नीरा की हंसी दो गलियों दूर तक सुनाई देती थी। यह कोई मुहावरा नहीं था। लोग सचमुच कहते थे कि पता चल जाता है, आज नीरा घर पर है या नहीं। उसकी हंसी में एक अजीब सी बात थी। सुनने वाले को हँसी आ जाती, चाहे उसे वजह पता न हो। गाँव के बूढ़े इसे जादू कहते थे। नीरा को लगता था कि यह बस उसकी आवाज़ है।

गाँव सोन नदी के किनारे था और नदी वहाँ चौड़ी और उथली थी। गर्मियों में उसमें रेत के लंबे टीले निकल आते थे। नीरा दस साल की थी। सुबह वह बकरियाँ लेकर उधर जाती थी, दोपहर में स्कूल, और शाम को फिर नदी। दिन में चार-पाँच बार उसे ऐसा कुछ दिख ही जाता था जिस पर हँसा जा सके।

जिस दिन कृष्ण आया, बस दोपहर की थी। वह उतरा, कंधे पर एक झोला था, और उसके मामा उसे लेने आए हुए थे। मामा ने रास्ते भर बातें कीं। कृष्ण ने तीन बार सिर हिलाया और एक बार 'हाँ' कहा। नीरा नीम के नीचे खड़ी यह सब देख रही थी।

कृष्ण अपने मामा के घर आया था। क्यों आया था, यह किसी को ठीक से पता नहीं था, और किसी ने पूछा भी नहीं। वह सुबह निकल जाता और दिन भर नदी के किनारे बैठा रहता। शाम को लौट आता। खाना खा लेता। सो जाता। बच्चों ने दो-तीन बार उसे खेल में बुलाया। तीनों बार उसने मना कर दिया।

नीरा के लिए यह नई बात थी। आज तक जो भी उसकी हँसी की ज़द में आया, हँस दिया। बकरी वाले बाबा हँसे थे, जो किसी बात पर नहीं हँसते। स्कूल के मास्टर हँसे थे, बीच पाठ के। और यह लड़का किनारे बैठा रहता था, जैसे उसे सुनाई ही न देता हो। नीरा को यह वैसे ही खटका जैसे अटकी हुई कुंडी खटकती है।

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पहले दिन उसने सीधा तरीक़ा आज़माया। वह उसके पास गई और पूछा कि खेलोगे। कृष्ण ने कहा कि नहीं। नीरा ने पूछा कि क्यों। कृष्ण ने कहा कि बस। वह लौट आई।

दूसरे दिन उसने अपना सबसे अच्छा वाला काम किया। जलेबी वाले की नक़ल, जो जलेबी छानते हुए गाना गाता है और बीच-बीच में मक्खी उड़ाता है। बाक़ी बच्चे रेत पर लोट गए। एक को हिचकी लग गई। कृष्ण ने देखा, फिर नदी की तरफ़ देखने लगा। नीरा को लगा कि शायद ठीक से नहीं हुआ, तो उसने दोबारा किया। दूसरी बार कोई नहीं हँसा। ख़ुद उसे भी नहीं आई।

तीसरे दिन वह सब बच्चों को साथ ले गई। सब उसके पास वाले घाट पर बैठ गए और ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे, बिना किसी बात के, यह सोचकर कि हँसी छूत की तरह लगती है। कृष्ण उठा और नीचे वाले घाट पर चला गया, जहाँ कोई नहीं था। लौटते हुए सब चुप थे और नीरा सबसे पीछे चल रही थी।

उस दिन नीरा ने कोई कोशिश नहीं की। वह जाकर उसके पास बैठ गई। थोड़ी देर बाद एक बकरी का बच्चा नदी में उतर गया और फिसलकर बैठ गया, और उसका मुँह पानी से भरा रह गया। नीरा हँस पड़ी। ज़ोर से। बहुत देर तक। कृष्ण ने पहले उसे देखा, फिर बकरी को, और फिर पहली बार उसके चेहरे पर कुछ हिला।

उस दिन भी वह खेलने नहीं आया। पर अगले दिन वह ऊपर वाले घाट पर बैठा मिला, उसी जगह जहाँ बकरियाँ पानी पीने आती हैं। नीरा वहीं थी। दोपहर में एक बकरी ने उसकी टोकरी में मुँह डाला और रोटी लेकर भाग गई। कृष्ण ने पूछा, 'यह रोज़ करती है क्या?' यह उसका पहला सवाल था।

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कार्तिक पूर्णिमा पर नदी के उस पार मेला लगता है और गाँव के सब लोग जाते हैं। नावें दिन भर चलती रहती हैं। झूला, चाट, काँच की चूड़ियाँ, और शाम को पानी में दीये। कृष्ण अपने मामा के साथ गया और भीड़ में उनसे बिछड़ गया, जैसा वहाँ हर साल किसी न किसी के साथ होता है।

मेले में इतनी भीड़ थी कि कोई किसी को देख नहीं रहा था। कृष्ण किनारे खड़ा रहा। उसे यहाँ किसी का पता नहीं था। थोड़ी देर बाद उसने घर लौटने का सोचा। तभी पीछे से वही हंसी सुनाई दी, भीड़ के शोर के ऊपर से, दो गलियों दूर तक जाने वाली हंसी। कृष्ण ने पीछे मुड़कर देखा और उसे ढूँढ़ने में एक पल भी नहीं लगा।

उसके बाद दोनों साथ ही रहे। नीरा उसे झूले तक ले गई, फिर उस आदमी के पास जो कान के पास हाथ ले जाकर उसमें से इलायची निकाल देता है। कृष्ण को मालूम था कि इलायची पहले से हाथ में होती है। फिर भी जब वह उसके अपने कान से निकली तो वह हँस पड़ा, इतनी ज़ोर से कि पास खड़ी दो औरतें मुड़कर देखने लगीं। कृष्ण ख़ुद भी चौंक गया।

वह एक बरसात के लिए आया था और चार साल रह गया। दाख़िला यहीं के स्कूल में हो गया और वह नीरा से दो कक्षा आगे बैठता था। इन चार सालों में वह वैसा नहीं रहा जैसा बस से उतरा था। एक बात फिर भी नहीं बदली। उसकी हँसी अब भी धीमी थी, और नीरा की अब भी दो गलियों दूर तक जाती थी।

कई साल बाद कृष्ण अपने गाँव लौट गया। जाने से पहले उसने नीरा से कहा कि उसने उसे कभी धन्यवाद नहीं कहा। नीरा ने पूछा किस बात का। कृष्ण ने कहा कि यह वह बता नहीं सकता, पर कुछ तो है। नीरा हँस पड़ी। कृष्ण भी हँस दिया, और उस दिन उसकी हंसी भी गली के उस सिरे तक सुनाई दी।