छत की ढलाई एक दिन का काम है और उसे बीच में रोका नहीं जाता। कंक्रीट एक बार गिरना शुरू हो तो शाम तक लगातार गिरनी चाहिए, क्योंकि सुबह की पड़ी और शाम की पड़ी कंक्रीट आपस में जुड़ती नहीं, बस एक-दूसरे से सटकर खड़ी रह जाती है। उसे जोड़ कहते हैं। इदरीस चौबीस साल से मिस्त्री था और उसे यह किसी को समझाने की ज़रूरत कभी नहीं पड़ी। इस लाइन में सब जानते हैं।
काम ज्ञानचंद के मकान का था। नीचे की छत ग्यारह साल पहले पड़ी थी और अब ऊपर दो कमरे बनने थे, क्योंकि जेठ में लड़के की शादी थी और आने वालों को बैठाने की जगह चाहिए थी। साढ़े नौ सौ फुट की छत, अस्सी बोरी सीमेंट, छब्बीस आदमी, एक मिक्सर और एक वाइब्रेटर किराए पर। सब एक दिन में। कुल पैंसठ हज़ार में तय हुआ था। इदरीस के साल का सबसे बड़ा काम यही था।
एक बात उसे शुरू से खटक रही थी। दो साल पहले उसी मकान की बग़ल में नाली खोदते हुए उसने नींव देखी थी। खंभे नौ गुणा नौ के थे और उनमें दस मिलीमीटर की चार सरिया, और नींव ढाई फुट पर। एक मंज़िल के लिए यह ठीक है। दो के लिए नहीं। ग्यारह साल पहले वह मकान एक ही मंज़िल का सोचकर बनाया गया था और इदरीस को यह देखते ही समझ आ गया था।
चैत में उसने ज्ञानचंद से यह कहा भी था, आँगन में खड़े होकर, बिना किसी और के सामने। ज्ञानचंद ने कहा कि खंभे मज़बूत हैं और उन्हें बनवाने वाला भी कोई कच्चा आदमी नहीं था। इदरीस ने बात आगे नहीं बढ़ाई और इसकी वजहें साफ़ थीं। वह इंजीनियर नहीं था। ऐसी बात वह पहले भी दो बार कह चुका था। दोनों बार मकान खड़े हैं। और पैंसठ हज़ार पर उसके ग्यारह आदमियों का महीना टिका था।
ढलाई वाले दिन काम पौने छह बजे शुरू हुआ। मिक्सर आँगन में, रेत और गिट्टी गेट के बाहर, सीढ़ी वाली लाइन पर ग्यारह आदमी, और ऊपर छह। तसले हाथ से हाथ जाते हैं। वे रुकते नहीं। बीच में एक आदमी सिर्फ़ गिनती बोलता रहता है ताकि लय न टूटे। नौ बजे तक आधी छत पड़ चुकी थी। सब ठीक चल रहा था।
साढ़े पाँच बजे इदरीस ने नीचे वाले कमरे में बल्लियाँ लगाई थीं और हर बल्ली के नीचे की पच्चर ख़ुद ठोकी थी। यह उसकी आदत थी। उसी से यह पकड़ में आया। साढ़े ग्यारह बजे वह पानी पीने नीचे उतरा और उसे बीच वाली क़तार की तीन पच्चरें ढीली दिखीं। इतनी ढीली कि दो उँगलियों से खिंच आईं। उसने चौथी भी देखी। बल्ली तब ढीली पड़ती है जब उसके नीचे वाली चीज़ बैठ जाए।
उसने ऊपर जाकर आदमियों को छत से उतार दिया और मिक्सर बंद करवा दिया। जो तसले हाथ में थे वे नीचे रख दिए गए। यह सब दो मिनट में हुआ। किसी को कुछ समझ नहीं आया। आधी छत पड़ चुकी थी, गीली, और उस पर जोड़ बनना अब तय था। साढ़े ग्यारह बजे रुकी ढलाई का मतलब है कि वह पूरी छत तोड़नी पड़ेगी।
आँगन में जो हुआ, उसमें सबसे कम बोलने वाला ज्ञानचंद था। हिसाब दूसरों ने लगाकर सुना दिया। तोड़ना, मलबा, चालीस बोरी सीमेंट का नुक़सान, सरिया का आधा, ग्यारह दिन का काम। एक लाख साठ हज़ार। जेठ की तारीख़ सिर पर थी। तब इदरीस ने खंभों वाली बात दोबारा कही, उन सबके सामने, और उस दिन उस बात को किसी ने वैसे नहीं सुना जैसे वह कही गई थी।
एक बात इदरीस को उस शाम मालूम हुई। नगर पालिका वाले पिछले मंगलवार उसी दीवार के साथ-साथ नाली की पाइप डालने के लिए खाई खोद गए थे और मिट्टी वापस डालकर दबाई नहीं थी। बीच वाली क़तार की बल्लियाँ उसी पट्टी पर खड़ी थीं। किसी ने उससे यह कहा ज़रूर था। सुबह पौने छह बजे। वह उस वक़्त गिट्टी की तरफ़ देख रहा था।
अब सब कुछ आमने-सामने था। बल्ली उस मिट्टी की वजह से बैठी थी, जो सबको दिख रही थी, और खंभों वाली बात की कोई गवाही नहीं थी। क़स्बे में यह बात इस तरह चली कि आदमी ने अपनी ग़लती छिपाने के लिए आधी छत छोड़ दी और ऊपर से मालिक को डरा भी दिया। पैंसठ हज़ार में से उसे नौ हज़ार मिले। काम के दिनों के। छत सोहनलाल ने ग्यारह दिन में तोड़कर दोबारा डाली, बिलकुल वैसी ही, बिना एक भी खंभा जोड़े।
शमीम उसकी बहन का लड़का था और सात साल से उसके साथ था। वह सोहनलाल के साथ चला गया और फिर लौटा नहीं। दो और आदमी भी गए। इदरीस पाँच महीने बैठा रहा। फिर चारदीवारी और पलस्तर के छोटे काम लेने लगा। उस साल उसने छत का कोई काम नहीं लिया, और बाद में भी सिर्फ़ वहीं लिया जहाँ नीचे की छत उसने ख़ुद डाली हो। इससे उसका आधा काम हमेशा के लिए चला गया।
शादी जेठ में ही हुई और खाना उसी छत पर लगा। दो सौ लोग, टेंट का लोहे का ढाँचा, एक जनरेटर और एक वाटर कूलर। सब ऊपर। इदरीस भी बुलाया गया था, क्योंकि उस गली में मकान बनाने वाले मिस्त्री को बुलाया जाता है। वह पूरी शाम नीचे वाले कमरे में दरवाज़े के पास खड़ा रहा और खाना खाए बिना चला गया।
उसके बाद तीन बरसात गुज़रीं और छत को कुछ नहीं हुआ। दूसरे साल ऊपर एक हज़ार लीटर की टंकी भी चढ़ा दी गई। कुछ नहीं हुआ। और यही सबसे बुरा था, क्योंकि जो बात साबित नहीं होती वह धीरे-धीरे झूठ मान ली जाती है, और इदरीस के पास उसे साबित करने का कोई तरीक़ा कभी नहीं आया।
नौ साल बाद ज्ञानचंद को दूसरी मंज़िल चढ़ानी थी। उसने सोहनलाल को बुलाया और सोहनलाल ने मना कर दिया। उसके बाद वह इदरीस के घर आया। इदरीस उसके साथ गया, नीचे वाले कमरे में खड़ा होकर छत देखी, बाहर आकर खंभे नापे, और कहा कि इस पर तीसरी छत नहीं जाएगी। ज्ञानचंद ने बहस नहीं की। उसने भीतर से चाय मँगवा ली और दोनों आँगन में बैठकर पीते रहे।