बिट्टू की कॉपी के हाशिये कभी ख़ाली नहीं रहते थे। जहाँ जगह मिलती, वहाँ वह कुछ न कुछ बना देता। घर की पिछली दीवार पर उसने एक पूरा गाँव बना रखा था, जिसे माँ ने कई बार पोतने की धमकी दी थी और कभी पोता नहीं। बिट्टू के पास रंगों की एक पुरानी डिबिया थी, जिसमें बारह ख़ाने थे और उनमें से चार ख़ाली हो चुके थे। वह अक्सर सोचता था कि रंग आते कहाँ से हैं।
ख़ाली ख़ाने चार थे और बिट्टू को चारों याद थे। लाल सबसे पहले ख़त्म हुआ, क्योंकि छत और ईंटें उसी से बनती हैं। फिर पीला। फिर नीला। हरा उसने एक ही दिन में ख़त्म कर दिया था, जिस दिन उसने दीवार पर पूरे खेत बना डाले थे।
उस दोपहर वह दीवार के सामने बैठे-बैठे झपक गया और डिबिया गोद में खुली रह गई। जब उसने आँख खोली तो वह कहीं और था। ज़मीन थी, आसमान था, और चारों तरफ़ रंग थे। पर वे किसी चीज़ पर लगे हुए नहीं थे। वे बस खड़े थे, जैसे लोग खड़े होते हैं।
सबसे पहले उसे एक बात अजीब लगी। यहाँ हर रंग बोल सकता था। पर कोई ऊँची आवाज़ में बात नहीं करता था। सब अपनी-अपनी जगह पर थे। किसी को दूसरे की जगह नहीं चाहिए थी। बिट्टू ने यह पहली बार देखा। उसे यह अच्छा लगा।
दूसरी बात यह थी कि सब जल्दी में थे। कोई एक जगह टिककर खड़ा नहीं था। बिट्टू ने पूछा कि क्या हो रहा है, तो पास वाले रंग ने बिना रुके कहा कि होली में तीन दिन बचे हैं। यह सुनकर बिट्टू को लगा कि वह ग़लत हफ़्ते में आ गया है।
उसने डिबिया आगे की और लाल से कहा कि उसका ख़ाना ख़ाली हो गया है। लाल ने डिबिया में झाँका और सिर हिला दिया। इस हफ़्ते नहीं, उसने कहा। पहले टेसू के फूलों में जाना है, फिर पानी में, फिर लोगों के गालों पर। इतना कहकर वह चल दिया और जाते हुए भी वह जल्दी में था।
पीला रसोई की तरफ़ मुँह किए बैठा था। बिट्टू ने वही बात दोहराई। हल्दी में हूँ, पीले ने कहा, और गेंदे में भी, और आज शाम पूरियों में भी जाना है। बिट्टू ने पूछा कि सब ख़त्म होने के बाद तो आ जाओगे? पीले ने कहा कि उसके बाद तो वह थक जाएगा।
नीला सबसे ऊपर था और नीचे आने को तैयार नहीं था। मैं नीचे आऊँ तो ऊपर क्या रहेगा, उसने पूछा। बिट्टू ने सोचकर देखा। ऊपर कुछ नहीं रहेगा, यह बात सही थी। उसने डिबिया बंद कर ली।
हरा सबसे आख़िर में मिला और सबसे कम बोला, क्योंकि वह एक जगह टिका ही नहीं। बिट्टू ने पूछा तो उसने चलते-चलते कहा कि इस महीने बहुत काम है, नई पत्तियाँ आ रही हैं और हर पत्ती को अलग से हरा करना पड़ता है। बिट्टू ने पूछा कि कितनी पत्तियाँ हैं। हरे ने कहा कि गिनना शुरू करोगे तो शाम हो जाएगी।
वह एक जगह बैठ गया और थोड़ी देर चुप रहा। चार बार पूछ चुका था और चारों बार जवाब अलग था, पर मतलब एक ही निकला। किसी के पास फ़ालतू रंग नहीं था। सबका रंग किसी न किसी चीज़ में लगा हुआ था।
तभी उसे एक बात दिखी। लाल टेसू में जा रहा था। पीला हल्दी में और गेंदे में। हरा पत्तियों में। नीला ऊपर था, पर नील की एक डिबिया माँ के पास भी रहती है, कपड़े धोने वाली। मतलब रंग कहीं से आते नहीं थे। रंग किसी चीज़ के अंदर से निकलते थे।
सफ़ेद सबसे शांत था और उसने बिट्टू से पहले ही बात कर ली। उसने पूछा कि तुम्हारी डिबिया में कितने ख़ाने हैं। बिट्टू ने कहा, बारह। सफ़ेद ने कहा कि उसकी डिबिया में एक ही ख़ाना है और उसमें सब कुछ आपस में मिला हुआ है। बिट्टू को यह बात समझ नहीं आई, पर उसने सिर हिला दिया, क्योंकि ऐसी बातों में वह सिर हिला दिया करता था।
'एक रंग तो यहाँ है ही नहीं,' बिट्टू ने कहा। 'काला।' कुछ देर तक कोई नहीं बोला। फिर सफ़ेद रंग ने कहा, 'वह है। सबसे नीचे, सबसे पीछे। हम सब उसी पर बने हुए हैं।' बिट्टू ने नीचे देखा और उसे समझ आया कि जिस ज़मीन पर वह खड़ा है, वह काली है। 'लोग उससे डरते क्यों हैं?' 'क्योंकि वे सिर्फ़ ऊपर देखते हैं,' सफ़ेद ने कहा।
बिट्टू ज़मीन पर बैठ गया और उसने नीचे की तरफ़ पूछा कि क्या तुम भी होली में व्यस्त हो। नीचे से आवाज़ आई कि वह किसी चीज़ में जाता नहीं, वह हर चीज़ के नीचे रहता है। बिट्टू ने पूछा कि फिर तुम मिलते कहाँ हो। आवाज़ ने कहा, जहाँ कुछ जल चुका हो।
बिट्टू ने आँखें खोलीं। वह अपनी उसी दीवार के सामने बैठा था। रंगों की डिबिया गोद में थी। चार ख़ाली ख़ाने अब भी ख़ाली थे। उसने डिबिया बंद की। फिर वह आँगन में चला गया। शाम की रोशनी दीवार पर तिरछी पड़ रही थी। दीवार का गाँव आधा बना हुआ था।
चूल्हा उस वक़्त ठंडा पड़ चुका था। बिट्टू ने उसमें से एक अधजला कोयला उठाया, उसे उँगलियों में घुमाकर देखा, और दीवार के पास जाकर बैठ गया। आधे बने गाँव में उसने पहले एक छत बनाई, फिर उस छत के नीचे एक दरवाज़ा, और दरवाज़े के आगे एक लंबी परछाईं। माँ ने पीछे से आकर देखा। इस बार उसने पोतने की धमकी नहीं दी।