वैन के फ़र्श पर हर शाम कुछ न कुछ गिरा रहता है। टिफ़िन का ढक्कन, पेंसिल, एक जुर्राब। प्रेमवती को यह सब हर सात-आठ दिन में निकालना पड़ता था, क्योंकि उसका बेटा सबसे पीछे बैठता था और पीछे वाली सीट के नीचे सब जमा होता रहता था।
उस शाम जुर्राब पर कुछ चिपका हुआ था।
छोटे-छोटे काँटे, गोल, जो कपड़े से आसानी से नहीं छूटते। उसने एक निकाला और उसे देखा।
यह गोखरू नहीं था। यह वह वाला था जो सिर्फ़ ऊँची, सूखी ज़मीन पर होता है, और गाँव से स्कूल के बीच वह ज़मीन कहीं नहीं आती। पूरा रास्ता खेतों के बीच से जाता है और वहाँ की ज़मीन गीली है।
प्रेमवती खेत में काम करती है। यह जानना उसके लिए कोई विद्या नहीं थी।
खेत में काम करने वाले को यह मालूम होता है कि कौन सी चीज़ कहाँ उगती है, क्योंकि उसमें से आधी चीज़ें उसे निकालनी पड़ती हैं। यह वाला काँटा उसके अपने खेत में नहीं होता। वह ऊपर वाली परती पर होता है, जहाँ वह साल में दो बार जलावन के लिए जाती है।
स्कूल क़स्बे में है और वैन बारह बच्चों को ले जाती है। किराया दो सौ महीने का। सुबह साढ़े सात, शाम को चार।
पक्की सड़क उस बरस टूटी हुई थी। नाले वाले पुल की मरम्मत चल रही थी और गाड़ियों को घूमकर जाना पड़ता था। घूमकर जाने में बीस मिनट ज़्यादा लगते हैं।
यह बात सबको मालूम थी और इसमें कोई छिपाव नहीं था। मरम्मत ठेके पर चल रही थी और उसमें देर हो रही थी, जैसे ऐसे कामों में होती है। लोग घूमकर जा रहे थे और इसकी शिकायत भी कर रहे थे।
बीस मिनट ज़्यादा का मतलब चेतराम के लिए यह था कि वह दूसरा फेरा नहीं कर पाता।
दूसरा फेरा क़स्बे के दो और घरों का था और उसी से उसका महीना बनता था।
यह भी छिपा हुआ नहीं था। चेतराम की वैन पुरानी है और उसकी क़िस्त चल रही है। गाँव में यह सब सबको पता रहता है, और कोई इस पर बुरा भी नहीं मानता, क्योंकि आदमी कमाने के लिए ही चलाता है।
खंडहर वाला रास्ता उस मरम्मत से बचकर निकलता है। वह कच्चा है और वह इसलिए ख़ाली रहता है कि उसकी पुलिया के एक तरफ़ जँगला नहीं है। जँगला बरसों पहले टूटा था और उसके बाद बना नहीं।
नीचे नाला है और बरसात के बाद उसमें पानी रहता है, ज़्यादा नहीं, पर पत्थर बहुत हैं। पुलिया की चौड़ाई एक गाड़ी भर की है। दो गाड़ियाँ आमने-सामने आ जाएँ तो एक को पीछे लेना पड़ता है, और पीछे लेते वक़्त जँगले वाली तरफ़ जाना पड़ता है, क्योंकि दूसरी तरफ़ ढाल है।
रास्ते का नाम खंडहर से है, जो पुलिया से थोड़ा पहले पड़ता है। खंडहर में कुछ नहीं है। एक टूटी दीवार। उसके पीछे झाड़।
प्रेमवती ने अगले दिन बेटे से नहीं पूछा।
उसने चार दिन जुर्राब देखी। चारों दिन काँटे थे।
इन चार दिनों में उसने एक और चीज़ देखी। बेटा शाम को उतरते ही पानी माँगता था, जो पहले नहीं माँगता था। पूछने पर उसने कहा कि वैन में डर लगता है तो गला सूख जाता है। फिर उसने पलटकर कहा कि डर नहीं लगता, ऐसे ही कहा था।
पाँचवें दिन उसने पूछा, और उसने ऐसे पूछा जैसे बात कुछ और हो। उसने पूछा कि रास्ते में वह पुराना खंडहर पड़ता है क्या। बेटा बोला, हाँ। रोज़।
उसने यह भी बताया कि पुलिया पर वैन धीमी हो जाती है और सब बच्चे उस वक़्त चुप हो जाते हैं, बिना किसी के कहे।
बच्चों को यह मालूम था। घर पर किसी को नहीं।
यह बात सबसे भारी थी। बारह बच्चे रोज़ उस पुलिया से गुज़र रहे थे और बारहों को मालूम था कि वहाँ चुप हो जाना है। किसी ने घर पर नहीं बताया, और इसकी वजह भी साफ़ है। बच्चा वही बताता है जो उसे अजीब लगे। रोज़ होने वाली चीज़ अजीब नहीं रहती।
अब प्रेमवती के सामने वह चीज़ थी जो साफ़ दिखती है और जिसका कुछ करना मुश्किल है।
वह शिकायत कर सकती थी। शिकायत का नतीजा भी उसे मालूम था। वैन एक ही है और चेतराम एक ही है। स्कूल क़स्बे में है और उस तक जाने का कोई और तरीक़ा नहीं है, सिवाय इसके कि बच्चा जाए ही नहीं।
बारह बच्चों में से आठ लड़कियाँ थीं। जिस घर में बात उठती है, वहाँ सबसे पहले लड़की का जाना बंद होता है। यह प्रेमवती ने अपने ही मोहल्ले में दो बार देखा था।
वह बाक़ी माँओं के पास भी नहीं गई, और इसकी वजह डर नहीं थी। बताने का मतलब था कि यह बात ग्यारह घरों में पहुँचेगी और उनमें से कुछ घर बच्चा हटा लेंगे।
उसने जो किया वह बहुत छोटा था।
अगली सुबह वह वैन तक गई, जो वह पहले नहीं जाती थी। उसने चेतराम से एक ही बात कही। उसने कहा कि खंडहर वाली पुलिया पर जँगला नहीं है।
इतना ही कहा। न शिकायत। न सवाल।
चेतराम ने कुछ नहीं बोला। उसने बच्चों को बिठाया और गाड़ी चला दी।
उस दिन के बाद जुर्राब पर काँटे नहीं आए।
पुल की मरम्मत उसके ग्यारह महीने बाद ख़त्म हुई। यानी चेतराम ने घूमकर जाना क़बूल किया, और दूसरा फेरा उन ग्यारह महीनों में उससे छूटा या नहीं, यह प्रेमवती को कभी पता नहीं चला।
उसने पूछा भी नहीं। पूछने से क्या मिलता।
पहला काँटा उसने रखा हुआ है। घर में बटनों वाली एक डिबिया है और वह उसी में पड़ा है। सूखकर वह अब हल्का हो गया है, पर चुभता अब भी है।