नीलू आठ साल का था और उसका मन एक जगह टिकता ही नहीं था। सुबह कुछ और करने का इरादा होता, दोपहर तक कुछ और। पहाड़ों से घिरा वह गाँव उसे छोटा लगता था। छत पर खड़े होकर वह उस तरफ़ देखता जहाँ पहाड़ ख़त्म होते थे, और सोचता कि उसके आगे क्या होगा। किसी ने उसे बताया नहीं था, क्योंकि गाँव में ज़्यादातर लोग उसके आगे कभी गए ही नहीं थे। जो एक-दो गए थे, वे लौटकर बताते नहीं थे, या शायद बताने लायक़ कुछ था ही नहीं। नीलू को दोनों बातों पर यक़ीन नहीं होता था। उसे लगता था कि आगे ज़रूर कुछ है, और लोग या तो देख नहीं पाए, या देखकर भूल गए। यह सोचकर उसका मन और उड़ने लगता।

गाँव से बस हफ़्ते में दो बार जाती थी, मंगल और शुक्र, और दर्रे के उस पार उतरती थी। नीलू ने वह बस सैकड़ों बार जाते हुए देखी थी। उसमें बैठने का सवाल नहीं था, किराया था, और वजह भी चाहिए थी। पर बस का ड्राइवर हर बार लौटकर आता था, और नीलू को यह बात अजीब लगती थी कि एक आदमी उस पार जाकर वापस आ जाता है और किसी को कुछ बताता नहीं।

एक मंगल को नीलू अड्डे पर खड़ा हो गया और ड्राइवर से पूछ लिया, "चाचा, उस तरफ़ क्या है?" ड्राइवर ने उसे देखा भी नहीं। "कुछ नहीं," उसने कहा, और गियर डाल दिया। शुक्र को नीलू फिर खड़ा था। उसने वही सवाल पूछा। ड्राइवर ने वही जवाब दिया। यह सिलसिला पाँच हफ़्ते चला।

एक छोटी सी जीत

छठे हफ़्ते ड्राइवर ने बस रोकी, नीचे उतरा, और नीलू के हाथ में एक चीज़ रख दी। वह एक पत्ता था, चौड़ा और चिकना, जो नीलू ने पहले कभी नहीं देखा था। "यह वहाँ का है," ड्राइवर ने कहा। "अब मत पूछना।" नीलू ने वह पत्ता घर लाकर एक ख़ाली टिन के डिब्बे में रख दिया।

नीलू ने एक बार पूछ ही लिया कि वह बताता क्यों नहीं। ड्राइवर काफ़ी देर चुप रहा, फिर बोला कि बताने से चीज़ छोटी हो जाती है। नीलू को यह समझ नहीं आया और उसने कह भी दिया कि समझ नहीं आया। ड्राइवर हँस पड़ा। उस दिन उसने कुछ नहीं दिया, पर जाते-जाते इतना कहा कि डिब्बा सँभालकर रखना, वह ख़ुद ही एक दिन जवाब दे देगा।

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अगली बार डिब्बे में एक बस का टिकट आया, जिस पर किसी और जगह का नाम छपा था। फिर एक पत्थर, जो चमकीला था और यहाँ के पत्थरों जैसा नहीं था। फिर एक मुड़ा हुआ काग़ज़, जिस पर किसी दुकान का नाम लिखा था। ड्राइवर हर बार यही कहता कि अब मत पूछना, और नीलू हर बार पूछता, और हर बार डिब्बे में कुछ और आ जाता। सर्दियों तक डिब्बा आधा भर चुका था।

नीलू ने उस डिब्बे से एक तस्वीर बना ली थी, अपने मन में। उस तरफ़ बड़े पत्तों वाले पेड़ थे, चमकीले पत्थर थे, और दुकानें थीं जिनके नाम लंबे थे। वह छत पर खड़े होकर उस तस्वीर में और चीज़ें जोड़ता रहता। किसी को उसने यह तस्वीर नहीं दिखाई, क्योंकि दिखाने पर वह सवाल पूछते और नीलू के पास जवाब नहीं थे।

फ़रवरी की एक सुबह ड्राइवर ने बस रोककर दरवाज़ा खोला और सिर से इशारा किया। नीलू ने अपने घर की तरफ़ देखा। फिर वह चढ़ गया। बस दर्रे तक चढ़ती रही, मोड़ पर मोड़, और नीलू खिड़की से बाहर देखता रहा। सबसे ऊँचे मोड़ पर उसे लगा कि अब सामने वह सब दिखेगा जो उसने सोच रखा था।

सपनों की उड़ान

बस में उस दिन कुल छह लोग थे और सब चुप थे। नीलू सबसे आगे वाली सीट पर बैठा था, खिड़की से चिपका हुआ। हर मोड़ पर नीचे गाँव थोड़ा और छोटा होता गया। एक जगह उसे अपने घर की छत दिखाई दी और उस पर सूखते हुए कपड़े भी दिखे। अगले मोड़ पर वह भी नहीं दिखा।

उस पार एक और घाटी थी। उसमें खेत थे, एक नदी थी, कुछ घर थे जिनकी छतें पत्थर की थीं, और उनके पीछे फिर पहाड़ थे। बड़े पत्तों वाले पेड़ सिर्फ़ नीचे उतरकर, नहर के किनारे मिले, और वे कुल जमा चार थे। दुकानें दो थीं। नीलू काफ़ी देर चुपचाप खड़ा रहा। फिर उसने वह सब देखना शुरू किया जो वहाँ सचमुच था।

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लौटते वक़्त, जब बस पहला मोड़ चढ़ रही थी, नीलू ने खिड़की से पीछे देखा। नीचे उस घाटी के एक घर की छत पर एक लड़का खड़ा था और इसी तरफ़ देख रहा था, उधर, जहाँ पहाड़ ख़त्म होते थे। नीलू ने हाथ हिलाया। लड़के ने भी हिलाया। दोनों में से किसी को नहीं पता था कि दूसरे ने क्या सोचकर हिलाया है। नीलू घर पहुँचा तो अँधेरा हो चुका था और उसकी जेब में उस घाटी की मिट्टी थी, जो उसने डिब्बे में डालनी थी।