मंगलू का काम घंटी सुनना था।
वह फाटक वाला था। रेल की पटरी सड़क को जहाँ काटती है, वहाँ एक फाटक होता है और उस फाटक पर एक आदमी बैठता है। स्टेशन से गाड़ी चलती है तो वहाँ से घंटी बजाई जाती है, और घंटी की संख्या तय होती है। दो बार का मतलब है कि गाड़ी छूट गई है। एक बार का मतलब है कि निकल गई।
दो बजने पर मंगलू फाटक बंद कर देता है।
यह काम इक्कीस बरस से वह कर रहा था और इक्कीस बरस में एक भी दुर्घटना नहीं हुई थी। इतने बरस में यह अपने आप में कोई बड़ी बात नहीं है, क्योंकि ज़्यादातर फाटकों पर कुछ नहीं होता।
तीन बरस पहले उसे सुनाई कम देने लगा।
यह अचानक नहीं हुआ। पहले उसे लगा कि घंटी की आवाज़ पहले जैसी नहीं रही। उसने केबिन वाले से कहा और उसने घंटी देखी और कहा कि घंटी ठीक है।
फिर उसे यह लगने लगा कि लोग धीरे बोलते हैं।
उसकी उम्र इक्यावन थी और पेंशन चार बरस दूर थी।
रेलवे में सुनने की जाँच होती है और फाटक वाले के लिए वह ज़रूरी है। जाँच में फ़ेल होने पर आदमी को हटाकर कहीं और लगाया जाता है, और कहीं और का मतलब है कि तनख़्वाह वही रहती है और घर से दूरी बढ़ जाती है, या कुछ मामलों में मेडिकल पर छुट्टी दे दी जाती है।
मंगलू ने किसी को नहीं बताया और उसने अपने तरीक़े बना लिए।
पहला तार था। सिगनल का तार फाटक के बग़ल से गुज़रता है और सिगनल गिराने पर वह तार खिंचता है और खंभे के पास वाली गरारी घूमती है। वह गरारी दिखती है। घंटी सुनाई न भी दे, गरारी दिख जाती है।
दूसरा पटरी थी। पटरी पर हथेली रखने से गाड़ी दो-तीन मिनट पहले पता चल जाती है। यह हर फाटक वाला जानता है और कोई करता नहीं, क्योंकि ज़रूरत नहीं पड़ती।
तीसरा कुत्ता था।
वह कुत्ता फाटक पर ही रहता था और उसका नाम किसी ने नहीं रखा था। गाड़ी आने से पहले वह उठकर पटरी से हट जाता, हर बार, बिना नागा। मंगलू ने यह पहले बरस में देख लिया था और उन तीन बरसों में वह उसे सबसे ज़्यादा इसी से पता चलता था।
इन तीनों तरीक़ों में एक ख़राबी थी और मंगलू को वह मालूम थी। तीनों उसके अपने नहीं थे। तार दूसरे विभाग का था, पटरी मौसम की थी, और कुत्ता किसी का नहीं था। जिस चीज़ पर आपका ज़ोर न हो, वह जिस दिन नहीं रहेगी उस दिन आपसे पूछकर नहीं जाएगी।
कुत्ता पिछली सर्दी में मर गया।
उसी सर्दी में एक और चीज़ हुई। सिगनल ख़राब हो गया।
सिगनल ख़राब होने पर गाड़ियाँ रोकी नहीं जातीं। ड्राइवर को काग़ज़ पर लिखकर अधिकार दिया जाता है और वह धीरे चलकर आगे बढ़ता है। यह नियम में है और इसमें कुछ ग़लत नहीं है।
इसका मतलब यह था कि उन दिनों तार नहीं खिंचता था और गरारी नहीं घूमती थी।
चौथे दिन कोहरा पड़ा।
कोहरे में पटरी वाली तरकीब भी कमज़ोर पड़ जाती है, कंपन तो आता है। बात यह है कि कोहरे में गाड़ी धीमी चलती है और धीमी गाड़ी का कंपन देर से आता है और कम आता है।
उस शाम मंगलू के पास तीनों में से कुछ नहीं था।
साढ़े छह बजे उसे लगा कि घंटी बजी है।
लगा, यह शब्द ठीक है। उसने सुना नहीं। उसे लगा।
फाटक के दोनों तरफ़ उस वक़्त गाड़ियाँ खड़ी थीं। दो ट्रैक्टर, एक बस, कई मोटरसाइकिलें, और पैदल लोग, क्योंकि छह बजे मंडी से लौटने का वक़्त होता है।
फाटक बंद करने का मतलब है कि यह सब रुकेगा।
बंद करके अगर कुछ न आए, तो पहली बार लोग गाली देते हैं। दूसरी बार शिकायत होती है। शिकायत जाँच लाती है और जाँच वह चीज़ है जिससे मंगलू तीन बरस से बच रहा था।
उसने फाटक बंद कर दिया।
पहले दो मिनट में लोगों ने हॉर्न बजाए। पाँचवें मिनट में बस वाला उतरकर आया और उसने पूछा कि गाड़ी कहाँ है। मंगलू ने कहा कि आ रही है।
सातवें मिनट में दो मोटरसाइकिल वाले फाटक के नीचे से निकलकर चले गए। मंगलू ने उन्हें रोका नहीं, क्योंकि रोकना उसके बस में नहीं है।
नौवें मिनट में बस वाला दोबारा आया और इस बार उसने कहा कि वह शिकायत करेगा।
ग्यारहवें मिनट में गाड़ी आई।
वह मालगाड़ी थी और कोहरे में वह बहुत देर से दिखी, इतनी देर से कि उसका इंजन दिखने और उसके फाटक तक पहुँचने के बीच में कुछ ही सेकंड बचे।
बस वाला उस वक़्त फाटक के पास ही खड़ा था। उसके मुँह से एक शब्द नहीं निकला। वह अपनी बस की तरफ़ चला गया और उसने बस स्टार्ट कर ली, जबकि फाटक अभी खुला नहीं था।
शिकायत नहीं हुई।
मेडिकल बोर्ड मार्च में हुआ।
मंगलू उसमें पास हो गया।
जाँच एक कमरे में होती है। कमरा बंद रहता है और उसमें कोई और नहीं होता। डॉक्टर एक तरफ़ से आवाज़ करता है और आदमी बताता है कि उसने सुना या नहीं।
उस कमरे में मंगलू ने सब सुन लिया।
जिस चीज़ की जाँच नहीं होती, वह यह है कि आदमी शोर के बीच सुन पाता है या नहीं। कोहरे में, हॉर्न के बीच, बस के इंजन के साथ। उसकी जाँच का कोई तरीक़ा उस काग़ज़ में नहीं है।
प्रमाणपत्र उसके केबिन की दीवार पर लगा है। उसमें तारीख़ है और नीचे दस्तख़त हैं। उस कमरे में उस दिन पंखा बंद था।