शेर को जंगल में कोई चुनौती नहीं देता था, इसलिए उसने चुनौती का मतलब भूल-सा दिया था। वह दोपहर में एक ही जगह लेटता, उसी पेड़ के नीचे, और कोई उसके पास नहीं फटकता था। सिर्फ़ एक चीज़ थी जो उसे रोज़ परेशान करती थी, और वह इतनी छोटी थी कि शेर उसे किसी के सामने बता भी नहीं सकता था।
उस पेड़ की जगह उसने चुनी नहीं थी। उस जगह ने उसे चुना था। दोपहर में छाँव वहीं सबसे घनी रहती है, पानी बीस क़दम पर है, और ढलान ऐसी है कि नीचे से आती हवा उसके ऊपर से गुज़रती है। जंगल में इतनी चीज़ें एक साथ एक जगह पर कम मिलती हैं। वह वहाँ नौ बरस से सो रहा था।
गर्मी उस दिन चरम पर थी। जंगल के जानवर छाँव ढूँढ़ रहे थे और शेर अपने उसी पेड़ के नीचे लेटा हुआ था। नींद गहरी थी। मच्छर ने पहले उसके ऊपर दो चक्कर लगाए, फिर नाक पर बैठ गया। शेर हिला नहीं। मच्छर ने सूँड़ गड़ाई और ख़ून चूसना शुरू किया। इतनी बड़ी चीज़ पर बैठकर पेट भरना उसके लिए नया था। डर भी नहीं लगा, क्योंकि इतनी बड़ी चीज़ को उसके बैठने का पता ही नहीं चल रहा था।
नींद टूटी तो पहले उसे लगा कि नाक में कुछ हुआ है। अपनी नाक में। उसने थूथन झटका और आँख खोली। सामने कुछ नहीं था। दोपहर वैसी ही थी, पेड़ वैसा ही था, और उसकी नाक पर एक हल्की-सी जलन रह गई थी जिसकी कोई वजह वहाँ मौजूद नहीं थी।
यह उसे रोज़ होता था और यही वह बात थी जो वह किसी को नहीं बता सकता था। नौ बरस से गर्मियों में यह होता आ रहा था। नौ बरस में उसने एक भी मच्छर नहीं पकड़ा था।
उसने चीज़ें आज़माई भी थीं। वह थूथन को अगले पंजों में दबाकर सोने लगा, और इससे साँस लेने में दिक़्क़त हुई। उसने धुएँ वाली जगह के पास सोकर देखा, जहाँ चरवाहे शाम को आग जलाते हैं। वहाँ मच्छर नहीं आते। पर वहाँ आदमी आते हैं। एक बार उसने कीचड़ में लोटकर देखा, भैंसों की तरह। भैंसों पर वह जमकर सूख जाता है। शेर के बालों में वह सूखता नहीं, झड़ जाता है।
यह सब उसने अकेले किया। पूछने के लिए किसी के पास जाना पड़ता, और सवाल यह होता कि मुझसे एक मच्छर नहीं सँभलता, तुम क्या करते हो।
मच्छर उस वक़्त उसके कान के भीतरी हिस्से में जा बैठा था। इसमें उसकी कोई तरकीब नहीं थी। कान के भीतर अँधेरा होता है, हवा नहीं लगती, और गरमी में वहाँ नमी बची रहती है। मच्छर हमेशा वहीं जाता है, हर जानवर के कान में, और उसकी भिनभिनाहट कान के भीतर जाकर कई गुना हो जाती है। शेर को लगा जैसे आवाज़ उसके सिर के अंदर से आ रही है।
अब शेर बेचैन हो गया था। उसकी दहाड़ जंगल में गूँजी। वह अपने कान बार-बार खरोंच रहा था और हर बार आवाज़ किसी और तरफ़ चली जाती थी। मच्छर को मज़ा आ रहा था। पर वह यह भी समझ रहा था कि शेर अब सिर्फ़ परेशान नहीं है। शेर ने ख़ुद से कहा, "इसे एक बार पकड़ लूँ।" उसने ज़ोर से नाक फुलाकर हवा छोड़ी और मच्छर दूर उड़ गया। पकड़ना उसे आता ही नहीं था। उसने आज तक किसी को पकड़ा नहीं था। सब ख़ुद उसके पास आते थे, या भाग जाते थे।
जंगल के बाकी जानवर पहले तो सिर्फ़ आवाज़ सुन रहे थे। फिर दो बंदर पेड़ पर चढ़कर देखने लगे। एक हिरन झाड़ी के पीछे रुक गया। किसी ने आवाज़ नहीं निकाली और कोई पास भी नहीं गया, पर उस दोपहर पहली बार ऐसा हुआ कि शेर को देखा जा रहा था और वह इसे रोक नहीं सकता था।
मच्छर लौटा, क्योंकि वह भरा नहीं था। नाक पर बैठे हुए उसे मुश्किल से आधा पेट मिला था और झटका उसके बाद लगा था। मादा मच्छर को अंडे देने से पहले ख़ून चाहिए और उसके बिना उसका काम रुका रहता है। वह सबक सिखाने नहीं लौटा। वह अपना खाना छोड़कर नहीं जा सकता था।
शेर ने आख़िरी बार दहाड़ लगाई और अपना पंजा अपने ही चेहरे पर दे मारा। मच्छर उस वक़्त उसकी भौंह पर था। पंजा भौंह पर पड़ा और मच्छर उड़ गया। आँख के ऊपर तीन गहरी लकीरें उभर आईं और उनसे ख़ून रिसने लगा। शेर ने दूसरा पंजा उठाया। इस बार मच्छर कान के पीछे जा बैठा था।
दोपहर ढलते-ढलते जंगल शांत हो गया। शेर उसी पेड़ के नीचे था, पर अब लेटा नहीं था। उसका आधा चेहरा सूजा हुआ था, एक कान किनारे से फटा था, और सूखते ख़ून पर मक्खियाँ आ बैठी थीं। मच्छर सामने वाली टहनी पर बैठा उसे देख रहा था। उसने शेर को छुआ तक नहीं था। एक बार भी नहीं।
शाम को हिरनों का झुंड पानी पीने आया और उसने शेर को देखा। वे रुके नहीं। पर उन्होंने देखा। अगले दिन बंदरों ने देखा, और तीसरे दिन तक पूरा जंगल जानता था कि शेर के चेहरे पर वे लकीरें किसने बनाई हैं। सबसे बुरी बात यह थी कि इसका जवाब देते हुए किसी दुश्मन का नाम नहीं लिया जा सकता था। शेर ने उसके बाद दोपहर में उस पेड़ के नीचे सोना छोड़ दिया। वह अब झाड़ियों के पीछे वाली ढलान पर सोता था, जहाँ से गुज़रते हुए कोई उसे देख न सके। मच्छर तब तक नदी की तरफ़ जा चुका था। उसे शेर से कोई दुश्मनी नहीं थी और न कोई सबक सिखाना था। उसे तो बस भूख लगी थी, और नदी के किनारे भैंसें रहती थीं, जो अपनी पूँछ से काम चला लेती थीं और दहाड़ती नहीं थीं।