह मिनू ने तय किया कि वह ख़ुद अपना घर बड़ा करेगा। उसने जड़ के पास वाली मिट्टी खोदनी शुरू की। दिन भर खोदता रहा। शाम तक एक अच्छा-ख़ासा गड्ढा बन गया और मिनू बहुत खुश हुआ। पर रात को जब वह सोया, तो ऊपर की ढीली मिट्टी भरभराकर भीतर गिर पड़ी। सुबह उसका आधा घर मिट्टी से भरा था, और सर्दियों के लिए जमा किए दाने भी उसी में दब गए थे।
खेल-खेल में
दो दिन लगे उसे सारी मिट्टी बाहर निकालने में। जब काम पूरा हुआ, तो घर पहले से भी छोटा लगने लगा, क्योंकि अब उसे पता था कि वह और बड़ा हो ही नहीं सकता। उस रात उसे नींद नहीं आई। सुबह वह जंगल की सबसे बुज़ुर्ग तितली के पास गया, जिसे सब दादी कहते थे। दादी बरगद की नीची डाल पर रहती थीं और अब बहुत कम उड़ती थीं। मिनू ने उन्हें अपनी परेशानी बताई और पूछा, 'दादी, क्या मैं कोई बड़ा घर बना सकता हूँ?'
दादी ने सीधा जवाब नहीं दिया। उन्होंने पूछा, 'पिछली बरसात में जब तीन दिन लगातार पानी गिरा था, तब तुम कहाँ थे?' 'अपने घर में।' 'भीगे थे?' 'नहीं।' 'और जाड़े वाली उस रात, जब तालाब का किनारा जम गया था?' मिनू चुप हो गया।
'घर का आकार मायने नहीं रखता, बच्चे,' दादी ने कहा। 'मायने यह रखता है कि तुम उसमें सुरक्षित हो या नहीं, और तुम्हारे साथ कौन है। बगुले का घोंसला चौड़ा ज़रूर है, पर पिछली आँधी में वह दो बार गिर चुका है।' मिनू ने सिर उठाकर देखा। यह बात उसने कभी सोची ही नहीं थी।
'पर सब कहते हैं कि बड़ा घर अच्छा होता है,' उसने कहा। दादी हँसीं। 'लोग बहुत कुछ कहते हैं। तुम एक रात अपने घर में यह सोचे बिना बिताकर देखो कि वह छोटा है। फिर आकर बताना।'
मिनू लौटा। उस शाम उसने पहली बार अपने घर को ध्यान से देखा। जड़ की मिट्टी सूखी थी। घास का बिस्तर नरम था। दरवाज़े से ठीक इतनी रोशनी आती थी कि भीतर अँधेरा न लगे। उसने बाहर से कुछ सूखे फूल तोड़कर दीवार के पास रख दिए, और दाने वाली जगह ठीक से जमा दी।
सबका साथ
अगले दिन उसने अपने दोस्तों को बुलाया। तीन चूहे और एक गिलहरी भीतर आए, और घर एकदम भर गया। सब एक-दूसरे से सटकर बैठे, और दिनभर बातें होती रहीं। जाते वक़्त गिलहरी ने कहा, 'तुम्हारा घर छोटा है, पर यहाँ बैठकर बहुत अच्छा लगा।' मिनू पूरी शाम मुस्कुराता रहा।
उसी हफ़्ते जंगल में एक छोटी गिलहरी का बच्चा रास्ता भटक गया। शाम हो चुकी थी और उसे अपना पेड़ नहीं मिल रहा था। मिनू उसे अपने घर ले आया। भीतर जगह कम थी, इसलिए दोनों दाने वाली जगह के पास सिमटकर बैठे। मिनू ने उसे अपने सूखे फूल दिखाए और बताया कि दरवाज़े से सुबह की पहली रोशनी किस कोने पर गिरती है। सुबह गिलहरी का बच्चा अपने घर चला गया, पर जाते-जाते बोला कि वह फिर आएगा।
कुछ दिन बाद वह दादी के पास गया। 'आपने ठीक कहा था,' उसने कहा। 'मैंने घर नहीं बदला। बस सोचना बदल दिया।' दादी ने अपने पंख हल्के से हिलाए। 'यही सबसे बड़ी मरम्मत होती है,' उन्होंने कहा।
उस बरसात में जब फिर तीन दिन लगातार पानी गिरा, बगुले का घोंसला एक बार फिर टेढ़ा हो गया। मिनू ने उसे अपने घर में बुला लिया। दोनों को बैठने के लिए जगह कम पड़ी, और रात भर बगुले की चोंच दरवाज़े से बाहर रही। पर दोनों सूखे रहे। सुबह जब पानी थमा, बगुले ने बाहर निकलकर अपने पंख झाड़े और कहा कि उसने बहुत रातें ऊँचाई पर बिताई हैं, पर इतनी अच्छी नींद बहुत दिनों बाद आई। मिनू सिर्फ़ मुस्कुराया। उसने बस दरवाज़े के पास पड़े सूखे फूल सीधे कर दिए।