जंगल में शेर की दहाड़ सबसे पहले सुनाई देती थी, और सबसे देर तक गूँजती थी। और जंगल में सबसे चालाक लोमड़ी मानी जाती थी। जानवर उसे सुनकर ही जान जाते थे कि आज उसका मिज़ाज कैसा है। फिर एक सावन ऐसा आया कि दहाड़ आनी बंद हो गई। पहले दो दिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। चौथे दिन तक पूरे जंगल में यह बात फैल चुकी थी।
एक दिन, शेर बहुत बीमार हो गया। उसे कई दिनों से भूख भी नहीं लगी थी और वह कमजोर हो गया था। उसकी हालत देखकर बाकी जंगल के जानवर परेशान थे। शेर अब अपनी ताकत और सामर्थ्य खो चुका था। सभी जानवर डर रहे थे कि कहीं शेर कमजोर होकर कोई गलत कदम न उठा ले।
शेर गुफा से बाहर नहीं निकल रहा था। वह बीमार था। कई दिनों से उसने कुछ खाया नहीं था, और खाने की इच्छा भी नहीं हो रही थी। शरीर सूख गया था। आवाज़ बैठ गई थी। पर जो बात जानवरों को सबसे ज़्यादा डरा रही थी, वह यह थी कि जंगल का राजा कमज़ोर पड़ जाए तो आगे क्या होगा, यह किसी को नहीं पता था।
एक दिन, लोमड़ी शेर के पास गई और उसने शेर से पूछा, "तुम इतने बड़े और शक्तिशाली शेर हो, फिर तुम्हारी ये हालत क्यों हुई?" शेर ने कहा, "मेरे पास अब ताकत नहीं रही। मैं अब शिकार करने में असमर्थ हूं और भूख के कारण मेरी हालत खराब हो गई है।" लोमड़ी ने कहा, "तुमसे एक बात पूछ सकती हूं, शेर भाई?" शेर ने जवाब दिया, "हां, तुम मुझसे कुछ भी पूछ सकती हो।"
लोमड़ी उन गिने-चुने जानवरों में थी जो गुफा के भीतर तक गई। बाकी सब बाहर से ही लौट आते थे। वह भीतर बैठ गई और काफ़ी देर कुछ नहीं बोली। शेर ने ही पहले बात शुरू की। यह भी पहली बार हुआ था।
लोमड़ी ने कहा, "क्या तुमने कभी सोचा है कि तुम्हारी शक्ति केवल शारीरिक ताकत से नहीं, बल्कि समझदारी और चतुराई से भी आती है?" शेर को यह सुनकर थोड़ा अजीब सा लगा, लेकिन लोमड़ी ने कहा, "मैं जानती हूं कि तुम बड़ी मुश्किल में हो, लेकिन अगर तुम मेरी बात मानो तो तुम्हारी समस्या का हल ढूंढ़ सकते हो।"
गुफा में अँधेरा था। पानी का एक कटोरा पड़ा था, आधा भरा। लोमड़ी ने देखा कि वह कई दिनों से वैसा ही रखा है। उसने कुछ कहा नहीं। पर बाहर निकलकर उसने सबसे पहले यही किया कि पानी बदलवाया, और फिर हर दूसरे दिन कोई न कोई गुफा तक जाने लगा। शेर ने कभी नहीं पूछा कि यह कौन कर रहा है।
शेर ने पूछा, "क्या तुम मुझे कुछ सलाह दे सकती हो?" लोमड़ी मुस्कुराई और बोली, "तुम्हें सिर्फ अपनी चतुराई का इस्तेमाल करना होगा। तुम जंगल के दूसरे जानवरों को यह विश्वास दिलाओ कि तुम पूरी तरह से ठीक हो गए हो और फिर तुम शिकार करने जा सकते हो। शेर, तुम उन जानवरों को फंसाकर आसानी से शिकार कर सकते हो, क्योंकि उनकी नज़र में तुम एक ताकतवर शेर ही रहोगे।"
शेर ने लोमड़ी की सलाह मानी और उसने यह तय किया कि वह अपनी बीमारी के बावजूद जंगल के जानवरों के सामने अपनी ताकत का दिखावा करेगा। उसने जंगल के बीच में आकर जोर-जोर से दहाड़ लगाई। उसकी दहाड़ सुनकर सारे जानवर डर के मारे इधर-उधर भाग गए। शेर ने उनके डर का फायदा उठाया और धीरे-धीरे शिकार करना शुरू कर दिया।
पहली दहाड़ कमज़ोर थी। दूसरी बेहतर। तीसरी सुनकर पक्षी उड़ गए। शेर हैरान रह गया। उसे लगा था कि आवाज़ के लिए ताक़त चाहिए। अब समझ आया। कई बार आवाज़ से ही ताक़त लौटती है। उस रात उसने कई दिनों बाद खाया, और सुबह ख़ुद गुफा से बाहर निकला।
कुछ ही दिनों में शेर फिर से ताकतवर महसूस करने लगा। उसने महसूस किया कि लोमड़ी की समझदारी ने उसे फिर से ताकतवर बना दिया। शेर ने लोमड़ी को धन्यवाद दिया और कहा, "तुम्हारी सलाह ने मुझे मेरी खोई हुई ताकत वापस दिलाई। अब मुझे यह समझ में आ गया है कि सिर्फ शारीरिक ताकत से काम नहीं चलता, समझदारी और चतुराई भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।"
लोमड़ी ने मुस्कुराते हुए कहा, "तुमने सही समझा शेर भाई। कभी भी किसी मुश्किल में समझदारी से काम लो। ताकत से ज्यादा चतुराई और बुद्धिमानी की जरूरत होती है।" शेर ने अब यह सीखा कि अगर ताकत और समझदारी का सही संयोजन हो, तो कोई भी समस्या हल की जा सकती है।
कुछ महीनों बाद शेर पूरी तरह ठीक हो गया। एक शाम लोमड़ी गुफा के पास से गुज़री तो उसने अंदर झाँका। शेर सो रहा था। साँस भारी थी। लोमड़ी कुछ देर खड़ी रही। फिर लौट गई। उसने किसी को कभी नहीं बताया कि जंगल का राजा कितने दिन उठ भी नहीं पाया था।