शिवपाल के पास लाइसेंस था और लाइसेंस पर लिखा था कि वह दस दिन के लिए है।
तीन लोग जा चुके थे। पहला अक्टूबर में, दूसरा उसी महीने के आख़िर में, तीसरा नवंबर की एक शाम को। तीनों गन्ने के खेत के उसी किनारे पर, जहाँ नहर की पटरी नीची होकर खेत से मिलती है।
नंदलाल वन विभाग से था और उसने शिवपाल को बुलाया था। बुलाने का काग़ज़ भी उसी ने बनवाया था और उसमें एक शब्द था जिसका मतलब उन दोनों को मालूम था। आदमख़ोर।
शिवपाल तीस बरस से यह काम करता है और वह पहली बात यही जाँचता है कि जानवर आदमख़ोर है भी या नहीं।
तेंदुआ आदमी नहीं खाता। वह आदमी से बचकर रहता है और गाँव के पास इसलिए आता है कि वहाँ कुत्ते और बकरियाँ मिलती हैं। जो तेंदुआ आदमी खाने लगे, उसके साथ लगभग हमेशा कुछ हुआ होता है। कोई पुरानी चोट, टूटा जबड़ा, साही के काँटे पंजे में, कुछ ऐसा जिससे उसका असली शिकार उसकी पहुँच से बाहर हो गया हो।
यह सिद्धांत नहीं है। यह तीस बरस में उसने ख़ुद देखा है।
पहले दो दिन वह सिर्फ़ चला। और कुछ नहीं।
वह तीनों जगहों पर गया, नाप लिया, और पगचिह्न देखे। बाईं तरफ़ के अगले पंजे का निशान बाक़ी तीनों से हल्का था। जानवर उस पैर पर पूरा वज़न नहीं डाल रहा था।
तीसरे दिन उसने वह देखा जिसकी उसे तलाश थी।
नहर की पटरी के नीचे, झाड़ी की जड़ में, तार का एक फंदा बँधा हुआ था। खुला हुआ, टूटा हुआ, और उसका एक सिरा खिंचकर सीधा हो चुका था।
ऐसे फंदे जंगली सूअर के लिए लगाए जाते हैं। सूअर गन्ने में घुसता है और एक रात में जितना नुक़सान करता है, उतना किसान चुपचाप नहीं सह सकता। फंदा सस्ता है, आसान है, और किसी को दिखता नहीं।
फंदे में कुछ भी फँस सकता है।
शिवपाल ने वह फंदा ध्यान से देखा। तार की गाँठ अभी भी झाड़ी की जड़ से बँधी थी और वहाँ की छाल छिली हुई थी, गोल घेरे में। इसका मतलब यह है कि जो भी फँसा था, वह देर तक खिंचा था और कई तरफ़ खिंचा था। छाल पर की वह चोट पुरानी थी। दो बरस से कम की नहीं, और शायद तीन की।
शिवपाल ने वह टुकड़ा उठाकर जेब में रख लिया और नंदलाल के सामने उसका ज़िक्र नहीं छेड़ा, क्योंकि उस वक़्त छेड़ने से जानवर नहीं रुकता।
चौथी रात उसने मचान बाँधा।
बाँधने की जगह उसने सोच-समझकर चुनी। मचान गन्ने के उस तरफ़ था और नीचे बकरी बाँधी गई थी, और उसके पीछे खुला मैदान था, ताकि गोली चूके तो वह मैदान में जाए।
चार रातें कुछ नहीं हुआ।
उन चार रातों में उसने वह किया जो इस काम का असली हिस्सा है, यानी बैठा रहा। मचान पर आदमी हिल नहीं सकता, खाँस नहीं सकता, और बीड़ी तो बिलकुल नहीं पी सकता। ठंड नीचे से चढ़ती है और घुटनों में बैठ जाती है। तीसरी रात बकरी बीमार पड़ गई और उसे बदलना पड़ा, और उस दिन उसे दो घंटे नीचे रहना पड़ा, जो इस पूरे काम का सबसे ख़तरनाक हिस्सा था और जिसका ज़िक्र काग़ज़ों में कहीं नहीं होता।
आठवीं रात वह आया।
वह पौने सात पर आया और उस वक़्त रोशनी बची हुई थी, इतनी कि दूरबीन से देखा जा सके और इतनी नहीं कि निशाना पक्का हो।
वह खुले में नहीं आया। वह गन्ने के किनारे-किनारे चला और बकरी से पंद्रह क़दम दूर रुक गया, आधा भीतर आधा बाहर।
शिवपाल ने बंदूक़ उठाई और फिर नहीं चलाई।
इसकी वजह साफ़ थी। जानवर उस कोण पर था जिसमें गोली उसके पार निकलकर गन्ने में जाती, और उस रात गन्ने में दो आदमी थे।
यह उसे मालूम था। पाँच बजे उसने उन्हें ख़ुद देखा था, कटाई करते हुए, और उसने उन्हें आवाज़ भी दी थी और उन्होंने हाथ हिला दिया था। हाथ हिलाने का मतलब हाँ भी हो सकता है और सुन लिया भी।
तेंदुआ वहाँ ग्यारह मिनट खड़ा रहा।
ग्यारह मिनट में रोशनी उतनी ही जाती है जितनी जानी होती है। आठवें मिनट में शिवपाल को उसका सिर दिखना बंद हो गया और वह सिर्फ़ आकार देख पा रहा था।
बारहवें मिनट में जानवर आगे बढ़ा और बकरी की तरफ़ मुड़ा, और उसी में वह खुल गया, और उसके पीछे मैदान आ गया।
शिवपाल ने तब गोली चलाई।
जानवर वहीं गिरा और उठा नहीं। बाद में देखा गया तो वह मादा थी, चार बरस की, और पेट ख़ाली।
बाएँ अगले पंजे के ऊपर, कलाई से थोड़ा ऊपर, माँस के भीतर तार का एक टुकड़ा धँसा हुआ था। उसके चारों तरफ़ का माँस पक चुका था और उस पंजे की उँगलियाँ ठीक से खुल नहीं रही थीं।
वह तार शिवपाल ने काटकर निकाला और अपनी जेब वाले टुकड़े के साथ रख लिया। दोनों एक ही मोटाई के थे।
वह मोटाई उस तार की है जो चीनी मिल फ़सल के मौसम में खेत घेरने के लिए बाँटती है।
यह कोई सुराग़ नहीं है, क्योंकि वह तार उस इलाक़े के आधे खेतों पर लगा हुआ है। शिवपाल ने इसीलिए इसका ज़िक्र रिपोर्ट में नहीं किया। रिपोर्ट में लिखने से एक ही चीज़ होती है कि कुछ दिन तक फंदे उतार दिए जाते हैं, और उसके बाद सूअर वापस आते हैं और फंदे भी वापस आते हैं।
अगले दिन जानवर गाँव में रखा गया, जैसा हमेशा होता है।
दोपहर तक चार सौ लोग आ चुके थे। ब्लॉक से भी लोग आए और अख़बार वाला भी आया।
तस्वीर खिंची। तेंदुआ ज़मीन पर, शिवपाल एक तरफ़, नंदलाल दूसरी तरफ़, और पीछे तीन क़तारों में गाँव के लोग।
बालकृष्ण सबसे आगे वाली क़तार में था, बाएँ से तीसरा, और उसने अच्छे कपड़े पहन रखे थे।
उसके खेत की मेड़ पर उस बरस का घेरा उसी तार का था और वह तार अभी भी वहीं लगा हुआ है। यह उसे मालूम है। तस्वीर में उसके पैरों से चार हाथ दूर वह पंजा है जिसमें उसी तार का एक टुकड़ा तीन बरस से धँसा हुआ था। यह उसे मालूम नहीं है, और तस्वीर में खड़े किसी भी आदमी को मालूम नहीं है।