गाँव के बाहर वाला बरगद इतना पुराना था कि उसकी उम्र किसी को ठीक-ठीक नहीं पता थी। सबसे बुज़ुर्ग आदमी भी यही कहता था कि जब वह बच्चा था तब भी पेड़ इतना ही बड़ा था। उसकी जड़ें ज़मीन के ऊपर तक निकली हुई थीं और बच्चे उन्हीं पर बैठकर खेलते थे। एक बात और थी, जो सिर्फ़ गाँव के बच्चे जानते थे। वह पेड़ गाता था।

राहुल को यह बात किसी ने नहीं बताई। वह उस साल गाँव में आया था, शहर से, अपने पिता की बदली के बाद। नया स्कूल, नए बच्चे, और एक ऐसी बोली जिसमें वह अटकता था। पहला महीना उसने ज़्यादातर अकेले काटा। दोपहर में वह बरगद के नीचे जाकर बैठ जाता, क्योंकि वहाँ छाया थी और कोई कुछ पूछता नहीं था।

एक दोपहर वह वहीं बैठा था कि उसे कुछ सुनाई दिया। पहले उसे लगा कि हवा है। फिर लगा कि नहीं, कुछ और है। एक धीमी, लंबी आवाज़, जो तने के भीतर से आ रही थी और रुक-रुककर बदल रही थी। राहुल ने कान तने से सटा दिए। आवाज़ और साफ़ हो गई।

एक नन्हा सा विचार

अगले दिन उसने स्कूल में एक लड़के से पूछा, 'बरगद से आवाज़ आती है क्या?' लड़का हँसा और बाकी बच्चों को बुला लिया। राहुल को लगा कि अब उसका मज़ाक बनेगा। पर बच्चों ने मज़ाक नहीं उड़ाया। एक लड़की ने आगे आकर पूछा, 'तुमने सुन ली?' राहुल ने सिर हिलाया। 'तो तुम अब यहीं के हो,' उसने कहा।

उसके बाद सब बदल गया। बच्चे उसे अपने साथ बरगद के नीचे ले जाने लगे। उन्होंने उसे बताया कि आवाज़ कहाँ से सबसे साफ़ सुनाई देती है, तने के किस हिस्से पर कान लगाना चाहिए, और दोपहर में वह सबसे अच्छी क्यों सुनाई देती है। राहुल ने पूछा कि यह आती कहाँ से है। किसी को नहीं पता था। सब बस इतना जानते थे कि वह आती है।

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उस हफ़्ते राहुल पहली बार देर से घर लौटा। माँ ने पूछा कि कहाँ था। उसने कहा, 'दोस्तों के साथ।' यह पहली बार था जब उसने इस गाँव में यह शब्द इस्तेमाल किया था।

बरसों से वहाँ यही होता आया था। हर नया बच्चा पहले सुनता था, फिर पूछता था, और फिर उसे गाँव का मान लिया जाता था। बड़े लोग इस बात पर हँसते थे। पर उनमें से भी हर एक ने बचपन में वही आवाज़ सुनी थी।

सर्दियों में एक दिन गाँव में एक ठेकेदार आया। बरगद की एक बड़ी डाल सड़क पर झुक आई थी और उसे काटा जाना था। बात यहीं तक रहती तो ठीक था। पर ठेकेदार ने कहा कि पेड़ अंदर से खोखला है, और पूरा गिरा देना ही ठीक होगा।

खुशी का पल

बच्चों को शाम को पता चला। उस रात राहुल सोया नहीं। सुबह वह सबसे पहले बरगद के नीचे पहुँचा, और थोड़ी देर में बाकी बच्चे भी आ गए। किसी ने कुछ तय नहीं किया था, पर सब वहीं जड़ों पर बैठ गए। दस बजे ठेकेदार अपने आदमियों के साथ आया और बच्चों को वहाँ बैठा देखकर रुक गया।

गाँव के सबसे बुज़ुर्ग आदमी को बुलाया गया। उन्होंने बच्चों को देखा, फिर पेड़ को, फिर ठेकेदार को। 'डाल काट दो,' उन्होंने कहा। 'पेड़ रहेगा।' ठेकेदार ने कहा कि खोखला पेड़ ख़तरनाक होता है। बुज़ुर्ग ने कहा, 'यह साठ साल से खोखला है। मैं तब भी इसी के नीचे बैठता था।'

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आदमी दोपहर तक काम करते रहे। बच्चे वहीं बैठे रहे, हिले नहीं, जब तक आरी बंद नहीं हो गई। कटी हुई डाल को गाँव वालों ने उठाकर स्कूल के पीछे रख दिया, और बाद में उसकी लकड़ी से बच्चों के लिए दो बेंच बनवा दी गईं।

उस शाम बच्चे फिर वहीं इकट्ठा हुए। राहुल ने तने से कान सटाया और सबकी तरफ़ देखकर सिर हिला दिया। आवाज़ अब भी आ रही थी।

बड़े होकर राहुल ने जाना कि वह आवाज़ जादू नहीं थी। तने के भीतर की खोखली जगह में हवा घुसती थी और घूमकर निकलती थी, और उसी से वह लंबी धीमी आवाज़ बनती थी। यह बात उसने किसी बच्चे को कभी नहीं बताई। उसे लगा कि बताने से किसी को कुछ मिलेगा नहीं, और शायद कुछ चला ज़रूर जाएगा।

अब भी हर साल गाँव में कोई नया बच्चा आता है। वह दोपहर में अकेला बरगद के नीचे जाकर बैठता है, कुछ सुनता है, और अगले दिन किसी से पूछता है। और कोई न कोई उससे कहता है कि तुम अब यहीं के हो। स्कूल के पीछे वाली दोनों बेंचें अब भी वहीं रखी हैं। बच्चे उन पर बैठकर खाना खाते हैं, और उनमें से किसी को पता नहीं कि वे किस डाल से बनी थीं। राहुल कभी-कभी गाँव आता है तो स्कूल के पीछे जाकर उन बेंचों पर हाथ फेर लेता है।