रेशमा की जादुई ताक़त उसके पंखों में थी, पर वे आम चिड़ियों जैसे नहीं थे। धूप में वे साधारण भूरे दिखते, पर जब वह उन्हें पूरा फैलाती तो उनमें से रंग निकलते: हरा, फिर सुनहरा, फिर एक ऐसा नीला जिसका नाम किसी को नहीं आता था। जंगल में सब जानते थे कि उन पंखों में कुछ है। रेशमा भी जानती थी, और शायद इसीलिए वह उन्हें कम ही खोलती थी।
उसे यह भी पता था कि हर बार पंख खोलने की एक क़ीमत होती है। रोशनी निकलने के बाद वह दो-तीन दिन ठीक से उड़ नहीं पाती थी। पंख भारी हो जाते और उसे किसी नीची डाल पर बैठकर इंतज़ार करना पड़ता। यह बात उसने कभी किसी को नहीं बताई थी।
सावन के आख़िर में एक शाम आसमान काला हो गया। हवा इतनी तेज़ चली कि पेड़ों की चोटियाँ ज़मीन की तरफ़ झुकने लगीं। पक्षी घोंसलों में दुबक गए और बड़े जानवर चट्टानों की ओट में चले गए। तूफ़ान रुकने का नाम नहीं ले रहा था।
रेशमा ने नीचे देखा। हिरनों का एक झुंड खुले मैदान में फँसा हुआ था और उसे कहीं ओट नहीं मिल रही थी। एक बच्चा हिरन बार-बार गिर रहा था। रेशमा ने कुछ देर सोचा। फिर उसने अपने पंख खोल दिए।
रोशनी फैली और हवा धीमी पड़ने लगी। तूफ़ान पूरा नहीं रुका, पर इतना कम हो गया कि झुंड चलकर जंगल के भीतर पहुँच गया। जब आख़िरी हिरन ओट में आ गया, रेशमा ने पंख समेट लिए और सबसे पास वाली डाल पर बैठ गई। दोबारा उड़ने में तीन दिन लगे।
जानवर उसे धन्यवाद देने आते रहे। एक ने पूछा कि वह डाल से उतर क्यों नहीं रही। रेशमा ने कहा कि बस आराम कर रही है। किसी ने आगे नहीं पूछा।
तीसरे दिन जब वह उड़ी, तो सबसे पहले उसी मैदान की तरफ़ गई। घास पर तूफ़ान के निशान अब भी थे। बच्चा हिरन वहीं था, अपनी माँ के पास, और रेशमा को देखकर उसने कान खड़े कर लिए। रेशमा एक चक्कर लगाकर लौट आई।
गर्मियों में जंगल का बड़ा जलाशय सूखने लगा। पहले किनारे सूखे, फिर बीच का हिस्सा फटने लगा। जानवर रोज़ सुबह वहाँ आते, बचा हुआ पानी देखते, और लौट जाते। सबसे ज़्यादा तकलीफ़ छोटे जानवरों को थी, क्योंकि बड़े जानवर बीच तक पहुँच जाते थे और वे नहीं पहुँच पाते थे।
एक दोपहर रेशमा जलाशय के ऊपर उड़ी। नीचे देखा। एक कछुए का बच्चा सूखी दरार में फँसा हुआ था। उसके आसपास कीचड़ तक नहीं बचा था।
पंख खोलने से पहले उसने हिसाब लगाया, जितना एक चिड़िया लगा सकती है। तूफ़ान एक शाम का था। यह गर्मी पूरे मौसम की थी। जिस दिन उसने हिरनों के लिए पंख खोले थे, आसमान पहले से भारी था और उसे बस एक धक्का देना था। इस बार आसमान ख़ाली था, और ख़ाली आसमान में बादल बनाने में कितना लगेगा, यह उसे नहीं मालूम था।
उस शाम रेशमा सबसे ऊँचे पेड़ की चोटी पर गई। उसने पंख पूरे खोले, जितने खोल सकती थी। रोशनी ऊपर उठी और आसमान में फैल गई। बादल बनने में देर लगी। बहुत देर। जब पहली बूँद गिरी, तब तक अँधेरा हो चुका था।
बारिश रात भर हुई। सुबह जलाशय में पानी था, कीचड़ नरम था, और कछुए का बच्चा किनारे पर बैठा था। जानवरों ने ऊपर देखा तो रेशमा उसी चोटी पर बैठी थी, जहाँ रात को थी। वह हिली नहीं थी। नीचे जानवर देर तक खड़े रहे। किसी ने आवाज़ नहीं लगाई।
दिन चढ़ा तो जानवर अपने-अपने काम पर चले गए, पर कछुए का बच्चा वहीं रुका रहा। वह पूरे दिन उसी पेड़ के नीचे बैठा रहा और ऊपर देखता रहा। शाम को उसकी माँ उसे बुलाने आई, तो उसने चलने से मना कर दिया। वह उस रात भी वहीं सोया, जड़ों के पास।
ऊपर सात दिन का मतलब सात दिन की धूप था। जलाशय भर चुका था और वह उस तक जा नहीं सकती थी। सुबह-सुबह पत्तों पर जो ओस बैठती, वही उसका पानी था, और दोपहर तक वह भी नहीं बचती। तीसरे दिन से उसने हिलना कम कर दिया, क्योंकि हिलने में भी कुछ ख़र्च होता है। चौथे दिन से उसने आँखें बंद रखनी शुरू कर दीं।
इस बार उसे उतरने में सात दिन लगे। एक बूढ़े उल्लू ने यह देख लिया और नीचे आकर बाकी जानवरों को बताया। तब पहली बार सबको पता चला कि हर बार क्या होता है।
जब रेशमा उतरी तो जलाशय के किनारे सब इकट्ठा थे। किसी ने भाषण नहीं दिया। हिरनों ने उसके लिए नरम घास का एक ढेर लगा रखा था। गिलहरियों ने मेवे रखे थे। कछुए का बच्चा सबसे आगे था और वह बोला कुछ नहीं, बस उसकी तरफ़ देखता रहा।
'तुमने बताया क्यों नहीं?' उल्लू ने पूछा। रेशमा ने कुछ देर सोचा। फिर बोली, 'बता देती तो तुम लोग मुझसे मदद माँगना छोड़ देते।' उल्लू के पास इसका जवाब नहीं था। वह उसी डाल पर उसके पास बैठा रहा, पूरी दोपहर।
अगले बरस से जंगल में एक नियम बन गया। जब भी रेशमा पंख खोलती, कोई न कोई उसके पास वाली डाल पर आकर बैठ जाता, और तब तक बैठा रहता जब तक वह दोबारा उड़ न ले। रेशमा ने इस पर कभी कोई आपत्ति नहीं की। सबसे ज़्यादा बार वही कछुआ आया, जो अब बड़ा हो चुका था और पेड़ पर चढ़ नहीं सकता था। वह नीचे जड़ों के पास बैठ जाता और ऊपर देखता रहता, ठीक वैसे ही जैसे उस पहली रात बैठा था।