सियार को अपनी चतुराई पर बहुत भरोसा था, और उसके साथी उसे इस भरोसे में बनाए रखते थे। वह कोई तरकीब सुझाता, साथी वाह-वाह करते, और तरकीब चल जाती। सालों से यही हो रहा था। सियार ने कभी यह नहीं सोचा कि तरकीबें चल क्यों रही हैं, और यही आगे चलकर उसके काम आने वाला नहीं था।
साथी तीन थे। दो सियार और एक गीदड़, और तीनों उससे छोटे थे, उम्र में भी और क़द में भी।
तीनों में एक बात एक जैसी थी। वे तीनों उससे पूछते कुछ नहीं थे। वह तरकीब बताता और वे चल देते, और अगर तरकीब काम कर जाती तो वे कहते कि इसे तो सिर्फ़ यही सोच सकता था। अगर काम न करती तो वे इसका ज़िम्मा हालात पर डाल देते, और सियार उन्हें रोकता नहीं था।
तरकीबें ज़्यादातर एक ही किस्म की होती थीं। किसी को उस तरफ़ भेजो जिधर वह जाना नहीं चाहता, और उससे पहले उसे यह बता दो कि उधर कुछ अच्छा है।
यह चलता था, और चलने के पीछे सियार की चतुराई नहीं थी। जंगल में ज़्यादातर जानवर एक-दूसरे पर शक नहीं करते, क्योंकि शक करने में भी मेहनत लगती है।
क्वार में जंगल के उस हिस्से में एक बकरी आ गई। वह गाँव से भटककर आई थी, गले में रस्सी का टुकड़ा लटका हुआ था, और वह बड़ी थी। सियारों के हिसाब से बहुत बड़ी।
सियार ने तरकीब बता दी। बकरी को नाले वाली ढलान की तरफ़ ले जाना है, जहाँ ज़मीन ढीली है और वह फिसलेगी।
तरकीब में कोई खोट नहीं थी। उस ढलान पर हिरन तक सँभलकर उतरते हैं और बरसात के बाद वहाँ की मिट्टी दो हाथ नीचे तक भुरभुरी रहती है। सियार ने वहाँ खरगोश गिरते देखे थे और एक बार एक नीलगाय का बच्चा भी।
वह बकरी के पास गया और उसने वही किया जो वह हमेशा करता था। उसने बताया कि उस तरफ़ अच्छी घास है।
बकरी उसके साथ चल दी।
ढलान पर बकरी फिसली नहीं। वह गाँव की बकरी थी। ढलान उसके लिए रोज़ की बात थी। वह नीचे उतरी, घास चरी, और ऊपर आ गई।
बकरी के खुर आगे से बँटे होते हैं और वे ढलान पर पकड़ बनाते हैं। यह बात सियार को मालूम नहीं थी, और मालूम होने की कोई वजह भी नहीं थी, क्योंकि उस जंगल में बकरी पहले कभी नहीं आई थी।
साथी झाड़ी के पीछे इंतज़ार करते रहे। कुछ नहीं हुआ।
अगले दिन सियार ने दूसरी तरकीब बताई। इस बार बकरी को कँटीली झाड़ी के बीच वाले रास्ते से ले जाना था।
बकरी वहाँ से भी निकल गई। बकरियाँ काँटों में से निकलती हैं। यह उन्हीं का काम है।
दूसरे दिन शाम को गीदड़ ने कहा कि शायद यह बकरी कुछ ज़्यादा ही समझदार है। सियार ने कहा कि बकरी समझदार नहीं है। यह सही था। बकरी ने उन तीन दिनों में एक बार भी यह नहीं सोचा कि उसे कहीं ले जाया जा रहा है। वह वहाँ गई जहाँ घास थी, और घास वहीं थी जहाँ सियार उसे भेज रहा था।
तीसरे दिन सियार ने कोई तरकीब नहीं बताई। उसने कहा कि आज देख लेते हैं। तीसरा दिन ख़ाली गया। चौथा भी। पाँचवें दिन साथी सुबह नहीं आए, और सियार ने उन्हें बुलाया भी नहीं।
साथियों ने पहली बार उससे सवाल किया। उन्होंने पूछा कि अगली तरकीब क्या है। सियार ने कहा कि सोच रहा हूँ।
वह सचमुच सोच रहा था, और यह उसके लिए नई बात थी। इससे पहले तरकीब अपने आप आ जाती थी, और उसे यह लगता था कि वह उसे बनाता है।
असल में वह उसे बनाता नहीं था। वह सिर्फ़ यह देखता था कि सामने वाला किस बात पर चल देगा, और यह देखना उन जानवरों के साथ आसान था जिन्हें वह बचपन से जानता था।
बकरी को वह नहीं जानता था।
इसके बाद के दिनों में उसने बकरी को देखना शुरू किया। वह किस वक़्त पानी पर आती है, किस तरफ़ से आती है, आवाज़ पर सिर उठाती है या नहीं। यह काम उसने पहले किसी के साथ नहीं किया था, क्योंकि पहले ज़रूरत नहीं पड़ी थी।
चौथे दिन तक बकरी उस हिस्से से चली गई। किसी तरकीब की वजह से नहीं। घास ख़त्म हो गई थी।
गीदड़ ने उस शाम कहा कि हमने उसे भगा दिया। सियार ने इसे ठीक नहीं किया। उसने बस सिर हिला दिया, और यह पहली बार था कि उसने अपने नाम पर कोई ऐसी चीज़ ली जो उसने की नहीं थी।
साथियों ने इसके बाद भी उसकी बात मानी और वाह-वाह भी की। पर उनमें से एक ने, कुछ हफ़्ते बाद, एक तरकीब पर सवाल कर दिया। सिर्फ़ इतना पूछा कि यह चलेगी क्यों।
सियार के पास जवाब नहीं था। पहले भी नहीं था। फ़र्क़ इतना था कि पहले किसी ने पूछा नहीं था।
गीदड़ ने वह सवाल फिर कभी नहीं पूछा। उसे पूछने की ज़रूरत भी नहीं पड़ी, क्योंकि एक बार पूछ लेने के बाद बाक़ी सब भी सुनने लगे थे कि जवाब आता है या नहीं।
अब वह तरकीब बताने से पहले सोचता है, और इसमें वक़्त लगता है, और उस वक़्त में साथी अपनी बात रख देते हैं। कई बार उनकी बात बेहतर होती है। यह बात सियार को खलती है और वह इसे किसी पर ज़ाहिर नहीं करता।