तरुण की ज़िंदगी में देखने लायक़ कुछ नहीं था, और उसे इसमें कोई शिकायत भी नहीं थी। साढ़े आठ बजे घर से निकलना, नौ बीस पर दफ़्तर, वही मेज़ जो नौ साल से उसकी थी, सवा एक पर खाना, और शाम छह बजे वही बस। कोई उससे नाराज़ नहीं था। किसी को उससे कुछ चाहिए भी नहीं था।

कमेटी उसी के पास इसीलिए थी। उन्नीस लोग थे और हर आदमी हर महीने की पहली तारीख़ को दो हज़ार देता था। अड़तीस हज़ार बनते थे और वे पर्ची निकालकर एक आदमी को दे दिए जाते थे। पूरा चक्कर उन्नीस महीने में ख़त्म होता, फिर नया शुरू होता। सात साल से यही चल रहा था।

पैसा हाथ का होता था, बैंक का नहीं। इसकी वजह किसी ने कभी नहीं गिनाई और सबको मालूम थी। नोट तरुण की दराज़ में एक रबर बैंड में बँधे रहते थे और चाबी उसकी जेब में। यह ज़िम्मेदारी उसे इसलिए मिली थी कि उसके बारे में कहने को कुछ नहीं था, और दफ़्तर में यह एक योग्यता है।

पर्ची वाला दिन अच्छा दिन होता था। चाय आती थी, काग़ज़ की उन्नीस चिटें मोड़कर एक डिब्बे में डाली जाती थीं, और सबसे नए आदमी से एक निकलवाई जाती थी। तनख़्वाह से अड़तीस हज़ार कभी इकट्ठे नहीं मिलते। उस पैसे से इस दफ़्तर में एक स्कूटर आया था, एक कमरे में टाइल लगी थी, और एक की माँ की आँख का ऑपरेशन हुआ था। ब्याज कहीं नहीं था और काग़ज़ भी कहीं नहीं था।

उस साल जुलाई की तीस तारीख़ को शाम को उसने गिना। छब्बीस हज़ार निकले। उसने तीन बार गिना और तीनों बार छब्बीस ही निकले। उस महीने छह लोगों ने उसे पैसे मेज़ पर नहीं, गलियारे में या सीढ़ी पर दिए थे, जैसे हर महीने कोई न कोई देता ही है। उसे यह याद नहीं था कि कौन-कौन।

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अगले दिन पर्ची निकलनी थी। तरुण ने अपनी जेब से बारह हज़ार डाले और पूरी रक़म दे दी। यह बड़ा दिल नहीं था। तीस तारीख़ की शाम को यह कह देना कि पैसे कम हैं, उन्नीस आदमियों की तरफ़ एक साथ उँगली उठाना होता, और उसमें से अठारह का कोई क़ुसूर नहीं होता।

अगस्त में दस हज़ार कम निकले। तरुण के पास दस हज़ार नहीं थे।

सो उसने कह दिया। दफ़्तर उसी दोपहर बदल गया। पहला शक उसी पर गया और यह ठीक ही गया, क्योंकि चाबी उसके पास थी, गिनती वह करता था, और पिछले महीने उसने अपनी जेब से पैसे डाले थे, जो एक आदमी तभी करता है जब उसे कुछ ढकना हो। यह बात किसी ने मुँह पर नहीं कही। उससे पूछा ज़रूर गया कि रसीद क्यों नहीं बनती थी।

फिर शक फैल गया। जो दो लोग रोज़ साथ खाना खाते थे, वे अलग-अलग खाने लगे। एक आदमी ने छह बजे निकलना बंद कर दिया और सवा छह पर निकलने लगा, ताकि किसी के साथ बाहर न जाना पड़े। दो लोगों ने अगले महीने पैसे देते वक़्त तीसरे को बुलाकर खड़ा किया। खाने के वक़्त कमरे में जो आवाज़ रहती थी, वह नहीं रही।

तीसरे हफ़्ते किसी ने वह बात कही जो कही जानी ही थी। दराज़ उस कमरे में है जिसकी सफ़ाई लखन करता है। लखन ठेके पर था, एजेंसी से आता था, ग्यारह साल से उसी मंज़िल पर था। किसी ने उस पर आरोप नहीं लगाया। एजेंसी से बस इतना कहा गया कि किसी और को भेज दो, और छह दिन में कोई और आ गया।

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तरुण जानता था कि लखन ने नहीं लिया। वजह अंकगणित थी। जुलाई में बारह हज़ार कम थे और अगस्त में दस हज़ार। दोनों दो हज़ार से पूरे-पूरे कटते हैं। जेब मारने वाला जो हाथ लगे ले जाता है, और वह रक़म कभी गोल नहीं होती। जो गोल होती है वह न दिए गए पैसे की होती है।

उसने कोई जाँच नहीं की। सितंबर की पहली तारीख़ को उसने बस एक नियम बता दिया। पैसा मेज़ पर ही लिया जाएगा, गलियारे में नहीं, और लेते ही वह ज़ोर से कहेगा कि मिल गया। इस पर कोई नहीं बोला, क्योंकि बोलने का मतलब कुछ और हो जाता।

उस महीने छह लोग मेज़ तक नहीं आए। छठे दिन तक भी नहीं। उनमें से कोई चोर नहीं था। एक के पिता की दवा चल रही थी, एक की बहन की शादी थी, एक ने किसी और की ज़मानत में पैसा फँसा रखा था, एक की तनख़्वाह से क़र्ज़ की क़िस्त कटने लगी थी, एक के बच्चे का दाख़िला था, और एक ने बस ख़र्च कर दिए थे। छहों यही समझ रहे थे कि ऐसा सिर्फ़ उनके साथ है।

कमेटी वहीं टूट गई। टूटने का हिसाब गंदा होता है। ग्यारह लोग अपनी पर्ची पहले ले चुके थे और आठ का नंबर आया ही नहीं था। जो ले चुके थे उन पर बाक़ी था, जो नहीं ले पाए थे उनका डूबा। यह पूरा हिसाब बैठने में चौदह महीने लगे और आख़िर तक पूरा नहीं बैठा।

लखन के बारे में तरुण एजेंसी के दफ़्तर तक गया। वहाँ उसे बताया गया कि उस जगह पर आदमी लग चुका है और लखन को दूसरी जगह देखनी होगी। इतना ही हुआ। तरुण ने इसके बाद कुछ और नहीं किया, और यह बात उसे याद है।

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अगले साल दफ़्तर में नई कमेटी बनी, बीस लोगों की, और उसमें पैसा खाते से जाने लगा। चलाने वाला कोई और है। तरुण उसमें नहीं है और उससे पूछा भी नहीं गया। एक चीज़ और बदली, जिसके बारे में कोई बैठक नहीं हुई। सफ़ाई अब सुबह सात बजे होती है, दफ़्तर खुलने से पहले, जब उन कमरों में कोई नहीं होता।