शेड बन जाने के बाद आदमी के पास कोई चारा नहीं बचता। यह बात हुकुमचंद को छह लाख ख़र्च करने के बाद समझ आई। दो सौ फुट लंबा टीन का शेड। जालीदार दीवारें, पंखे, और पीने की लाइन। उसके अलावा वह ज़मीन किसी काम की नहीं थी, और शेड किसी और काम का नहीं था। कंपनी चूज़े देती थी, दाना देती थी, दवा देती थी, और अड़तीस दिन बाद आकर मुर्गियाँ ले जाती थी। हुकुमचंद के पास शेड था, पानी था, बिजली थी और उसकी अपनी मेहनत थी।

उसे मिलता क्या था, यह एक फ़ॉर्मूले से तय होता था। कितना दाना खाकर कितना वज़न बना, और कितने पक्षी मरे। दोनों चीज़ें उसके हाथ में थीं, इसलिए फ़ॉर्मूला ऊपर से ठीक लगता था। पहले तीन चक्र अच्छे गए। चौथे से हिसाब हर बार थोड़ा-सा कम बैठने लगा। कभी दो हज़ार कम, कभी साढ़े तीन। इतना कम कि झगड़ा करने लायक़ न लगे।

सुपरवाइज़र राजबीर था। वह अड़तीस दिन में दो बार आता था, चूज़े उतरवाने और मरे हुए पक्षी गिनने। पहले हफ़्ते की मौत कंपनी के खाते में जाती है और उसके बाद की किसान के। राजबीर पहली बार नौवें दिन आता था, हर बार नौवें दिन। हुकुमचंद ने यह बात पहले साल नहीं पकड़ी, दूसरे साल पकड़ी, और तब भी उसने अपने आप से यही कहा कि आदमी व्यस्त होगा।

असली चीज़ लदान थी। वह रात में होती थी। अड़तीसवें दिन रात को कंपनी का ट्रक आता था और मुर्गियाँ प्लास्टिक के कैरेट में भरकर ले जाई जाती थीं। ट्रक हमेशा रात एक और तीन के बीच आता था। कहा जाता था कि गर्मी में पक्षी रास्ते में मरते हैं, इसलिए रात में ले जाना ज़रूरी है, और यह बात पूरी तरह सच थी। साथ में एक और बात भी सच थी। रात दो बजे टॉर्च की रोशनी में यह गिनना कि कितने कैरेट गए और हर कैरेट में कितने पक्षी थे, किसी के बस का नहीं है।

सातवें चक्र में हुकुमचंद ने वह देखा जो उसे पहले कभी नहीं दिखा था। ट्रक उस रात भरा हुआ आया। कैरेट पहले से चढ़े हुए थे, ऊपर तिरपाल पड़ी थी, और ड्राइवर ने कहा कि पहले एक और शेड से माल उठाया है। यह सामान्य बात है। पर लौटते वक़्त वह ट्रक उसी सड़क पर वापस गया जिससे आया था, और उस तरफ़ छह किलोमीटर में सिर्फ़ एक ही फ़ार्म है।

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वह फ़ार्म धीरपाल का था। छह शेड और बड़ा काम, और धीरपाल की बहन राजबीर के घर ब्याही थी। यह बात हुकुमचंद को किसी ने बताई नहीं। वह उस इलाक़े में सबको मालूम थी और किसी के लिए ख़बर नहीं थी।

तब उसे पूरी बात दिखने लगी और वह इतनी सीधी थी कि उस पर हँसी आती। कंपनी को कुल हिसाब से मतलब है। ज़िले भर का दाना और ज़िले भर का वज़न मिल जाए तो ऊपर कुछ ग़लत नहीं दिखता। भीतर किसका वज़न किसके खाते में चढ़ा, यह सिर्फ़ वही आदमी तय करता है जो रात दो बजे टॉर्च लिए खड़ा होता है। हुकुमचंद के पक्षी किसी और के हिसाब में जाकर उसका फ़ॉर्मूला ठीक कर रहे थे। चोरी कंपनी नहीं कर रही थी। वह बग़ल वाले शेड के लिए हो रही थी।

उसके पास कहने को कुछ नहीं था। कंपनी उसके लिए राजबीर ही थी। ज़िले का दफ़्तर एक फ़ोन नंबर था जिस पर बात करने वाला हर बार बदल जाता था। और नियम यह था कि लगातार तीन चक्र फ़ॉर्मूले से नीचे रहने पर किसान को अगला बैच नहीं दिया जाता। हुकुमचंद के दो चक्र नीचे जा चुके थे। तीसरा चल रहा था।

आठवें चक्र के अड़तीसवें दिन उसने वह एक काम किया जो उसके बस में था। उसने राजबीर से कहा कि इस बार लदान दिन में होगा। सुबह छह बजे। उजाले में। वजह उसने कोई नहीं दी और देनी भी नहीं थी, क्योंकि शेड उसका था और दरवाज़ा उसका था।

राजबीर ने पहले हँसकर टाला। फिर उसने कहा कि दिन में पक्षी मरेंगे और नुक़सान हुकुमचंद का होगा। फिर उसने कहा कि ट्रक का रूट ऊपर से बनता है। फिर उसने कहा कि कुछ लोग अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं। तीन दिन इसी में गए और इन तीन दिनों में पक्षी दाना खाते रहे, जो सीधे हुकुमचंद के फ़ॉर्मूले में जुड़ रहा था। यह भी उसे मालूम था और उसने दरवाज़ा नहीं खोला।

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चौथे दिन सुबह ट्रक आया, ख़ाली आया, और लदान उजाले में हुआ। हुकुमचंद गेट पर खड़ा रहा और उसने कैरेट गिने। तीन सौ चौबीस कैरेट। हर कैरेट में आठ पक्षी। किसी ने कुछ छिपाने की कोशिश नहीं की, क्योंकि उजाले में छिपाया नहीं जाता। उस चक्र का हिसाब पंद्रह दिन बाद आया। वह पूरा था। एक रुपया कम नहीं।

उसके बाद उसे अगला बैच नहीं मिला। कोई कारण नहीं बताया गया, क्योंकि बैच न देने का कोई कारण बताना नहीं पड़ता। सर्दियों में एक बार, फिर वसंत में एक बार, वह ज़िले के दफ़्तर तक गया। दोनों बार उससे कहा गया कि माँग कम है और लिस्ट लंबी है। दोनों बातें सच थीं, और इसीलिए उनका कोई जवाब नहीं था। शेड दस महीने ख़ाली पड़ा रहा और क़र्ज़ की किस्त दस महीने जाती रही, और उन दस महीनों में उसने भैंस बेची और आधा खेत गिरवी रखा।

अब उस शेड के एक तिहाई हिस्से में उसकी अपनी तीन सौ देसी मुर्गियाँ रहती हैं और बाक़ी दो तिहाई में एक आढ़ती ने बोरे रखवाए हैं, चार हज़ार महीने पर। तीन सौ देसी मुर्गियाँ उस कमाई का पाँचवाँ हिस्सा देती हैं जो कंपनी वाले चक्र देते थे। इतवार की सुबह गाँव के लोग आकर ले जाते हैं और हुकुमचंद गेट पर खड़ा होकर उन्हें एक-एक करके पकड़ाता है और पैसे हाथ में लेता है, आठ बजे, उजाले में।