जनरेटर की आवाज़ में एक ठहराव होता है जिसे चलाने वाला ही पकड़ता है। भार पूरा हो तो इंजन एक जगह बैठ जाता है और घंटों वैसा ही चलता रहता है। कुछ और जोड़ दो तो आवाज़ एक पल को नीचे बैठती है, बत्तियाँ ज़रा-सी झपकती हैं, और फिर सब सँभल जाता है। श्यामलाल ग्यारह साल से यही सुनता आया था और उसे इसके लिए मीटर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी।
उसका काम लाइट और साउंड का था। पंद्रह केवीए का एक जनरेटर, ट्यूब और हैलोजन, दो माइक और एक एम्पलीफ़ायर। ब्याह के दिनों में काम चलता था और साल का सबसे बड़ा एक ही सौदा था, रामलीला के दस दिन। कमेटी उसे पूरे दस दिन के इकतीस हज़ार देती थी और डीज़ल अपना डालती थी।
रामलीला ख़ुद एक हिसाब है। नौ बजे शुरू, बारह बजे ख़त्म, दस रातें, वही कहानी और वही क्रम। किस रात कौन-सा प्रसंग होगा यह गाँव के हर आदमी को मालूम रहता है। और इन तीन घंटों में गाँव का हर आदमी या तो मंच पर होता है या मैदान में, और दोनों जगह उसे दस लोग देख रहे होते हैं।
श्यामलाल की केबल सिर्फ़ मैदान तक नहीं जाती थी। कमेटी की चाय वाली गुमटी और बग़ल की दो दुकानें भी उसी लाइन से जुड़ी रहती थीं, यह हर साल का तय क़िस्सा था और इसके पैसे नहीं लिए जाते थे। इसका मतलब यह भी था कि उस लाइन पर कोई कुछ भी लगाए तो श्यामलाल के जनरेटर पर चढ़ता था।
आठवीं रात को दस बजकर बीस मिनट पर आवाज़ नीचे बैठी। ऊपर नहीं आई। हैलोजन मद्धम हो गए और मद्धम बने रहे। लगभग बीस मिनट बाद सब अपनी जगह लौट आया।
श्यामलाल ने उसी वक़्त फ़िल्टर देखा, डीज़ल देखा और तार का जोड़ देखा। रात के बाद उसने पूरा सेट फिर से देखा। कुछ ख़राब नहीं था। उसने इसे लिखा भी नहीं, क्योंकि लिखने की आदत उसे कभी नहीं पड़ी, पर वह उसे याद रह गया, जैसे मिस्त्री को अपनी मशीन की हर अजीब आवाज़ याद रह जाती है।
अगली सुबह पता चला कि हरिओम की दुकान पीछे से खुली हुई है। पिछवाड़े की लोहे की जाली दो जगह से कटी थी और भीतर से गल्ला और तीन बोरे साबुन-तेल का माल ग़ायब था। गाँव ने तय कर लिया कि यह बाहर के लोगों का काम है, क्योंकि उस रात पूरा गाँव मैदान में था।
जाली काटने में मशीन लगती है। मशीन में बिजली लगती है। दुकान उसी लाइन पर थी। श्यामलाल के पास वक़्त था, मिनट समेत, और पूरे गाँव में वह उसी के पास था। दस बजकर बीस से लगभग चालीस तक।
और यहीं से रामलीला उलटी काम करने लगी। तीन घंटे में हर आदमी की जगह तय होती है। जो मंच पर है उसे सैकड़ों लोग देख रहे हैं और जो मैदान में है उसे उसके अगल-बग़ल वाले देख रहे हैं। बीस मिनट के लिए ग़ायब वही हो सकता है जिसे उन बीस मिनटों में किसी जगह होना ही न हो, और ऐसे आदमी गिनती के होते हैं।
उस रात लंका का प्रसंग था। उस रात जिन किरदारों का काम नहीं होता, उनमें एक अशोक था, जो मारीच बनता था। मारीच तीसरी रात के बाद कहानी में नहीं आता। पर अशोक हर रात आता था, कपड़े और मेकअप में, और सबसे आगे बैठता था, क्योंकि यही रिवाज है। आख़िरी आरती में वह हमेशा दिखाई देता था, और आरती के बाद लोग यही याद रखते हैं कि वह वहीं था।
थाने में उसने नहीं कहा। वह अगले दिन दोपहर में हरिओम की दुकान पर गया, जब वहाँ और कोई नहीं था, और उसे वक़्त बता दिया। साथ में यह भी बता दिया कि उस वक़्त कौन-कौन अपनी जगह पर नहीं था। उसने कोई इल्ज़ाम नहीं लगाया, क्योंकि लगाने को उसके पास एक झपकती हुई बत्ती के सिवा कुछ नहीं था।
हरिओम ने कुछ नहीं किया। इसकी वजहें उसने बाद में एक-एक करके गिनाईं और वे सब वाजिब थीं। नुक़सान इकतीस हज़ार का था। वह सहा जा सकता था। मुक़दमे का मतलब था गाँव का दो हिस्सों में बँटना, और वह भी नवरात्रि के बीच। और अशोक के घर और उसके घर का रिश्ता पुराना था।
जिसने क़ीमत चुकाई वह श्यामलाल था, और उसने यह भी नहीं समझा कि क्यों। अगले बरस रामलीला कमेटी ने उसे नहीं बुलाया। बताया यह गया कि नया आदमी बीस केवीए लेकर आ रहा है और उसके पास एलईडी की झालर भी है। यह सच भी था। साल का सबसे बड़ा सौदा उसके हाथ से निकल गया और दोबारा कभी नहीं आया।
उसका काम ब्याह पर आ टिका। वह मौसमी है। जाड़ों में चलता है। बाक़ी महीनों में नहीं। दो साल बाद उसने एक पुराना जनरेटर और ख़रीद लिया, ताकि दो जगह एक साथ लग सकें, और उसकी क़िस्त पाँच साल चली।
हरिओम की बेटी का ब्याह उसके दो साल बाद हुआ और वह उसी घर में हुआ जिसमें अशोक रहता है। लाइट का काम श्यामलाल को मिला, क्योंकि ब्याह में वह अब भी सबसे सस्ता पड़ता है। उस रात दोनों घर के लोग एक ही दरी पर बैठे और लड़की के पिता ने उठकर सबको खाना खिलाया। श्यामलाल जनरेटर के पास खड़ा रहा और आवाज़ सुनता रहा, जो पूरी रात एक ही जगह बैठी रही।