जंगल के किनारे एक खेत था, जहाँ गाँव वाले मिर्च उगाते थे। जानवर उधर नहीं जाते थे। जो एक बार गया, वह दोबारा नहीं गया। शेर ने यह बात सुनी थी और उस पर ध्यान नहीं दिया था। उसे लगता था कि जंगल में उससे बड़ा कुछ नहीं है, और एक खेत तो बिलकुल भी नहीं। बाकी जानवर उस खेत का नाम आते ही चुप हो जाते थे। कोई बताता नहीं था कि वहाँ हुआ क्या था। शेर को यह चुप्पी हमेशा मज़ाक़िया लगती थी, और उसने कई बार कहा भी कि डरने वालों का जंगल में कोई काम नहीं।
मिर्च वहाँ खाने के लिए नहीं उगाई जाती थी, कम से कम जानवरों के लिए नहीं। गाँव वाले उसे बाड़ की तरह लगाते थे। भीतर मक्का थी, चना था, और वही चीज़ें थीं जिनके लिए जानवर खेत तक आते हैं। मिर्च बाहर की कतार में थी।
अगहन में उन्होंने एक काम और किया। खूँटों के बीच रस्सी बाँधी और उस रस्सी पर पिसी मिर्च और सरसों का तेल मिलाकर लेप दिया। यह तरीक़ा पुराना है और इसे इसलिए अपनाया जाता है कि रस्सी दिखती नहीं, और जो उसे तोड़कर भीतर घुसता है वह उसे मुँह से तोड़ता है।
शेर उस तरफ़ किसी फ़सल के लिए नहीं गया। वह एक नीलगाय के पीछे गया था और नीलगाय उधर मुड़ गई थी।
नीलगाय रस्सी के नीचे से निकल गई, क्योंकि वह जानती थी कि रस्सी कहाँ है। शेर उसके पीछे था और वह रुका नहीं।
रस्सी उसके मुँह पर लगी।
आगे जो हुआ उसमें कुछ भी हँसने लायक़ नहीं था। मिर्च आँख में गई और नाक में गई। आँख अपने आप बंद हो गई। और खुली नहीं। शेर ने पंजे से चेहरा रगड़ा, जिससे मिर्च और भीतर चली गई।
वह खेत से बाहर कैसे निकला, यह उसे ख़ुद ठीक से याद नहीं रहा। इतना याद रहा कि वह मेड़ से टकराया और एक बार गिरा भी।
नाला वहाँ से चार सौ क़दम पर था। उसने वह चार सौ क़दम बंद आँखों से तय किए। नाले में पहुँचकर उसने मुँह पानी में डाल दिया और काफ़ी देर वैसे ही पड़ा रहा।
दो दिन तक उसकी एक आँख नहीं खुली। तीसरे दिन खुली और लाल थी। उन दो दिनों में उसने शिकार नहीं किया।
दो दिन शेर शिकार न करे तो यह बात जंगल में सबसे पहले फैलती है। हिरन उस बीच खुलकर चरते रहे। इसका फ़ायदा उठाने की बात किसी ने नहीं छेड़ी। पर सबको मालूम था कि शेर कहाँ है और किस हाल में है।
जंगल ने यह सब देखा। बंदरों ने ऊपर से देखा और उन्होंने आपस में कुछ कहा भी होगा। पर शेर के सामने किसी ने इसका नाम तक नहीं लिया।
पहले उसे लगा कि यह डर है। शेर से कौन कहेगा।
फिर, चौथे या पाँचवें दिन, उसे वह बात दिखी जो शुरू से सामने थी। जंगल में और भी कई जानवर थे जो उस खेत से लौटे थे। उनसे कोई नहीं डरता। साही से कोई नहीं डरता। फिर भी साही ने भी कभी नहीं बताया कि उसके साथ वहाँ क्या हुआ था।
साही वाली बात उसे उसी हफ़्ते याद आई। दो बरस पहले साही तीन दिन अपने बिल से नहीं निकला था, और चौथे दिन जब निकला तो उसकी एक आँख सूजी हुई थी। किसी ने पूछा भी था। साही ने कहा था कि काँटे में कुछ फँस गया था। बात वहीं ख़त्म हो गई थी, और शेर ने उस वक़्त इस पर एक पल भी नहीं सोचा था।
चुप्पी डर की नहीं थी।
जो एक बार वहाँ जाकर आया, उसे यह बताना पड़ता कि वह वहाँ गया था। और यह बताना पड़ता कि एक रस्सी ने उसे हरा दिया। जंगल में यह दूसरी बात पहली बात से भारी पड़ती है।
एक बार उसने सोचा भी कि बता दे। फ़ायदा साफ़ था। जो जवान जानवर उधर चले जाते हैं, वे न जाते। फिर उसने यह सोचा कि बताने पर आगे क्या पूछा जाएगा। कितनी दूर तक कुछ नहीं दिखा था। गिरा कहाँ था। पानी में मुँह कितनी देर रखे रहा था।
कुछ हफ़्ते बाद एक जवान सियार ने शेर से पूछ ही लिया। उसने पूछा कि उस खेत में आख़िर है क्या, जो सब चुप हो जाते हैं।
शेर ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँख अब तक ठीक हो चुकी थी।
उसने कहा कि उधर मत जाना।
सियार ने दोबारा पूछा कि क्यों। शेर ने वही जवाब दोहरा दिया। इसके बाद उसने करवट बदल ली, जिसका मतलब जंगल में यह होता है कि बात ख़त्म।
सियार वहाँ से इस यक़ीन के साथ उठा कि उस खेत में कुछ बहुत बुरा है, इतना बुरा कि शेर तक उसका नाम नहीं लेता। उसने यह बात दो और जानवरों को बताई। उन दोनों ने भी यही समझा।
वह रस्सी हर साल नई बाँधी जाती है, अगहन में, फ़सल आने से पहले। लेप भी नया होता है। गाँव वालों को यह कभी नहीं मालूम हुआ कि उस रस्सी से कौन-कौन टकराया है। उन्हें सिर्फ़ इतना दिखता है कि फ़सल बची रही, और इतना उनके लिए काफ़ी है।
अब उस खेत का नाम आते ही जंगल में जो चुप्पी छाती है, उसमें एक आवाज़ शेर की भी है। उसे यह चुप्पी अब मज़ाक़िया नहीं लगती। पर उसने आज तक किसी को यह नहीं बताया कि उसे वह क्यों नहीं लगती।