दुकान सँभालने के पहले महीने में नितिन को एक ख़र्च मिला जो उसकी समझ में नहीं आया। बर्फ़। रोज़ दो बार, सुबह साढ़े छह और दोपहर ढाई बजे, गफ़ूर की बर्फ़ फ़ैक्ट्री से बारह-बारह किलो। सत्तर रुपये का एक फेरा। चार साल से लगातार। दुकान में एक सौ पैंसठ लीटर का फ़्रिज रखा था और वह चलता भी था।

प्रेमशंकर इकसठ के थे और अगहन में एक रात नींद में चले गए। दुकान ब्लॉक अस्पताल के गेट के ठीक सामने थी और चौंतीस साल से वहीं थी। लोहे का काउंटर, पीछे तीन आलमारियाँ, नीचे फ़्रिज, और दीवार पर एक पंखा जो सिर्फ़ काउंटर की तरफ़ चलता था। एक बात और थी जो सब जानते थे। प्रेमशंकर ग्यारह बजे के बाद सुई नहीं देते थे। कहते थे कि शाम को पाँच बजे आना। लोग समझते थे कि बूढ़ा दोपहर में सोता है।

नितिन छब्बीस का था और जयपुर में दवाओं की एक थोक दुकान पर काम करता था। अगहन के बाद वह लौट आया, क्योंकि घर में दुकान के अलावा कुछ नहीं था। हिसाब उसने वैसे ही लगाया जैसे कोई भी लगाता। चार हज़ार दो सौ महीने के। पचास हज़ार साल के। पूरा फ़्रिज बर्फ़ से भरा रहता था और उसमें रखी चीज़ें वैसे भी फ़्रिज में ही थीं। दूसरे महीने उसने गफ़ूर को मना कर दिया। गफ़ूर ने गेट पर एक बार पूछा था और नितिन ने कहा कि फ़्रिज चलता है।

तीन महीने दुकान सामान्य चली। अस्पताल का अपना स्टॉक हर महीने की दस तारीख़ तक ख़त्म हो जाता था और उसके बाद लोग सामने वाली दुकान पर आते थे। कुत्ते के काटने वाली सुई साढ़े तीन सौ की एक थी और पूरा कोर्स चार सुइयों का, अट्ठाईस दिन में। ब्लॉक में कुत्ते बहुत थे और गर्मियों में और बढ़ जाते थे। यह उस दुकान की सबसे पक्की बिक्री थी।

चैत में हरिनाथ की आठ साल की लड़की को गली के कुत्ते ने काटा। कोहनी के नीचे, दाहिने हाथ पर। चारों सुई उसी दुकान से गईं और चारों अस्पताल में रामनिवास ने लगाईं। तारीख़ें पूरी थीं और कोई सुई छूटी नहीं। सावन में लड़की को बुख़ार आया और चार दिन में सब ख़त्म हो गया। गाँव में कहा गया कि तेज़ बुख़ार था। कुत्ते वाली बात और चार महीने बाद के बुख़ार को कोई नहीं जोड़ता। वह बीमारी शरीर में महीनों चुपचाप बैठी रहती है, और जिस दिन बाहर आती है उस दिन कोई दवा काम नहीं करती। उस गली में इस पर कोई बात ही नहीं चली। सुइयाँ लगी थीं। पूरी लगी थीं। यह सबको मालूम था।

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हरिनाथ तीन हफ़्ते बाद दुकान पर आया, खाँसी की दवा लेने। बात करते-करते उसने कुत्ते वाली बात बताई और तारीख़ें भी, क्योंकि वे उसे याद थीं। नितिन ने दवा दी, पैसे लिए, और आदमी के जाने तक काउंटर पकड़े खड़ा रहा। वे तारीख़ें उसे भी याद थीं। उन्हीं दिनों वह बर्फ़ बंद कर चुका था।

उसी शाम उसने एक सौ बीस रुपये का थर्मामीटर ख़रीदा और फ़्रिज के भीतर, बीच वाले ख़ाने में रख दिया। उस गली में बिजली ग्यारह बजे जाती है और चार बजे आती है। जेठ में पाँच घंटे। अगले दिन चार बजकर दस मिनट पर उसने फ़्रिज खोला और पारा उन्नीस पर था। सुई दो से आठ के बीच रहनी चाहिए। इससे ऊपर वह पानी है।

फिर पूरी बात एक साथ खुल गई। पचास हज़ार साल के, चार साल तक, इसलिए कि रोज़ पाँच घंटे बंद रहने वाला फ़्रिज ठंडक नहीं है। बर्फ़ थी। और ग्यारह बजे के बाद सुई न देने की वजह भी वही थी, क्योंकि ग्यारह बजे बिजली जाती थी और डिब्बा खोलने का मतलब था ठंडक निकल जाना। प्रेमशंकर ने यह बात नितिन को कभी समझाई नहीं थी। उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा था कि बर्फ़ रोज़ आएगी। नितिन ने उसे बूढ़े की आदत मान लिया था।

अब गिनती का सवाल था। तीन महीने में इकतीस सुइयाँ गई थीं। कोर्स अट्ठाईस दिन का होता है, इसलिए जो लोग बीच में थे वे अब भी आ रहे थे, और अस्पताल में सुई गुरुवार को लगती है। गुरुवार दो दिन बाद था।

रास्ते दो ही थे और दोनों साफ़ दिख रहे थे। चुप रह जाए, तो गुरुवार आ जाएगा। बोल दे, तो उस क़स्बे में दुकान का नाम वह हो जाएगा जिससे कोई नहीं उबरता, और उस दुकान पर उसकी माँ और बहन बैठी थीं। दो रातें उसने इसी में काटीं।

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गुरुवार की सुबह, अस्पताल के गेट पर लाइन लगने से पहले, नितिन ने फ़्रिज ख़ाली किया। सारी शीशियाँ एक बाल्टी में डालीं और गेट के सामने पत्थर पर तोड़ दीं, जहाँ से पंद्रह-बीस लोग देख सकते थे। इकतालीस हज़ार का माल था। फिर उसने शटर गिराया और सवा नौ की बस से ज़िले चला गया।

लौटा शाम चार बजे, एक थर्मोकोल का डिब्बा और नया स्टॉक लेकर। साठ हज़ार उसे गफ़ूर ने दिए थे, नक़द, बिना कुछ पूछे, क्योंकि गफ़ूर चार साल तक उस दुकान पर दिन में दो बार आया था और उसे बर्फ़ का मतलब सबसे पहले समझ आया।

जिन चार घरों के बच्चे बीच कोर्स में थे, नितिन उनमें से हर एक के पास ख़ुद गया और पूरा कोर्स दोबारा, बिना पैसे के, शुरू करवाया। तीन मान गए। हरिनाथ ने दरवाज़ा नहीं खोला। रामनिवास को उसने थर्मामीटर वाली बात बताई और यह भी कि अस्पताल का अपना फ़्रिज उसी लाइन पर है और उसका स्टेबलाइज़र तीन साल से जला हुआ है। उस पर आज तक कुछ नहीं हुआ। दुकान की आधी बिक्री ग्यारह महीने बाद लौटी, और सबसे पहले वही लोग लौटे जिन्होंने उसे शीशियाँ तोड़ते देखा था।

दुकान में इनवर्टर लग गया है। इनवर्टर फ़्रिज को दो घंटे चलाता है, पाँच नहीं, इसलिए गफ़ूर का ठेला अब भी दिन में दो बार वहाँ रुकता है, बारह-बारह किलो। उस क़स्बे में गफ़ूर सिर्फ़ दो जगह बर्फ़ पहुँचाता है। एक नितिन की दुकान, और दूसरी अस्पताल की कैंटीन, ठंडी बोतलों के लिए।