शहर आदमी को अकेला नहीं करता। वह सिर्फ़ यह दिखा देता है कि वह पहले से कितना अकेला था। ओमवीर को यह बात मालूम नहीं थी जब वह उतरा। वह छब्बीस का था और एक गोदाम में तौल का काम करता था। उस पूरे शहर में उसका कोई नहीं था।

कमरा उसे तीसरे दिन मिल गया। चार मंज़िला पुरानी इमारत, गली के भीतर। चौथी मंज़िल का पिछला कमरा। किराया दो हज़ार आठ सौ और चालीस हज़ार जमानत, जो उसके पास बचे कुल पैसे का बड़ा हिस्सा था। इमारत में उस वक़्त नौ किराएदार थे और सीढ़ी पर हर शाम बच्चे खेलते थे।

गोदाम पंद्रह मिनट की पैदल दूरी पर था और यही उस कमरे की असली क़ीमत थी। ओमवीर सुबह सात बजे निकलता, रात आठ बजे लौटता, और महीने में एक बार घर पैसे भेजता। पहले साल उसे शहर से कोई शिकायत नहीं हुई।

जाना उन्होंने दूसरे साल शुरू किया। पहले नीचे वाले दो परिवार गए। फिर तीसरी मंज़िल का जोड़ा, और फिर दो और। किसी ने कोई कारण नहीं बताया और ओमवीर ने पूछा भी नहीं, क्योंकि शहर में लोग आते-जाते रहते हैं। छह महीने में नौ में से तीन बचे। फिर दो।

लालजी उसी इमारत में सामने वाले कमरे में रहता था और सबसे पहले उसी ने ओमवीर को यह बात बताई। मालिक इमारत बेच रहा है। ख़ाली इमारत की क़ीमत दुगुनी मिलती है। लालजी ने इतना और कहा कि ओमवीर सँभलकर रहे और अकेले में सीढ़ी न चढ़े। उस रात के बाद लालजी शाम को चाय लेकर उसके कमरे में आने लगा।

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फिर चीज़ें एक-एक करके जाने लगीं, और हर बार एक वाजिब वजह के साथ। पहले मोटर जली और नई मोटर के लिए किराएदारों से चंदा माँगा गया, जो दो आदमियों से इकट्ठा नहीं हो सकता था। पानी अब नीचे से चढ़ाना पड़ता था। चार मंज़िल, दो बाल्टी। फिर सीढ़ी की चारों बत्तियाँ गईं। फिर एक दिन मरम्मत के नाम पर तीसरी मंज़िल की एक दीवार तोड़ दी गई और मलबा सीढ़ी पर ही पड़ा रहा।

आठवें महीने लालजी भी चला गया। जाते हुए वह गले मिला और कहता गया कि जमानत के चालीस हज़ार के लिए अड़े रहना, वरना ये लोग देते नहीं। अब उस पूरी इमारत में सिर्फ़ ओमवीर था। चार मंज़िल, बारह कमरे, एक आदमी। रात में सीढ़ी पर अपने ही क़दमों की आवाज़ चार मंज़िल तक जाती थी और लौटकर आती थी।

उसके बाद वह शुरू हुआ जिसे साबित नहीं किया जा सकता। रात को दरवाज़े पर दस्तक होती। खोलने पर कोई नहीं होता। एक रात नीचे वाले ख़ाली कमरे का दरवाज़ा चौखट समेत उतार लिया गया और सुबह वह सीढ़ी के बीच में पड़ा मिला। एक बार उसकी अपनी कुंडी पर बाहर से तार बाँध दिया गया और उसे खोलने में उसे बीस मिनट लगे। किसी ने कभी उसे धमकी नहीं दी। बात तक नहीं की।

दो रास्ते थे। चालीस हज़ार छोड़कर निकल जाना, या टिके रहना। ओमवीर ने गिनकर देखा कि चालीस हज़ार उसकी चौदह महीने की बचत थी और गाँव में उसके बापू की दवा उसी से चलती थी। वह टिका रहा। उसने दरवाज़े के पीछे लोहे का एक सरिया रख लिया और सोने से पहले उसे टिकाकर सोने लगा।

उन चौदह महीनों में ओमवीर के भीतर भी कुछ बदला, जिसका हिसाब उसने बहुत देर से लगाया। वह गली के मोड़ पर रुकने लगा था। ऊपर देखने के लिए, यह जानने के लिए कि उसकी खिड़की जैसी छोड़ी थी वैसी ही है या नहीं। उसने रात को खाना बनाना छोड़ दिया, क्योंकि चूल्हे की आवाज़ में दरवाज़े की आवाज़ दब जाती है। और उसने घर पर फ़ोन करना कम कर दिया, इसलिए कि बताने लायक़ कुछ था नहीं और छिपाना मुश्किल हो रहा था।

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लालजी उन दिनों भी आता रहा। महीने में दो-तीन बार, शाम को, चाय और कभी-कभी खाना लेकर। वह पूछता कि कोई परेशानी तो नहीं और ओमवीर बता देता। दस्तक। दरवाज़ा। तार। लालजी हर बार गुस्सा करता और कहता कि यह सब बहुत ग़लत है, और जाते हुए यही कहता कि टिके रहना, हक़ छोड़ना नहीं है।

बात ख़त्म चौदहवें महीने में हुई, और बहुत सीधी तरह से। मालिक का आदमी आया। उसने चालीस हज़ार गिनकर सामने रखे और कहा कि कमरा तीन दिन में ख़ाली कर दो। कोई बहस नहीं। कोई कटौती नहीं। पूरी रक़म। ओमवीर ने पैसे गिने और तब उसे वह चीज़ समझ आई जो चौदह महीने में नहीं आई थी। चालीस हज़ार उन लोगों के लिए कुछ भी नहीं था। वे इसे पहले ही दिन दे सकते थे। जो चौदह महीने चला, वह पैसे बचाने के लिए नहीं चला था।

सामान बाँधने में उसे एक शाम लगी। लालजी उस दिन भी आ गया, बिना बताए, और उसने ओमवीर के साथ मिलकर संदूक और बिस्तर चार मंज़िल नीचे उतारे, दो-दो बार चढ़कर। नीचे टेंपो खड़ा था। ओमवीर ने उसे दो सौ रुपये देने चाहे और लालजी ने हाथ पीछे खींच लिया और कहा कि यह क्या कर रहे हो, हम एक ही इमारत में रहे हैं।

नए मोहल्ले में कमरा मिलने में ग्यारह दिन लगे और वह गोदाम से चालीस मिनट दूर पड़ा। कुछ महीने बाद ओमवीर उस गली से गुज़रा। इमारत गिराई जा चुकी थी और मलबा भी उठ चुका था। जिस जगह वह चौदह महीने अकेला रहा था, वहाँ अब सिर्फ़ ज़मीन थी, और उस ज़मीन पर एक आदमी खड़ा था जो नाप ले रहा था और जिसे ओमवीर पहचानता था, क्योंकि वह उसकी चाय पी चुका था।