सुई अंदर जाते वक़्त उतनी नहीं चुभती जितना लोग समझते हैं। जो चीज़ याद रहती है वह नीचे झूलता हुआ पालना है, जिस पर थैली रखी रहती है और जो अपने आप हिलता रहता है ताकि ख़ून जमे नहीं। जितेंद्र ने पहली बार उसी को देखते हुए आठ मिनट काटे। बाद में उसे एक पैकेट बिस्किट मिला और मीठा नीबू पानी मिला, और बाहर आकर बारह सौ रुपये मिले, जिनमें से दो सौ करतार ने ले लिए।
जो चाहिए था वह मोबाइल मार्केट में आठ बाई दस की एक दुकान थी। जमा एक लाख दस हज़ार और शुरू का माल तीस हज़ार का। जितेंद्र ने चार साल सीमेंट की बोरियाँ ढोकर और माँ की कमेटी मिलाकर एक लाख दस हज़ार जोड़ लिए थे। तीस हज़ार कम थे। दुकान का मालिक बीस तारीख़ तक रुका हुआ था, क्योंकि एक और आदमी भी पूछ रहा था।
चार साल से वह गोदाम में लगा था। सुबह सात से शाम छह, और सीज़न में उससे ज़्यादा। पचास किलो की बोरी कंधे पर आती है और सीढ़ी से ऊपर जाती है, और दिन में ऐसी सत्तर-अस्सी बोरियाँ जाती हैं। तेईस की उम्र में यह काम आसान लगता है। जो लोग इसे बीस साल से कर रहे थे, उन्हें देखकर जितेंद्र को यह भी दिखता था कि आसान यह सिर्फ़ लगता है। दुकान का मतलब इतना ही था कि आदमी बैठकर कमाए।
हिसाब सीधा था। गड़बड़ उसी में थी। एक यूनिट के बारह सौ। तीस हज़ार के लिए पच्चीस यूनिट। और क़ानून से एक आदमी तीन महीने में एक बार दे सकता है, यानी पच्चीस यूनिट में छह साल लगते।
करतार निजी ब्लड बैंक के बाहर वाली पान की दुकान पर मिलता था। उसके पास फ़ोन था और जेब में दूसरे लोगों के कार्ड थे। वह किसी को धमकाता नहीं था। बहलाता भी नहीं था। वह सिर्फ़ यह बताता था कि कब आना है, और उसका काम अस्पताल के भीतर किसी और का था।
पहली बार सब क़ायदे से हुआ। अपना नाम, अपना कार्ड, अपनी उँगली का ख़ून पहले जाँचा गया। दूसरी बार छब्बीस दिन बाद बुलाया गया और नाम कोई और था। जितेंद्र ने वह नाम काग़ज़ पर देखा और उसे बोलकर देखा, क्योंकि उसे लग रहा था कि कोई पूछेगा। किसी ने नहीं पूछा।
एक छोटी बात उस दिन हुई और उसका मतलब बहुत देर से खुला। पहली बार करतार ने उसका ग्रुप नहीं पूछा था। दूसरी बार पूछा।
तीसरी बार महीने के आख़िरी हफ़्ते में बुलावा आया। चौथी बार भी। पाँचवीं बार जितेंद्र ने हँसकर कहा कि आप महीने के आख़िर में ही क्यों याद करते हैं, और करतार ने कहा कि उधर का हिसाब ऐसे ही चलता है।
शरीर पहले नहीं बताता, बाद में बताता है। तीसरी यूनिट तक कुछ नहीं हुआ। पाँचवीं के बाद सीढ़ी चढ़ते हुए बोरी कंधे पर से सरकने लगी और उसे बीच में बैठना पड़ा, जो उसने चार साल में कभी नहीं किया था। छठी के बाद उठते वक़्त आँखों के आगे काला आने लगा, कुछ पल के लिए। माँ ने कहा कि तेरे हाथ ठंडे रहते हैं आजकल।
सातवीं बार उसे भीतर बिठाकर देर तक इंतज़ार कराया गया। कमरे के कोने में एक ट्रॉली खड़ी थी जिस पर थैलियाँ लदी थीं और हर थैली पर एक तारीख़ लिखी थी। एक लड़का उनमें से कुछ थैलियाँ उठाकर बाहर ले जा रहा था। जितेंद्र ने पूछ लिया कि ये कहाँ जा रही हैं। लड़के ने बताया कि पैंतीस दिन बाद इनका कुछ नहीं होता।
बात यहीं से पलट गई। ब्लड बैंक छोटा था और उसे हर महीने एक गिनती दिखानी होती थी। करतार को पैसा उस पर मिलता था कि उसने कितनी यूनिट भिजवाईं, इस पर नहीं कि कितनी किसी के काम आईं। छोटा बैंक इतना ख़ून खपा नहीं सकता। महीने के आख़िरी हफ़्ते में गिनती पूरी करनी होती थी, और जो पूरी करने के लिए लिया जाता था उसका एक हिस्सा पैंतीस दिन बाद फेंक दिया जाता था।
यह जानने के बाद उसके पास दो चीज़ें थीं। एक यह जानकारी, और दूसरी यह कि अब सिर्फ़ छह हज़ार कम थे और बीस तारीख़ में आठ दिन बचे थे। वह दो बार और गया।
गिरा वह अठारह तारीख़ को। तीसरी मंज़िल पर, बोरी समेत। होश में आने पर अस्पताल में जो नंबर बताया गया वह छह दशमलव एक था और डॉक्टर ने उसे दो बार दोहराया। तीन हफ़्ते वह घर पर पड़ा रहा, लोहे की गोलियाँ खाता रहा और उसे यह भी बताया गया कि अब वह लंबे वक़्त तक ख़ून नहीं दे सकता। उन्हीं दिनों उसी लाइन का एक और आदमी भर्ती हुआ, जिसे वह सिर्फ़ शक्ल से जानता था।
दुकान उसे मिल गई। बीस तारीख़ को जमा हो गया और सत्ताईस को शटर खुल गया। पाँच साल बाद भी वह चल रही है और उसमें कवर, चार्जर, स्क्रीन गार्ड और छोटी-मोटी मरम्मत का काम होता है। महीने के अंत में जितना बचता है, उससे घर चल जाता है।
छोटी बहन ज्योति की डिलीवरी तीन साल बाद हुई और अस्पताल ने दो यूनिट के बदले दो देने वाले माँगे, जैसा हर जगह माँगा जाता है। वह ख़ुद नहीं दे सकता था। उसने दो आदमियों का इंतज़ाम किया और उनके पैसे दिए, और जिससे बात करनी पड़ी वह वही था जिससे पहले बात होती थी।
दुकान पर आदमी दिन भर काउंटर के ऊपर से हाथ बढ़ाकर सामान लेता-देता है। कोहनी के मोड़ पर पड़े निशान सामने वाले को साफ़ दिखते हैं। एक बार एक ग्राहक ने पूछा कि यह क्या है, और जितेंद्र ने कहा कि बीमार पड़ गया था, और ग्राहक मान गया। उसके बाद से वह जून में भी पूरी बाँह की क़मीज़ पहनता है।