छपाई की मशीन की आवाज़ में रोहित को नींद आ जाती थी। यह मज़ाक़ नहीं था। इंदौर की उस गली में उसका प्रेस बारह साल से चल रहा था, और दोपहर में जब दोनों मशीनें साथ चलतीं, तो वह पीछे वाले कमरे में कुर्सी पर बैठे-बैठे बीस मिनट सो लेता था। मशीन बंद होते ही उसकी आँख अपने आप खुल जाती थी। छह आदमी काम करते थे। मुनीम रामेश्वर ग्यारह साल से चेक पर उसके दस्तख़त करता आया था, और रोहित ने कभी गिनती नहीं की कि कितने।
समीर स्कूल के ज़माने का दोस्त था। वह महीने में एक बार आता था, बिना बताए, चाय पीता था और चला जाता था। उस दिन वह बताकर आया, और साथ में एक फ़ाइल लाया। एक निजी स्कूल शृंखला की कॉपियों और रजिस्टरों का काम था, तीन साल का ठेका, हर साल अस्सी हज़ार कॉपियाँ। रोहित की पुरानी मशीन से इतना काम नहीं हो सकता था। दूसरी मशीन चाहिए थी।
मशीन इक्कीस लाख की थी। बैंक चौदह देने को तैयार था, प्रेस की ज़मीन गिरवी रखने पर। बाक़ी सात रोहित को लगाने थे और उसके पास चार थे। समीर ने कहा कि तीन वह लगा देगा। उसने यह भी कहा कि जल्दी करनी होगी, क्योंकि ठेका किसी और को भी दिया जा सकता है। रात में रोहित ने अपनी पत्नी से बात की। उसने मना नहीं किया, पर उसने एक सवाल पूछा: ठेका देने वाला आदमी है कौन।
जब वक्त कम पड़ने लगा
रोहित ने वही सवाल अगली शाम समीर से पूछा। समीर ने एक नाम बताया और दिल्ली के एक दफ़्तर का पता। रोहित ने पता लिख लिया और वहाँ कभी गया नहीं। इसकी वजह लापरवाही नहीं थी। वजह यह थी कि समीर से यह पूछना कि तुम सच बोल रहे हो या नहीं, उसे बदतमीज़ी लगती थी। यह बात उसने बाद में कई बार सोची।
काग़ज़ी काम रामेश्वर ने सँभाला, क्योंकि वही सँभालता था। बैंक के फ़ॉर्म, गिरवी के काग़ज़, मशीन का ऑर्डर, बीमा। रोहित ने जहाँ कहा गया वहाँ दस्तख़त किए, और बाक़ी जगह रामेश्वर ने किए, जैसे ग्यारह साल से होता आया था। मशीन जनवरी में आई। दो दिन तक गली के लोग उसे देखने आते रहे। रोहित ने उस हफ़्ते पूरी गली में मिठाई बँटवाई।
फ़रवरी में समीर ने कहा कि काग़ज़ का इंतज़ाम पहले से करना पड़ेगा, वरना छपाई शुरू होते-होते दाम बढ़ जाएँगे। रोहित ने काग़ज़ के एक सप्लायर के नाम छह लाख भेजे, समीर के बताए खाते में। रसीद आई, ठीक-ठाक रसीद, जिस पर जीएसटी नंबर भी छपा था। काग़ज़ मार्च में आना था। मार्च में नहीं आया।
अप्रैल में समीर का फ़ोन बंद हो गया। रोहित दिल्ली वाले पते पर गया। वहाँ जूते की एक दुकान थी और दुकानदार ने बताया कि वह चौदह साल से उसी जगह बैठ रहा है। लौटकर रोहित ने सप्लायर का जीएसटी नंबर जँचवाया। नंबर असली था, पर वह किसी और फ़र्म का था, जो दो साल पहले बंद हो चुकी थी। जिस स्कूल शृंखला का ठेका मिला था, उसका कहीं कोई नामोनिशान नहीं मिला।
मई में बैंक की पहली नोटिस आई। मशीन की किश्त तीन महीने से नहीं गई थी, क्योंकि रोहित का सारा पैसा काग़ज़ में जा चुका था और नया काम कोई था नहीं। दूसरी नोटिस जून में आई। तीसरी में तारीख़ लिखी थी: इक्कीस अगस्त, नीलामी। रोहित ने वह काग़ज़ मेज़ पर रखा और उस पर पेपरवेट रख दिया, जैसे वह उड़ जाने वाला हो।
सच सामने आया
थाने में रिपोर्ट लिखी गई। दारोगा ने काग़ज़ पढ़े और एक ही सवाल पूछा: पैसा भेजा किसने। रोहित ने कहा कि उसने भेजा। दारोगा ने कहा कि तब इसे धोखाधड़ी साबित करना मुश्किल है, क्योंकि पैसा उसने अपनी मर्ज़ी से भेजा है और जिस फ़र्म को भेजा है वह काग़ज़ पर मौजूद है। समीर का नाम कहीं नहीं था। एक भी काग़ज़ पर नहीं। रोहित घर आया और फ़ाइल दोबारा खोलकर बैठ गया, यही देखने कि नाम कहीं है या नहीं।
रात के दो बजे उसे बैंक की गारंटी वाला काग़ज़ मिला। उस पर एक निजी गारंटर के दस्तख़त थे, और गारंटर उसकी पत्नी थी। उसने ज़िंदगी में वह काग़ज़ देखा तक नहीं था। रोहित ने उसे जगाकर दिखाया। उसने दस्तख़त देखे और कहा कि यह उसके ही हैं, हूबहू, पर उसने किए नहीं हैं। रोहित देर तक उस काग़ज़ को देखता रहा। नक़ल इतनी अच्छी थी कि बनाने वाले ने असली दस्तख़त सैकड़ों बार देखे होंगे।
रामेश्वर ग्यारह साल से प्रेस का सारा काग़ज़ी काम करता था। राशन कार्ड, बीमा, बच्चों के स्कूल के फ़ॉर्म, बैंक की हर पर्ची, सब उसी के हाथ से भरे गए थे, और उन सब पर रोहित की पत्नी के दस्तख़त थे। रोहित सुबह तक उसी कुर्सी पर बैठा रहा। सात बजे रामेश्वर हमेशा की तरह आया, ताला खोला, झाड़ू लगवाई और हिसाब की किताब निकालकर बैठ गया।
रोहित ने उस दिन उससे हिसाब नहीं माँगा। दोपहर में वह बैंक गया और पिछले तीन साल के सारे चेक की नक़ल निकलवाई। शाम तक उसे चार चेक ऐसे मिल गए जो किसी काम के नहीं थे और जिन पर उसके अपने दस्तख़त थे। कुल उन्नीस लाख। तारीख़ें मशीन ख़रीदने से बहुत पहले की थीं। समीर वाला मामला रामेश्वर का पहला मामला नहीं था। वह आख़िरी था।
रोहित के सामने दो रास्ते थे और दोनों में से कुछ न कुछ जाता था। रामेश्वर को पकड़वाने का मतलब था कि गारंटी वाला काग़ज़ अदालत में जाएगा, और अदालत में महीनों लगते हैं, जबकि नीलामी में तीन हफ़्ते बचे थे। ज़मीन चली जाती और प्रेस उसके साथ। दूसरा रास्ता यह था कि नई मशीन घाटे में बेचकर किश्तें चुका दी जाएँ। उसमें प्रेस बच जाता, और उन्नीस लाख कभी वापस नहीं आते।
रोहित ने मशीन बेच दी। इक्कीस लाख की मशीन ग्यारह में गई, आठ महीने पुरानी, जिस पर एक ख़रोंच तक नहीं थी। जिस दिन उसे उठाकर ले जाया गया, प्रेस के छह आदमी बाहर खड़े होकर देखते रहे। उस दोपहर सिर्फ़ एक मशीन चली और रोहित को नींद नहीं आई। रिपोर्ट उसने वापस नहीं ली। रामेश्वर अक्टूबर में गिरफ़्तार हुआ। समीर का कुछ पता नहीं चला, और शायद कभी नहीं चलेगा।
नया मुनीम दिसंबर में रखा गया। चौबीस साल का लड़का, पहली नौकरी, हाथ की लिखाई अच्छी। पहले दिन रोहित ने उसे मेज़ के पीछे बिठाया, दराज़ खोली, और चेक बुक निकालकर उसके सामने रख दी। लड़के ने पहले रोहित की तरफ़ देखा, फिर चेक बुक की तरफ़। रोहित ने दराज़ बंद की और अपने कमरे में चला गया। उस दोपहर एक ही मशीन चली, और रोहित उसकी आवाज़ में बीस मिनट सो लिया।