रात के ग्यारह बजे फ़ोन ने कहा कि आगे रास्ता बंद है और बाईं तरफ़ मुड़ जाइए, इससे अठारह मिनट बचेंगे। मंगरू ने बिना सोचे मोड़ ले लिया, क्योंकि अठारह मिनट बचाने के लिए वह पहले भी कई बार मुड़ चुका था और हर बार बच गए थे। बारिश हल्की थी। वाइपर सबसे धीमी रफ़्तार पर था।

नई सड़क अच्छी थी। इतनी अच्छी कि उसे ताज्जुब हुआ, क्योंकि इस तरफ़ की सड़कें ऐसी नहीं होतीं। तारकोल काला था, किनारे साफ़ थे, और बीच की सफ़ेद पट्टी नई लग रही थी। पंद्रह किलोमीटर तक उसे यह अच्छा लगता रहा।

सोलहवें किलोमीटर पर उसे वह बात खटकी जो शुरू से सामने थी। सड़क पर एक भी गाड़ी नहीं थी। सामने से नहीं आई। पीछे से नहीं आई। कोई ट्रक नहीं। कोई बाइक नहीं। रात के ग्यारह बजे ख़ाली सड़क अजीब बात नहीं है, पर अठारह मिनट बचाने वाला रास्ता ख़ाली नहीं रहता।

उसने रफ़्तार कम की और किनारे देखे। किनारे पर मिट्टी थी और मिट्टी गीली थी, पर उस पर पहियों के निशान नहीं थे। जहाँ गाड़ियाँ रुकती हैं, कटती हैं, उतरती हैं, वहाँ किनारा टूटा हुआ होता है। यहाँ किनारा वैसा ही था जैसा बनाते वक़्त छोड़ा गया होगा।

फिर एक और चीज़ दिखी। सड़क के किनारे पत्थर लगे थे और उन पर आगे के गाँव का नाम और दूरी लिखी होती है। इस सड़क पर तीन पत्थर उसने ऐसे देखे जिन पर सफ़ेदी पुती हुई थी और नीचे का लिखा दिख नहीं रहा था। किसी ने उन्हें मिटाया नहीं था। ढका था।

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उसने गाड़ी रोक दी और फ़ोन देखा। नक्शे पर सड़क वहीं थी, नीली लकीर की तरह, आगे बढ़ती हुई, और उस पर लिखा था कि आगे कोई रुकावट नहीं है। सिग्नल एक डंडी का था। उसने पीछे लौटने के बारे में सोचा और फिर यह सोचा कि सोलह किलोमीटर वापस जाने का मतलब है आधा घंटा, और शायद वह बेवजह डर रहा है।

उसने गाड़ी आगे बढ़ा दी, पर धीमी रखी।

उसने खिड़की का शीशा थोड़ा नीचे किया और कान लगाकर सुना। बारिश की आवाज़ थी और कहीं दूर पानी की। इसके अलावा कुछ नहीं। हाइवे पर, चाहे कितनी भी रात हो, दूर से आती हुई गाड़ियों की एक हल्की भनभनाहट हमेशा रहती है। यहाँ वह भी नहीं थी।

इक्कीसवें किलोमीटर पर उसे सड़क के बीच में कुछ पड़ा दिखा। पास जाकर देखा तो वह ज़ंजीर थी। मोटी, लोहे की। बीच से कटी हुई। उसके दोनों सिरे दोनों तरफ़ के खंभों में लगे थे। यानी यह सड़क बंद की गई थी, और किसी ने बाद में ज़ंजीर काट दी थी।

मंगरू उतरकर उसके पास गया। कटी हुई जगह पर लोहा चमक रहा था। लोहा कटने के बाद कुछ हफ़्तों में काला पड़ जाता है, ख़ासकर बरसात में। यह चमक रहा था।

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अब उसे समझ आया कि सड़क नई क्यों लगती है। इस पर गाड़ियाँ चली ही नहीं थीं। जो सड़क बनकर बंद कर दी गई हो, वह नई ही रहती है।

सवाल सिर्फ़ यह बचा कि उसे बंद क्यों किया गया, और इसका जवाब उसे मालूम नहीं था। नक्शे को भी नहीं मालूम था। नक्शा उस दिन का था जब सड़क बनी थी, और नक्शे को यह किसी ने नहीं बताया कि उसके बाद क्या हुआ।

वह वापस मुड़ने ही वाला था कि पीछे से रोशनी आई।

एक गाड़ी उसी रास्ते पर आ रही थी, अच्छी रफ़्तार से, जैसे कोई अठारह मिनट बचा रहा हो। वह मंगरू के पास से निकली, हॉर्न दिया, और आगे निकल गई। उसमें पीछे की सीट पर बच्चे थे, यह उसने पिछली खिड़की से देख लिया।

मंगरू ने अपनी गाड़ी स्टार्ट की और उसके पीछे लगा दी। उसने हेडलाइट को ऊपर-नीचे किया, फिर हॉर्न दिया, फिर लगातार हॉर्न देता रहा। आगे वाली गाड़ी ने रफ़्तार बढ़ा दी, क्योंकि रात में पीछे से लगातार हॉर्न देती गाड़ी का मतलब सब यही लगाते हैं।

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दोनों गाड़ियाँ चार किलोमीटर तक इसी तरह चलीं। मंगरू का हाथ हॉर्न पर था और उसकी आँखें आगे वाली गाड़ी की बत्तियों पर, और उसे यह भी समझ आ रहा था कि वह जो कर रहा है उससे वे और तेज़ भाग रहे हैं। पर उसके पास इसके अलावा कुछ नहीं था।

फिर आगे वाली गाड़ी की बत्तियाँ अचानक ऊपर उठीं, फिर नीचे गिरीं, और फिर रुक गईं। ब्रेक की लाल बत्ती जली और बहुत देर तक जलती रही।

मंगरू पहुँचा तो वे लोग बाहर खड़े थे। सड़क वहाँ ख़त्म होती थी। पुल का जो हिस्सा नदी के ऊपर था, वह नहीं था। खंभे खड़े थे। उनके बीच कुछ नहीं था। नीचे पानी था, बरसात वाला, भरा हुआ। सड़क बिना किसी चेतावनी के सीधी उस तक जाती थी।

उस गाड़ी के आगे के पहिये सड़क के आख़िरी सिरे से क़रीब आठ फ़ुट पीछे थे। ड्राइवर बोला कुछ नहीं। उसने सिर्फ़ मंगरू का हाथ पकड़ लिया और काफ़ी देर तक पकड़े रहा। बच्चे गाड़ी में ही बैठे रहे और उन्हें बाहर नहीं आने दिया गया।

दोनों गाड़ियाँ इक्कीस किलोमीटर वापस चलीं और उन्होंने ज़ंजीर वाली जगह पर अपनी गाड़ियाँ आड़ी खड़ी कर दीं, ताकि पीछे से कोई आए तो उसे रुकना पड़े। वे दोनों वहाँ सुबह चार बजे तक खड़े रहे। उस पूरी रात में उधर से कोई नहीं आया।

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मंगरू ने अगले दिन उस सड़क की जानकारी नक्शे वाली कंपनी को भेजी, उसी बटन से जो हर किसी के फ़ोन में होता है और जिसे कोई दबाता नहीं। उसने उसमें लिखा कि पुल नहीं है। नक्शे से वह सड़क ग्यारह महीने बाद हटी।