शेर को हारने का अनुभव नहीं था। उसका कोई विरोधी ही नहीं था, इसलिए यह उसकी ख़ूबी नहीं, बस एक हक़ीक़त थी। जंगल में उससे भिड़ने कोई जाता ही नहीं था, इसलिए हार का सवाल कभी उठा ही नहीं। धीरे-धीरे उसे लगने लगा कि हारना उसके साथ हो ही नहीं सकता। यह दो अलग बातें हैं, पर शेर को यह फ़र्क़ किसी ने बताया नहीं था।
एक दिन शेर जंगल के राजा की तरह रॉयल अंदाज में घूम रहा था, जब उसने एक माकड़ (बंदर) को देखा। माकड़ था तो छोटा, लेकिन उसकी चतुराई के लिए वह जंगल में जाना जाता था। शेर ने माकड़ को देखकर उसे चुनौती दी, "तुम मुझसे क्या मुकाबला कर सकते हो? क्या तुम नहीं जानते कि मैं इस जंगल का सबसे ताकतवर जानवर हूं?"
बंदर जंगल में सबसे छोटा नहीं था, पर सबसे हल्का ज़रूर था। वह पेड़ों के ऊपर से चलता था और नीचे बहुत कम उतरता था। यही वजह थी कि उसे पूरे जंगल का नक्शा याद था: कौन सा रास्ता कहाँ मुड़ता है, कहाँ चढ़ाई है, और कहाँ से छोटा रास्ता निकलता है। शेर हमेशा सीधा चलता था, क्योंकि उसे कभी छोटे रास्ते की ज़रूरत नहीं पड़ी थी।
माकड़ हंसते हुए बोला, "हे शेर, तुम्हारी ताकत तो बहुत महान है, लेकिन मैं तुम्हें यह बताना चाहता हूं कि केवल ताकत से ही जीत नहीं मिलती। कभी-कभी समझदारी और चतुराई से भी बड़ी चुनौतियां जीती जा सकती हैं।"
शेर ने माकड़ की बातों को अनदेखा किया और कहा, "तुम मुझे समझाने की कोशिश कर रहे हो? मैं तुम्हें दिखाऊंगा कि ताकत ही सब कुछ है।" शेर ने अपने जबड़े खोले और माकड़ को डराने की कोशिश की, लेकिन माकड़ शांत था।
माकड़ ने शेर से कहा, "तुमसे भिड़ने की मेरी कोई इच्छा नहीं है, लेकिन मैं तुम्हें यह दिखाना चाहता हूं कि ताकत से ज्यादा जरूरी क्या है। तुम अपनी शक्ति को मानते हो, लेकिन तुम्हें इस दुनिया की एक सच्चाई समझनी होगी: 'अहंकार और शक्ति के अति प्रयोग से बहुत से बड़े संकट आ सकते हैं।' मैं चाहता हूं कि तुम मुझसे रेस करों।"
शेर ने कहा, "रेस? तुम तो मुझसे कहीं भी नहीं जीत सकते। लेकिन ठीक है, अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हारे साथ रेस करूंगा।" यह कहते हुए शेर ने माकड़ को चुनौती स्वीकार कर ली।
रेस की शुरुआत हुई, और शेर तेजी से दौड़ने लगा। माकड़ धीरे-धीरे, लेकिन समझदारी से रेस में शामिल हुआ। शेर को अपनी ताकत पर बहुत भरोसा था, और वह यह सोचने लगा कि माकड़ तो बहुत धीरे-धीरे दौड़ रहा है, इसलिए उसे किसी तरह की चिंता नहीं होनी चाहिए।
रास्ता जंगल के चारों ओर घूमकर उसी पेड़ तक आता था। शेर सीधे भागा। बंदर ऊपर से गया। डाल से डाल। वह तेज़ नहीं था। पर उसे रुकना नहीं पड़ता था। न झाड़ी काटनी पड़ती। न नदी पार करनी पड़ती। न चढ़ाई चढ़नी पड़ती।
जैसे-जैसे रेस आगे बढ़ी, शेर ने देखा कि माकड़ कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। शेर ने यह समझा कि माकड़ तो बहुत पीछे रह गया होगा, और अब उसे जीतने के लिए रुककर आराम करना चाहिए। शेर एक पेड़ के नीचे आराम करने के लिए लेट गया और सो गया।
लेकिन माकड़ ने अपनी चतुराई से रेस जारी रखी। वह किसी शोर से बचने के लिए छिपता हुआ धीरे-धीरे शेर से आगे बढ़ रहा था। माकड़ ने शेर के आराम करने का फायदा उठाया और रेस के अंतिम दौर में पहुंचने से पहले शेर को पीछे छोड़ दिया।
जब शेर की आँखें खुली, तो उसने देखा कि माकड़ रेस जीत चुका है। शेर बहुत हैरान हुआ और उसने माकड़ से पूछा, "तुमने यह रेस कैसे जीत ली? तुम्हारे पास तो मेरी जैसी ताकत नहीं थी, फिर भी तुम जीत गए!"
शेर ने चारों तरफ़ देखा। जानवर खड़े थे। कोई हँस नहीं रहा था। यह बात सबसे ज़्यादा चुभी। वे हँसते तो वह गुस्सा हो सकता था। पर वे बस देख रहे थे। चुपचाप। जैसे उन्हें इसी की उम्मीद थी।
माकड़ हंसते हुए बोला, "तुमने यह सोचा कि सिर्फ ताकत से ही कोई जीत सकता है, लेकिन तुम्हें यह समझना चाहिए कि जब तक तुम्हारा दिमाग शांत और समझदार नहीं होगा, तब तक तुम अपनी ताकत का सही उपयोग नहीं कर सकोगे। तुमने आराम करने का निर्णय लिया, जबकि मैंने अपनी चतुराई से रेस जारी रखी।"
शेर को माकड़ की बातों ने गहरी सोच में डाल दिया। उसने महसूस किया कि केवल ताकत ही सफलता की कुंजी नहीं हो सकती। उस दिन के बाद शेर ने अपने घमंड को छोड़ दिया और उसने यह समझा कि कभी-कभी हमें अपनी शक्ति और अहंकार का सही तरीके से इस्तेमाल करना चाहिए, ताकि हमें बिना किसी संकट का सामना करना पड़े।
तब से शेर ने एक आदत बना ली, जिसे उसने कभी आदत नहीं कहा। किसी काम में उतरने से पहले वह किसी न किसी से पूछ लेता था कि रास्ता कैसा है। ज़्यादातर वह बंदर से पूछता था। बंदर बता देता और फिर दोनों में से कोई इस बात का ज़िक्र नहीं करता।