इंदौर जंक्शन के खोया-पाया कमरे में तीन अलमारियाँ थीं और तीनों भरी रहती थीं। सुधीर की नौकरी यह थी कि जो चीज़ आए, उसे नंबर दे, कॉपी में लिखे, और छह महीने रखे। छह महीने बाद जो न छूटे, वह नीलाम हो जाता है। इस कमरे में लोग अपनी सबसे ज़रूरी चीज़ें भूल जाते हैं। यह बात सुधीर ने नौकरी के पहले साल में सीख ली थी।

कॉपी में चार ख़ाने थे। चीज़ का नाम, मिलने की जगह, तारीख़, और लाने वाले का नाम। आख़िरी ख़ाना अक्सर ख़ाली रहता है, क्योंकि ज़्यादातर चीज़ें सफ़ाई वाले लाते हैं और उनके नाम कोई नहीं पूछता। सुधीर पूछता था। यह उसकी आदत थी, नियम नहीं।

सावन में एक अटैची आई, प्लेटफ़ार्म चार से। भीतर बच्चों के कपड़े थे, एक कॉपी, और जूते। जूते दो थे और दोनों बाएँ पैर के। सुधीर ने उन्हें दो बार देखा। दो बाएँ जूते का मतलब है कि कहीं दो जोड़े थे, और किसी ने जल्दी में उठाए।

सच्चाई की पहली दरार

लाने वाले का नाम उसने पूछा और लिख लिया। नाम था बंसी। नाम जाना-पहचाना लगा, इसलिए उसने पुरानी कापियाँ निकालीं। तीन साल में बंसी नाम चार बार था। चारों बार प्लेटफ़ार्म चार। चारों बार रात की गाड़ी के बाद। और चारों बार अटैची में बच्चों का सामान।

सुधीर ने चारों तारीख़ें एक काग़ज़ पर लिखीं। बीच का फ़र्क़ बराबर नहीं था, पर चारों गर्मी की छुट्टियों में थीं। छुट्टियों में गाड़ियाँ भरी रहती हैं और प्लेटफ़ार्म पर बच्चे ज़्यादा होते हैं। बात इतनी सीधी थी कि सोचने में डर लगा।

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अटैची छह महीने बाद नीलाम होनी थी, पूस की सत्रह तारीख़ को। नीलामी के बाद चीज़ें बिक जाती हैं और कॉपी में सिर्फ़ इतना रहता है कि बिक गईं। पहले की तीन अटैचियाँ बिक चुकी थीं। सुधीर ने खोजा और पाया कि उनके बारे में अब कुछ नहीं बचा। सिर्फ़ नाम बचा था, कॉपी में, चार बार।

नीलामी की अपनी अलग कॉपी होती है, मोटी, लाल जिल्द वाली, और वह स्टेशन अधीक्षक के कमरे में रहती है। सुधीर ने बहाने से वह माँगी और तीनों पुरानी अटैचियों के नंबर ढूँढे। तीनों एक ही ख़रीदार को गई थीं, एक ही नाम पर, जो कबाड़ का काम करता था। नाम बंसी नहीं था। पता वही मोहल्ला था जो बंसी ने कॉपी में लिखवाया था। सुधीर ने कॉपी लौटा दी और उस दिन खाना नहीं खाया।

एक शाम बंसी ख़ुद आया। वह कुछ लेने नहीं आया था। उसने कहा कि उसे लगा कोई चीज़ छूट गई है, और फिर उसने अलमारी की तरफ़ देखा, फिर मेज़ पर खुली कॉपी की तरफ़। सुधीर ने कॉपी बंद नहीं की, क्योंकि बंद करना बता देता। बंसी दो मिनट खड़ा रहा और चला गया।

जो छिपाया जा रहा था

रेलवे पुलिस की चौकी उसी बरामदे में थी। पर सुधीर के पास सुराग़ नहीं था, सिर्फ़ एक नाम था जो चार बार लिखा था, और वह नाम उसने ख़ुद लिखा था, अपने हाथ से, बिना कोई पहचान देखे। कोई पूछता कि पहचान क्यों नहीं देखी, तो जवाब नहीं था। तीन अटैचियाँ बिक चुकी थीं और उन्हें नीलामी में उसी ने भेजा था।

उसने अटैची को नीलामी की सूची से नहीं हटाया, क्योंकि हटाने का अधिकार उसे नहीं था। उसने उससे ज़्यादा बुरा काम किया। चारों पन्नों की नक़ल उसने हाथ से उतारी, दो प्रतियाँ बनाईं, एक चौकी में दी और एक भोपाल मंडल के दफ़्तर में डाक से भेज दी। नक़ल उतारना मना है। कॉपी सरकारी रिकॉर्ड है और उसकी नक़ल बाबू नहीं कर सकता।

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जाँच बैठी। जाँच पहले सुधीर की हुई, क्योंकि सबसे पहले वही सामने था। तीन महीने वेतन रुका रहा। फिर बंसी उठाया गया, और उसके साथ दो और लोग, और मामला इंदौर से निकलकर कहीं और चला गया, जहाँ सुधीर की पहुँच नहीं थी।

जाँच में उससे एक ही सवाल बार-बार पूछा गया। अगर चार बार शक हुआ, तो पहली बार क्यों नहीं बोला। सुधीर के पास इसका ईमानदार जवाब था और उसने वही दिया। पहली तीन बार उसने नाम पढ़ा ही नहीं था। उसने सिर्फ़ लिखा था। लिखना और पढ़ना एक काम नहीं है, और यह बात उसे उनतालीस साल की उम्र में समझ आई।

तबादला उज्जैन हो गया, उसी काम पर, छोटे कमरे में। किसी ने यह नहीं कहा कि यह सज़ा है, और किसी ने यह भी नहीं कहा कि नहीं है। अख़बार में ख़बर छपी, चार लाइन, और उसमें खोया-पाया कमरे का ज़िक्र नहीं था।

उज्जैन के कमरे में दो अलमारियाँ हैं। सुधीर अब भी लाने वाले का नाम पूछता है और अब भी लिखता है, हालाँकि अब वह जानता है कि यह ख़ाना ख़ाली छोड़ा जा सकता है और कोई टोकेगा नहीं। पिछले महीने एक अटैची आई जिसमें बच्चों के कपड़े थे। जूते जोड़े में थे। सुधीर ने उन्हें फिर भी दो बार देखा।