शेर की गरज से पूरा जंगल गूँज उठता था, और यही उसकी सबसे बड़ी दिक़्क़त थी। जहाँ वह जाता, वहाँ से जानवर हट जाते। वह पानी पीने पहुँचता तो घाट ख़ाली हो जाता। हर बार। वह छाँव में बैठता तो पेड़ के नीचे कोई नहीं आता। जंगल में उसकी इज़्ज़त बहुत थी। पास बैठने कोई नहीं आता था।
इज़्ज़त का मतलब वहाँ यही था कि कोई उसके रास्ते में नहीं आता। कोई उससे बहस नहीं करता। जो शिकार उसने मारा हो, उसके पास कोई नहीं फटकता, चाहे वह छोड़कर चला ही क्यों न जाए। यह सब उसे मिला हुआ था और इसमें से कोई भी चीज़ ऐसी नहीं थी जो उसने माँगी हो।
उसने कुछ चीज़ें आज़माईं। उसने गरजना कम कर दिया। इससे कुछ नहीं हुआ, क्योंकि जानवर आवाज़ से नहीं हटते थे। वे गंध से हटते थे, और गंध पर उसका ज़ोर नहीं था।
फिर उसने वक़्त बदला। वह घाट पर तब जाने लगा जब सब जा चुके होते थे। इससे घाट ख़ाली मिलने लगा, जो पहले भी मिलता था।
एक बार उसने दूर से आवाज़ दी थी, बिना गरजे, सिर्फ़ बुलाने के लिए। सामने वाली झाड़ी में तीन हिरन थे। तीनों भाग गए। इसके बाद उसने बुलाना छोड़ दिया। उसे यह दिखा कि उसके पास बुलाने वाली कोई आवाज़ है ही नहीं। जो भी वह निकाले, दूसरी तरफ़ उसका एक ही मतलब निकलता है।
दूसरे बरस की गर्मी में एक खरगोश उसके सामने वाली मेड़ पर बैठने लगा।
वह हटता नहीं था। शेर आता, पानी पीता, बैठता, और खरगोश उसी मेड़ पर बैठा रहता, कुछ दूरी पर।
पहले तीन दिन शेर ने उसकी तरफ़ देखा तक नहीं, यह सोचकर कि आज नहीं तो कल भाग जाएगा। चौथे दिन उसने देखा। खरगोश ने भी उसकी तरफ़ देखा और फिर घास खाने लगा। पाँचवें दिन शेर ने अपनी जगह थोड़ी बदलकर देखी, यह जाँचने के लिए कि खरगोश भी बदलता है या नहीं। खरगोश ने जगह नहीं बदली। एक क़दम भी नहीं।
पहले शेर को लगा कि यह बहादुरी है। बाद में उसे यह ठीक लगने लगा कि यह बहादुरी नहीं थी।
खरगोश ने हिसाब लगाया हुआ था। एक शेर को एक दिन में जितना चाहिए, उतना एक खरगोश से नहीं मिलता। जिस शिकार के पीछे दौड़ने में जितनी ताक़त लगे, उससे कम मिले, वह शिकार किया ही नहीं जाता। खरगोश उस हद के नीचे था और उसे यह मालूम था।
यह हिसाब खरगोश ने ख़ुद नहीं बनाया था। यह उसकी माँ ने उसे बताया था, और उसकी माँ को उसकी माँ ने। खरगोशों में यह बात चलती है, पर उस पर अमल कोई नहीं करता, क्योंकि हिसाब सही होने और हिसाब पर बैठे रहने में बहुत फ़र्क़ है।
यह हिसाब एक बार जाँचा भी गया। तीसरी गर्मी में शेर को चार दिन कुछ नहीं मिला और चौथे दिन वह घाट पर आया तो उसकी हालत ख़राब थी। खरगोश उस दिन भी वहीं था, उसी जगह। शेर ने उस दिन उसकी तरफ़ देखा और काफ़ी देर देखा। फिर वह पानी पीकर लौट गया। कुछ नहीं हुआ। भूखे शेर के लिए भी हिसाब वही रहता है, और यही उस हिसाब की ख़ूबी है।
यानी वह डर से नहीं बैठा था और भरोसे से भी नहीं बैठा था। वह गिनती से बैठा था।
शेर को यह जानकर बुरा नहीं लगा। उसे इससे फ़र्क़ ही नहीं पड़ा।
वे दोनों बात नहीं करते थे, कम से कम पहले साल तो नहीं। खरगोश बैठा रहता और शेर पानी पीता। फिर धीरे-धीरे कुछ बातें होने लगीं, ज़्यादातर मौसम की और पानी की।
खरगोश ने एक बार शेर को बताया कि ऊपर वाला नाला कहाँ से आता है, और शेर ने यह पहली बार सुना, हालाँकि वह उस नाले से बरसों से पानी पी रहा था।
यह इसलिए हुआ कि शेर कभी ऊपर की तरफ़ गया ही नहीं था। उसे ज़रूरत नहीं पड़ी थी। पानी नीचे आता है और वह नीचे बैठा रहता है। खरगोश ऊपर तक जाता है, क्योंकि खरगोश को घास चाहिए और घास ऊपर बेहतर है।
शेर ने भी उसे एक बात बताई, जो उसके काम की थी। उसने बताया कि खुली जगह पर तेंदुआ हवा के उस तरफ़ से आता है, हमेशा, और यह बात खरगोशों को नहीं मालूम होती।
यह उसने बिना माँगे बताई और इसमें उसका अपना कोई फ़ायदा नहीं था। दोनों में यह पहली बार हुआ था कि किसी ने दूसरे को ऐसी चीज़ दी जो लौटकर उसी के पास नहीं आती।
इसे दोनों में से किसी ने दोस्ती नहीं कहा। जंगल में यह शब्द बहुत सोच-समझकर चलाया जाता है।
बाक़ी जानवरों ने इस पर बात ज़रूर की। उनमें से किसी ने भी यह नहीं सोचा कि वे भी वहाँ बैठ सकते हैं। हिसाब उनके हक़ में नहीं था और यह उन्हें मालूम था।
कुछ ने कहा कि खरगोश पागल है। कुछ ने कहा कि शेर बूढ़ा हो रहा है। एक बंदर ने आगे जोड़ा कि दोनों में कोई सौदा हुआ होगा और खरगोश शेर को ख़बर देता है। यह आख़िरी बात सबसे ज़्यादा चली, क्योंकि वह सबसे समझ में आने वाली थी।
छह बरस यह चलता रहा।
खरगोश छह बरस जिया, जो उसकी जात के लिए बहुत है। उसके आख़िरी महीनों में शेर ने उसे मेड़ तक चढ़ते हुए देखा, धीरे-धीरे, दो बार रुककर। शेर ने अपनी जगह उस दिन भी नहीं बदली।
उन छह बरसों में एक चीज़ नहीं बदली। खरगोश मेड़ पर हमेशा एक ही जगह बैठता था, ग्यारह क़दम की दूरी पर। न एक क़दम पास। न एक क़दम दूर।
ग्यारह क़दम खरगोश के क़दम थे। शेर के तीन क़दम में वह दूरी ख़त्म हो जाती। छह बरस में उसने वे तीन क़दम एक बार भी नहीं उठाए।